मुख्य अतिथि पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने शिक्षकों के प्रयासों को सराहा
चित्रकूट। शैक्षिक नवाचार, संस्कार और आनंदमय शिक्षा की अवधारणा को सशक्त आधार देने वाले शैक्षिक संवाद मंच की तीन दिवसीय वार्षिक कार्यशाला के दूसरे दिन रविवार को अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट का परिसर देश भर से आए नवाचारी शिक्षकों के उत्साह, विमर्श और सम्मान से गूंज उठा। इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले 45 शिक्षकों को ‘राष्ट्रीय शिक्षा रत्न सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
उक्त जानकारी मंच के संस्थापक प्रमोद दीक्षित मलय ने दी। मुख्य अतिथि पद्मश्री उमाशंकर पाण्डेय ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि दुनिया में यदि किसी पद को सबसे अधिक सम्मान मिलना चाहिए तो वह शिक्षक का है क्योंकि वही समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करता है। उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे कक्षा-कक्ष को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखें बल्कि बच्चों को जल संरक्षण, प्रकृति प्रेम और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के प्रति भी संवेदनशील बनाएं ताकि आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित और जागरूक बन सकें।

विशेष मार्गदर्शक समाजसेवी गोपाल भाई ने कहा कि सच्ची शिक्षा वही है जो बच्चों को आमजन की पीड़ा समझने की क्षमता दे और उन्हें एक संवेदनशील, नैतिक और जिम्मेदार नागरिक बनाए। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं बल्कि बेहतर मनुष्य गढ़ना होना चाहिए। कार्यशाला में डॉ. प्रमोद सेठिया ने गिजुभाई बधेका के शैक्षिक दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि गिजुभाई के विचारों का ईमानदारी से अनुकरण करने पर ही विद्यालयों को ‘आनंदघर’ के रूप में विकसित किया जा सकता है जहां सीखना बोझ नहीं, उत्सव बन जाए। डॉ. सुरेंद्र आर्यन ने शैक्षिक संवाद मंच के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह मंच जमीनी स्तर पर संस्कृति, संस्कार और आनंदपूर्ण शिक्षा के बीज बोने का अद्भुत कार्य कर रहा है। मंच के संयोजक दुर्गेश्वर राय ने मंच की वैचारिक यात्रा साझा करते हुए बताया कि 18 नवंबर, 2012 को शैक्षिक संवाद मंच की स्थापना गिजुभाई बधेका की अवधारणा ‘विद्यालय बनें आनंदघर’ के संकल्प के साथ की गई थी। मंच का उद्देश्य शिक्षक के मन को आनंदित कर विद्यालय, समुदाय और बच्चों के बीच सकारात्मक संवाद और समन्वय स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि जब शिक्षक स्वयं आनंदित होगा, तभी वह बच्चों के जीवन में आनंद का संचार कर पाएगा।

