माँ सारा काम निपटा चुकी थी। दालान से लेकर सारे घर आंगन की झारा-बटोरी,हर छोटा-बड़ा काम जाड़ा हो या भीषण ताप, उन्हें तड़के उठ सब सर्राटे से समेटना पसंद था।
बात-बात पर मुँह फुलाने, नखरे दिखाने वाले, बहिसयाने ना-नुकुर करने वाले हम नटखट, हमें पता ही न चला कि कब हम बड़े हुए, ब्याहे गए। मानो निश्चिंत निद्रा के सुकून से किसी ने झकझोर कर उठा दिया हो।
एक लंबी-गहरी सोच में डूबी हुई नेहा बेसुध, खिड़की से दूर आसमान को निहार रही थी तभी पीछे से आवाज आई -‘माँ कुछ खाने का दे दो न।’
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