नहीं बचे हैं सुनने वाले, किससे मन की पीर कहूं।
नयनों से बहते मृदु जल को अश्रु कहूं या नीर कहूं।।
शशि की शीतलता हरने राहु बढ़े नभ धीरे-धीरे।
सिसक रही है वसुधा भी विह्वल सरिता तीरे-तीरे।
महारथी सब मौन सभा में कैसे उनको वीर कहूं।।
जलती रही वह शमा रात भर भोर हुई कि पिघल गई।
कैसा राज तुम्हारा है खुशियां निर्धन की निगल गई।
भेदभाव करती है सत्ता, कैसे जन-तकदीर कहूं।।
प्यासे खेत प्रश्न करें क्यों होरी डालों पर झूल रहे।
बंधक श्रम क्यों कोठी पर, क्यों उदर महल के फूल रहे।
स्वप्न कुचलती यौवन के, क्यों उसको सत्ता-मीर कहूं।।
