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मानवता का मूलमंत्र: समग्र समभाव और समानता की पुनर्स्थापना

-10 दिसंबर वैश्विक मानवाधिकार दिवस पर –

सभी मनुष्यों में समानता हो, सबको अपने मानव और मानव होने का अधिकार समरूप से प्राप्त हो। मात्र यही मूलमंत्र मानवता के पृष्ठभूमि में कार्य करती है। इसके लिये मनसा, वाचा, कर्मणा की भावना ही अपनी मुख्य भूमिका निभा सकती है। मनुष्य में मानवता के प्रति उक्त ​भावना रही तो कोई औचित्य नहीं कि मानवता और मानवीयता अपनी चरम स्थिति पर पहुँच जायेगी। मानवता व जिसे हम भिन्न रुप से परिमार्जित रूप से कह सकते हैं कि “समग्र समभाव” अर्थात सभी को समानता  की दृष्टि से देखकर अपना काम करो। वैसे तो इसके विस्तृत स्वरुप को देखने पर कई अहम तथ्यों की ओर भी ध्यान जा सकता है, पर हम इसके इस पक्ष को ही लेकर चलते हैं।

मानवता का मूलमंत्र: समग्र समभाव और समानता की पुनर्स्थापना

मनुष्य में आधारभूत गुण या कह सकते हैं प्रकृत्ति प्रदत्त. विशेषतः मनुष्यों को सामान्य रुप से एक जैसे ही गुण सभी को ईश्वर ने समानता की पृष्ठभूमि में ही प्रदत्त किये हैं। जैसे मनुष्यों में भौतिक रूप से दो हाथ, दो पैर, दो आँख, दो कान, एक नाक, मुँह आदि समान रूप से पाये जाते हैं। लेकिन प्रकृत्ति की सबसे बड़ी इनायत तो मनुष्य को दिमाग के रूप में प्राप्त हुई हैं। यह उसकी सबसे बड़ी, और इस पूरे पृथ्वी के चराचर जगत में अनूठी मिल्कियत है। यह भी कहा जा सकता है। कि यह ईश्वरीय कृत देन किसी अन्य जीवधारी को नहीं प्राप्त हो सकी है ‘अपवाद स्वरुप कुछ जीव जंतु अवश्य हैं, लेकिन उन्हें भी अपेक्षाकृत अल्प बुद्धि ही प्राप्त हो पाई हैं, जो किसी तरह मनुष्य की बुद्धि के आगे नहीं ठहर सकती है।

उक्त संदर्भ से तो हम यहीं कह सकते हैं कि सभी मनुष्य प्रायः एक. जैसी ही समानता लिये हुए गुणों के आधारपर समान अथवा समकक्ष है। आपस में कोई वैशिष्टयता नहीं है, तब यह सवाल उठता है कि फिर मनुष्य भूतकाल से वर्तमान तक ऊंच नीच, छोटा, बडा, अमीर, गरीब, आदि संकीर्ण विचारों के वशीभूत  होकर मनुष्य एवं मनुष्यता दोनों का ही विनाश करता चला आ रहा है…..? 

मनुष्य सर्वशक्तिमान व श्रेष्ठता की भावना के वशीभूत होकर महज अपने अल्प जीवन की श्रेष्ठता और शक्ति के झूठे मकड़जाल में फंसकर ही मनुष्य और मनुष्यता की भावना को गहरा आघात पहुँचाता चला आ रहा है। एक मनुष्य के मौलिक अधिकारों का हनन करने में उसे आनंदातिरेक का अनुभव मिलता है। किसी को तकलीफ पहुंचाने में वह बड़ा शक्तिशाली होने का गुमान रखने लगता है। यह वह नहीं समझ पाता कि सभी

मनुष्यों को यहाँ पूरी स्वतंत्रता एवं समानता के अधिकारों के साथ जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है। उसे भी तो कभी इन्ही तकलीफों का अन्य मनुष्य द्वारा किये गये अन्यायपूर्ण कार्यों के फलस्वरूप सामना करना पड़ सकता है, मनुष्य यह क्यों भूल जाता है।

इस प्रकार की जहरीली आत्मघाती मानसिकता इतनी बलवती कैसे हो गई इसके विकास को प्रश्रय कैसे मिला, इसे जानने के लिये हमें अतीत में जाना होगा। उस काल में जबकि इस भूमि पर (अखंड भारत भूमि) सिर्फ यहाँ के मूल निवासियों का निवास था, तो उस माहौल परिवेश में उंच नीच, छोटा बड़ा, उच्च जाति, नीच जाति आदि अपभ्रंश परंपरा जो मानव और मानवता में भेदभाव रखते हों, ऐसे सभी तत्वों का सर्वथा अभाव था। इस प्रारंभिक काल में भी एक सा समानता एवं भाईचारे के साथ स्वच्छ और समान भाव से सभी रहते थे। परंतु इस अनवरत सदाचार समानता का भंग किया आर्यों के आगमन ने, आर्यों द्वारा इस भूमि जिसमें आज वर्तमान में भारत, पाकिस्तान, तिब्बत, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, वियतनाम, मलेशिया, बाली सिंगापुर, अफगानिस्तान, सहित चीन का कुछ भाग भी समाहित है। इस क्षेत्र में आर्यों द्वारा अपने आगमन के साथ भेदभाव की अपनी परम्परागत भावना को भी लाया गया। उनमें स्वयं में ही जातिक्रम का पहले ही स्तर उच्च कुल. मध्यम कुल, व निम्न कुल का वर्ग बना हुआ था। आर्यों ने यहाँ अपने पैर मजबूती से जमाने प्रारंभ कर दिये। यहाँ के मूल निवासियों को दूर जंगलों में खदेड दिया। वे ही आज वनवासी आदिवासी कहलाने को, सुनने को मजबूर हैं।

मानवता के भेदभाव की भावना का गुण आर्यों के आगमन के साथ ही शुरू हुआ और अब वर्तमान परिवेश में वही भावना अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचकर  विस्फोटक स्वरूप के साथ सामने खड़ी हैं। इस बिगड़े माहौल को सुधारने का हर प्रयास अब कुंद साबित हो रहा है। समाज का स्वरूप अब विकृत हो चुका है। मनुष्य अब मनुष्य के अधिकारों का हनन करने में ही अपने जीवन का ध्येय मान बैठा है। यहाँ इस संबंध में यह कहना भी अनिवार्य हो जाता” है कि इसके मूल में सिर्फ आर्यों का ही दोष नहीं था। बल्कि क्रमशः उसके बाद के कालो में अपने परिवेश, परिस्थिति, प्रतिमानों इत्यादि के अनुसार उस समय विशेष के प्रभुता संपन्न सत्तासीन मनुष्य नेअपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये भी इस भावना को काफी ज्यादा प्रश्रय प्रदान किया। परिणाम स्वरुप उक्त भावना को अत्यधिक संबंल मिलता रहा और परिणाम उसी प्रकार खतरनाक रूप से हमारे सामने है।

  जिस प्रकार अमरबेल जिस पेड़ पर रहती है, उसी पेड़ को वह सुखा डालती है। उक्त लोकोक्ति आज की परिस्थितियों में चरितार्थ हो रही है। आज यह समस्या स्वयं आर्यों की संतानों के समक्ष “सुरसा के मुँह” की तरह विकराल स्वरूप में मुँह खोले चुनौती के रूप में सामने खड़ी हो गयी है।

अंततः तो यहीं कहा जा सकता है. कि मनुष्य तो प्राकृत रूप से एक समान व एक दूसरे के समकक्ष ही है। सभी मनुष्यों के खून का रंग भी एक है तो फिर क्यों…? भेदभाव की भावना को मनुष्य ने अपने अल्प एवं गौण स्वार्थ के लिये मानवता को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया। समय की माँग यही है कि अब हम सबको एकजुट होकर युक्तियुक्त पूर्वक इस विडंबना से मुक्त होने के लिये विचार- प्रयास एवं प्रण करना होगा। जातं पांत, – ऊंच नीच सांप्रदायिक भावना आदि की त्यागना ही होगा।

इसके आदर्श एवं संतोषप्रद परिणाम प्राप्ति के लिये शासन प्रशासन के साथ साथ प्रत्येक मनुष्य के मौलिक कर्तव्य के रूप में इसका निर्धारण किया जाना चाहिये, तभी तो मानव और मानवता अपने नैसर्गिक व स्वच्छंद वातावरण में. स्वतंत्रता की सांसे ले सकती है, अन्यथा नहीं।

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