राष्ट्रपति ने हैदराबाद में लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस सम्मेलन का आयोजन तेलंगाना लोक सेवा आयोग द्वारा किया गया, जिसमें देशभर के लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। यह सम्मेलन लोक सेवा आयोगों की भूमिका, दायित्वों और भविष्य की चुनौतियों पर विचार विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में आयोजित किया गया है।

अपने उद्घाटन संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय संविधान के निर्माताओं ने सेवाओं और लोक सेवा आयोगों को विशेष महत्व देते हुए संविधान का एक पूरा भाग इनके लिए समर्पित किया है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर शासन व्यवस्था में लोक सेवा आयोगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था लोकतांत्रिक शासन के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता आधारित प्रशासन सुनिश्चित करने की संवैधानिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

संवैधानिक आदर्श और लोक सेवा आयोगों की भूमिका

राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा जैसे संवैधानिक आदर्श लोक सेवा आयोगों के कार्य संचालन की आधारशिला हैं। संविधान की प्रस्तावना, सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर का मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत, जो जन कल्याण को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं, लोक सेवा आयोगों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि लोक सेवा आयोगों को केवल अवसरों की समानता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि परिणामों की समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भी प्रयास करना चाहिए। लोक सेवा आयोग ऐसे परिवर्तनकारी माध्यम हैं, जो शासन प्रणाली में समानता, निष्पक्षता और सामाजिक समावेशन को सशक्त बना सकते हैं।

स्थायी कार्यपालिका और सुशासन

राष्ट्रपति ने कहा कि शासन प्रक्रिया में निष्पक्षता, निरंतरता और स्थिरता का दायित्व उन सिविल सेवकों पर होता है, जिन्हें लोक सेवा आयोगों द्वारा चुना जाता है और जो स्थायी कार्यपालिका का हिस्सा बनते हैं। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर जनहितैषी नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सिविल सेवकों की सत्यनिष्ठा, संवेदनशीलता और व्यावसायिक दक्षता अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि लोक सेवा आयोगों को भर्ती प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवारों की ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। राष्ट्रपति ने कहा कि कौशल और योग्यता की कमी को प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और अनुभव के माध्यम से दूर किया जा सकता है, लेकिन सत्यनिष्ठा की कमी शासन व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौतियां उत्पन्न कर सकती है, जिन पर नियंत्रण पाना अत्यंत कठिन होता है।

सामाजिक उत्तरदायित्व और लैंगिक संवेदनशीलता

राष्ट्रपति ने कहा कि सरकारी सेवा में आने वाले युवाओं के भीतर वंचित और कमजोर वर्गों के लिए कार्य करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। लोक सेवकों को समाज के सभी वर्गों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को समझने और उनके प्रति संवेदनशील रहने की आवश्यकता है।

उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता पर बल देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों को महिलाओं की आवश्यकताओं, सुरक्षा और आकांक्षाओं के प्रति सजग होना चाहिए। लोक सेवा आयोगों द्वारा चयन प्रक्रिया और प्रशिक्षण में लैंगिक संवेदनशीलता को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि शासन व्यवस्था अधिक समावेशी और उत्तरदायी बन सके।

विकसित भारत की दिशा में लोक सेवा आयोगों की भूमिका

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और अपनी विशाल विविधता के कारण देश को सभी स्तरों पर अत्यंत प्रभावी शासन प्रणालियों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत निकट भविष्य में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि लोक सेवा आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए ऐसे सिविल सेवकों का चयन और मार्गदर्शन करते रहेंगे, जो भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हों। राष्ट्रपति ने कहा कि सक्षम, ईमानदार और संवेदनशील सिविल सेवकों की एक मजबूत टीम ही विकसित भारत के सपने को साकार कर सकती है।

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