NEW English Version

अगली पीढ़ी के ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चिरैलिटी की शक्ति का उपयोग: भारतीय वैज्ञानिकों की नई खोज

भारत के वैज्ञानिकों ने ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति करते हुए उन चिरल पेरोव्स्काइट फिल्मों के क्रिस्टलीकरण की विस्तृत प्रक्रिया का पता लगाया है, जो अगली पीढ़ी के ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में क्रांति ला सकती हैं। यह उपलब्धि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक स्वायत्त संस्थान, नैनो और मृदु पदार्थ विज्ञान केंद्र (सीईएनएस), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने हासिल की है।

चिरैलिटी: प्रकृति और विज्ञान में एक सर्वव्यापी गुण

चिरैलिटी किसी भी वस्तु का वह गुण है जिसके कारण उसका दर्पण प्रतिबिंब उसके साथ अध्यारोपित नहीं हो सकता। यह विशेषता प्रकृति में हर जगह देखने को मिलती है – सर्पिल आकाशगंगाओं से लेकर हमारे शरीर की डीएनए संरचना तक। पदार्थ विज्ञान में चिरैलिटी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अद्वितीय प्रकाश-पदार्थ अंतःक्रियाओं को सक्षम बनाती है। उदाहरणस्वरूप, यह इलेक्ट्रॉनों के स्पिन को नियंत्रित कर सकती है और वृत्ताकार ध्रुवीकृत प्रकाश (सीपीएल) का पता लगाने में मदद कर सकती है। यही विशेषताएँ क्वांटम ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत सेंसर और स्पिन-आधारित कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाओं के द्वार खोलती हैं।

2डी पेरोव्स्काइट फिल्म प्रसंस्करण के दौरान विलायक वाष्पीकरण को नियंत्रित करने से चरण-शुद्ध और उन्मुख चिरल पेरोव्स्काइट्स प्रदान किए जा सकते हैं

चिरल पेरोव्स्काइट्स: कार्बनिक पदार्थों से बेहतर विकल्प

अब तक अधिकांश चिरल पदार्थ कार्बनिक रहे हैं। इनकी सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि वे विद्युत आवेश का परिवहन प्रभावी ढंग से नहीं कर पाते। इसके विपरीत, हैलाइड पेरोव्स्काइट्स – क्रिस्टलीय पदार्थों का एक वर्ग – ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स के लिए अत्यंत उपयुक्त माने जाते हैं। इनके ट्यूनेबल गुण और उत्कृष्ट आवेश परिवहन क्षमता इन्हें अगली पीढ़ी के उपकरणों के लिए आदर्श बनाते हैं। यदि कम-आयामी हैलाइड पेरोव्स्काइट्स को चिरल अणुओं के साथ संयोजित किया जाए तो उच्च-प्रदर्शन वाले चिरल पेरोव्स्काइट्स बनाए जा सकते हैं।

सीईएनएस की खोज: क्रिस्टलीकरण प्रक्रिया का रहस्य

उच्च-गुणवत्ता वाली चिरल पेरोव्स्काइट फिल्मों के निर्माण के लिए उनके क्रिस्टलीकरण पर सटीक नियंत्रण आवश्यक है, जो अब तक पूरी तरह समझा नहीं गया था। सीईएनएस की शोध टीम ने मेथिलबेन्ज़िलामोनियम कॉपर ब्रोमाइड ((R/S-MBA)₂CuBr₄) की पतली फिल्मों का अध्ययन करते हुए यह पता लगाया कि इन फिल्मों का क्रिस्टलीकरण वायु-फिल्म इंटरफेस से शुरू होता है और फिर धीरे-धीरे सब्सट्रेट की ओर बढ़ता है।

शोध में यह भी सामने आया कि ठंडा करने की प्रक्रिया के दौरान विलायक के फंसने से अवांछित 1डी अशुद्धता चरण विकसित होते हैं, जो फिल्म की शुद्धता और उपकरण की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह प्रदर्शित किया कि वैक्यूम प्रसंस्करण और विलायक का सावधानीपूर्वक चयन करके इन अशुद्धियों को कम किया जा सकता है, जिससे अधिक एकरूप और उच्च-गुणवत्ता वाली फिल्में तैयार की जा सकती हैं।

इसके अतिरिक्त, शोधकर्ताओं ने दो सप्ताह तक क्रिस्टल विकास की निगरानी की और पाया कि कैसे छोटे कण धीरे-धीरे सुव्यवस्थित संरचनाओं में विकसित होते हैं। यह समझ चरण-शुद्ध और उन्मुख चिरल पेरोव्स्काइट फिल्मों के निर्माण की दिशा में एक ठोस रणनीति प्रदान करती है।

भविष्य की तकनीकों के लिए मार्ग प्रशस्त

इस शोध से निर्मित चिरल पेरोव्स्काइट फिल्में कई अत्याधुनिक उपकरणों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, जैसे:

  • वृत्ताकार ध्रुवीकृत प्रकाश (सीपीएल) डिटेक्टर
  • स्पिनट्रॉनिक तत्व
  • फोटोनिक सिनेप्स

इन उपकरणों का विकास क्वांटम ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स, नई पीढ़ी की कंप्यूटिंग और उन्नत संचार तकनीकों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »