मकर संक्रांति: हिंदू परंपरा का एक महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण पर्व

14 जनवरी मकर संक्रांति पर्व पर विशेष

मकर संक्रांति भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश तथा दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गति करने के साथ जुड़ा हुआ है। खगोलीय दृष्टि से यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसके साथ ही दिन बड़े होने लगते हैं और प्रकृति में धीरे धीरे नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को अंधकार से प्रकाश की ओर, निष्क्रियता से सक्रियता की ओर और जड़ता से नवजीवन की ओर अग्रसर होने का प्रतीक माना जाता है।

भारत की विशेषता यह है कि यहां त्योहार केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक विविधता और मानवीय मूल्यों को भी सुदृढ़ करते हैं। मकर संक्रांति इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे देश के विभिन्न भागों में भिन्न भिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। पंजाब और जम्मू कश्मीर में यह पर्व लोहड़ी के रूप में प्रसिद्ध है। लोक मान्यता के अनुसार यह उत्सव भगवान बालकृष्ण द्वारा लोहिता नामक राक्षसी के वध की स्मृति में मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग खुले स्थानों में अलाव जलाते हैं, उसके चारों ओर लोकनृत्य भांगड़ा करते हैं और तिल, गुड़, मक्का, मूंगफली तथा गजक जैसी वस्तुओं से बनी सामग्री को अग्नि को अर्पित करते हैं। यह सामूहिक उत्सव समाज में आपसी प्रेम, उल्लास और सहभागिता की भावना को प्रबल करता है।

भारतीय संस्कृति में पर्व और उत्सव केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि जीवन को संतुलन और सकारात्मक दृष्टि देने वाले माध्यम हैं। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत ऐसा देश है जहां वर्ष के लगभग प्रत्येक दिन किसी न किसी रूप में उत्सव का वातावरण बना रहता है। यही उत्सव जीवन की एकरसता को तोड़ते हैं, मानसिक तनाव को कम करते हैं और समाज को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। मकर संक्रांति इसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो उपनिषदों के वाक्य तमसो मा ज्योतिर्गमय की भावना को साकार करता है और यह संदेश देता है कि जीवन में अज्ञान, निराशा और नकारात्मकता को छोड़कर ज्ञान, आशा और सकारात्मकता की ओर बढ़ना चाहिए।

गुजरात में मकर संक्रांति को उत्तरायण या उतरोन के नाम से मनाया जाता है। इस दिन आसमान रंग बिरंगी पतंगों से भर जाता है और पूरा वातावरण उल्लास से सराबोर हो उठता है। वहीं महाराष्ट्र में इस पर्व पर लोग एक दूसरे के घर जाकर तिल और गुड़ से बने लड्डू खिलाते हैं और प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तिल गुड़ खाइए और मीठा मीठा बोलिए। इस परंपरा का गहरा सामाजिक अर्थ है, जो यह सिखाता है कि जीवन में कटुता को छोड़कर मधुरता अपनानी चाहिए और आपसी संबंधों को प्रेम और सौहार्द से मजबूत बनाना चाहिए। असम में यही पर्व माघ बिहू के नाम से जाना जाता है, जहां इसे फसल कटाई के उत्सव के रूप में मनाया जाता है और नई फसल के आगमन की खुशी व्यक्त की जाती है।

उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रयागराज में यह पर्व माघ मेले के रूप में प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त गंगा सागर में भी इस अवसर पर विशाल मेला आयोजित होता है। इन स्थानों पर श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर दान पुण्य करते हैं। मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा भी प्रचलित है। जनमान्यता है कि ठंड के मौसम में खिचड़ी का सेवन शरीर को पोषण और ऊर्जा प्रदान करता है। यह परंपरा दर्शाती है कि भारतीय त्योहारों में स्वास्थ्य और ऋतुचक्र का भी गहरा ध्यान रखा गया है।

मकर संक्रांति के साथ अनेक धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से इसे सूर्य और शनि के मिलन के पर्व के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता है कि जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, जो कि शनि की राशि मानी जाती है, तब सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। इस दिन को पिता पुत्र के संबंधों में सामंजस्य और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को विशेष पुण्यकाल माना गया है।

एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार इसी दिन गंगा नदी राजा भगीरथ के पीछे पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई समुद्र में जाकर मिली थी। भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए इसी दिन तर्पण किया था। उनके तर्पण को स्वीकार करने के बाद गंगा का सागर में मिलन हुआ। इसी कारण गंगा सागर में मकर संक्रांति के अवसर पर विशाल मेला लगता है और लाखों श्रद्धालु वहां स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

महाभारत काल से जुड़ी एक महत्वपूर्ण मान्यता भी मकर संक्रांति के महत्व को और बढ़ा देती है। भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश करने की प्रतीक्षा की थी। मान्यता है कि उत्तरायण काल में देह त्याग करने वाली आत्माएं कुछ समय के लिए देवलोक में वास करती हैं और उन्हें पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है, जिसे मोक्ष की संज्ञा दी गई है। इसी कारण मकर संक्रांति को मोक्षदायिनी तिथि भी माना जाता है।

कुछ धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर युद्ध की समाप्ति की घोषणा की थी और उनके सिरों को मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया था। इस कारण यह दिन बुराइयों और नकारात्मक शक्तियों के अंत का प्रतीक माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार माता यशोदा ने भगवान कृष्ण के जन्म की कामना से जो व्रत रखा था, वह मकर संक्रांति के दिन ही पड़ा था। तभी से इस पर्व पर व्रत रखने की परंपरा भी प्रचलित हुई।

समग्र रूप से मकर संक्रांति केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य, सामाजिक सौहार्द, नैतिक मूल्यों और सकारात्मक जीवन दृष्टि का संदेश देता है। विविधताओं में एकता, परंपरा और आधुनिकता का संतुलन तथा आस्था और व्यवहार का सुंदर समन्वय मकर संक्रांति को एक विशिष्ट और प्रेरणादायक पर्व बनाता है। यही कारण है कि यह पर्व सदियों से जनमानस में समान श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है और आगे भी इसी प्रकार मनाया जाता रहेगा।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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