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गणराज्य के रूप में भारत की यात्रा

गणतंत्र दिवसः इस तरह बना भारत गणराज्य

गणतंत्र दिवस भारत की राष्ट्रीय यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसी दिन 26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ। इसके साथ ही देश की ‘संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य’ के रूप में औपचारिक तौर पर स्थापना हुई। बेशक, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के साथ ही भारत में औपनिवेशिक शासन का अंत हो गया था। लेकिन कानून, संस्थागत जवाबदेही और नागरिकों की इच्छा पर आधारित स्वशासन के रूप में भारत का परिवर्तन संविधान को स्वीकार किए जाने के साथ ही पूरा हुआ।

हम इस संवैधानिक उपलब्धि को हर साल समारोह पूर्वक मनाते हैं। ये समारोह लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज और राष्ट्र की विविधता को प्रतिबिंबित करते हैं। गणतंत्र दिवस समारोह हमारे संवैधानिक आदर्शों को सार्वजनिक मंच पर लाते हैं। यह नई दिल्ली में कर्तव्य पथ पर होने वाले राष्ट्रीय समारोह और परेड में सबसे ज्यादा परिलक्षित होता है। यह परेड सैनिक अनुशासन, सांस्कृतिक विरासत और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का सामंजस्यपूर्ण प्रदर्शन करती है। इसमें राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों की झांकियां भारत की सांस्कृतिक विविधता को रेखांकित करती हैं। देश भर में राज्यों की राजधानियों, जिलों, शैक्षिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों में ध्वजारोहण समारोह, आधिकारिक आयोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ये आयोजन गणतंत्र दिवस को संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों की पुष्टि करने वाले साझा नागरिक अवसर में तब्दील कर देते हैं।

77वां गणतंत्र दिवसवंदे मातरम के 150 साल

77वें गणतंत्र दिवस समारोहों की विषय-वस्तु ‘वंदे मातरम के 150 वर्ष’ है। गणतंत्र दिवस परेड, सांस्कृतिक प्रदर्शन, झांकियां, सार्वजनिक प्रतियोगिताएं और अन्य कार्यक्रम इसी विषय-वस्तु पर आधारित होंगे। इस तरह, भारत का राष्ट्रीय गीत स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और वर्तमान की राजनीतिक आकांक्षाओं को जोड़ते हुए इस साल के समारोह के केंद्र में होगा।

राष्ट्रीय स्तर पर, गणतंत्र दिवस परेड, 2026 को बड़े पैमाने पर समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में आयोजित करने की योजना बनाई गई है जिसमें जन भागीदारी पहले से ज्यादा होगी। परेड के मुख्य अतिथि यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष होंगी जिससे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय साझीदारों के साथ भारत की प्रतिबद्धता का पता चलता है। इस साल की परेड में पारंपरिक मार्चिंग दस्तों और रक्षा प्रदर्शनों के साथ ही पहली बार भारतीय सेना की युद्ध व्यूह रचना भी प्रदर्शित की जाएगी।

गणतंत्र दिवस परेड, 2026 के प्रमुख कार्यक्रमः

  • ‘स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम’ और ‘समृद्धि का मंत्र – आत्मनिर्भर भारत’ विषयों पर आधारित राज्यों, संघ शासित क्षेत्रों और केंद्रीय मंत्रालयों की कुल 30 झांकियां परेड में शामिल होंगी।
  • कर्तव्य पथ पर सांस्कृतिक प्रस्तुति में लगभग 2500 कलाकार भाग लेंगे।
  • देश भर से किसानों, हस्तशिल्पियों, वैज्ञानिकों, नवोन्मेषकों, महिला उद्यमियों, छात्रों, खिलाड़ियों, प्रमुख सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और अग्रिम पंक्ति के कर्मियों समेत लगभग 10000 विशेष अतिथियों को आमंत्रण भेजे गए हैं।

भागीदारी को समारोह स्थल से आगे ले जाने के लिए गणतंत्र दिवस से पहले कई नागरिक केंद्रित पहलकदमियां ली गई हैं। सरकार ने गणतंत्र दिवस की विषय वस्तु से नागरिकों और खास तौर से युवाओं और रचनात्मक समुदायों को जोड़ने के लिए ‘माई गॉव’ और ‘माई भारत’ जैसे मंचों के जरिए राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं आयोजित की हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

  • ‘स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम’ पर निबंध प्रतियोगिता।
  • ‘समृद्धि का मंत्र – आत्मनिर्भर भारत’ पर पेंटिंग प्रतियोगिता।
  • ‘वंदे मातरम’ गायन प्रतियोगिताएं।
  • वंदे मातरम, अंतरिक्ष और खेलों में भारत की उपलब्धियों और राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों जैसे विषयों पर क्विज प्रतियोगिताएं।

इन प्रतियोगिताओं में गणतंत्र दिवस, 2026 के लिए समर्पित ‘माई भारत’ पोर्टल के जरिए हिस्सा लिया जा सकता है। इन प्रतियोगिताओं के विजेताओं को गणतंत्र दिवस कार्यक्रमों से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया जाता है जिससे जन भागीदारी और राष्ट्रीय समारोह के बीच सीधा संबंध स्थापित होगा।

विषय वस्तु आधारित परेड, विस्तारित जन भागीदारी और राष्ट्रव्यापी सहभागी कार्यक्रम मिल कर 77वें गणतंत्र दिवस को एक ऐसे समारोह में तब्दील कर देते हैं जिसमें पारंपरिक समारोह और समावेशी हिस्सेदारी का संगम होगा। इन कार्यक्रमों से नागरिक इस अवसर के साथ बतौर दर्शक और भागीदार, दोनों ही रूप में जुड़ सकेंगे।

26 जनवरीः पूर्ण स्वराज से संविधान तक

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस घोषित करने का फैसला भारत की सांवैधानिक शुरुआत को उसके स्वतंत्रता संग्राम के मील के पत्थरों में शामिल करने के सोचे समझे ऐतिहासिक चयन को प्रतिबिंबित करता है। यह तारीख 1930 में पूर्ण स्वराज दिवस मनाए जाने से लेकर 1950 में स्वशासन की संवैधानिक प्रणाली को औपचारिक तौर पर स्वीकार किए जाने तक के दो दशकों में स्पष्ट प्रगति का प्रतीक है। इस यात्रा को समझना गणतंत्र दिवस को समझने के लिए जरूरी है। इससे पता चलता है कि राजनीतिक आकांक्षा को किस तरह धीरे-धीरे एक टिकाऊ संवैधानिक व्यवस्था में परिवर्तित किया गया।

भारत का स्वतंत्रता से गणतंत्र तक का रास्ता

  • 26 जनवरी, 1030 – पूर्ण स्वराज के लिए आह्वान

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद 1929 में पूर्ण स्वराज की मांग औपचारिक राजनीतिक लक्ष्य बन गई। भारतीयों ने 26 जनवरी, 1930 को समूचे देश में पूर्ण स्वराज दिवस मनाया। इसके जरिए उन्होंने ब्रिटिश शासन के अधीन उपनिवेश के दर्जे को नकारते हुए पूर्ण स्वराज के लक्ष्य के लिए खुद को समर्पित किया। यह स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ था जिसके माध्यम से देशवासियों ने औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत सांवैधानिक सुधारों की मांगों से आगे बढ़ते हुए एक स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य सामने रखा।

  • 9 दिसंबर, 1946 – संविधान सभा ने काम शुरू किया

भारत की संविधान सभा ने अपनी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को कॉन्सटिट्यूशन हॉल में की जिसे अब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष के रूप में जाना जाता है। इसके साथ ही भारत के संविधान के निर्माण की प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत हो गई। इस सभा ने स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण की अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए 2 वर्ष, 11 महीने और 17 दिन काम किया। उसने इस ऐतिहासिक कार्य को पूरा करने के लिए 165 दिनों में 11 सत्र आयोजित किए। संविधान के मसौदे पर 114 दिन विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। संविधान सभा के सदस्यों का प्रत्यक्ष चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं और रियासतों के प्रतिनिधियों ने किया। यह सुनिश्चित किया गया कि संविधान का निर्माण एक व्यापक प्रतिनिधित्व और विचार-विमर्श की प्रक्रिया के जरिए हो।

  • 15 अगस्त, 1947 – भारत को स्वतंत्रता मिली

15 अगस्त, 1947 को भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की। इसके साथ ही लगभग दो सदियों के औपनिवेशिक शासन के अंत की शुरुआत हो गई। सत्ता का हस्तांतरण एक लंबे और सतत स्वतंत्रता संग्राम का नतीजा था जिसमें देश भर में नेताओं के अलावा सामान्य नागरिकों ने भी भागीदारी निभाई। स्वतंत्रता से भारतीय नागरिकों की राजनीतिक संप्रभुता बहाल हुई और राष्ट्र निर्माण का कार्य शुरू हुआ। नवस्वतंत्र राष्ट्र ने लोकतांत्रिक आदर्शों, एकता और आत्मनिर्णय के आधार पर अपने भविष्य को गढ़ना शुरू किया।

  • 26 नवंबर 1949 – भारत का संविधान अपनाया गया

लगभग तीन वर्षों के व्यापक विचार-विमर्श के बाद, संविधान सभा ने भारत का  संविधान अपनाया, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण कामों में से एक था। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में भारतीय राज्य के स्वरूप, नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों, सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति संतुलन, और सामाजिक न्याय और समानता के लिए सुरक्षा उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। संविधान को अपनाना लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित शासन व्यवस्था स्थापित करने के इस सामूहिक प्रयास की पराकाष्ठा संकेत था। इसे अंगीकार करने की तारीख 26 नवंबर 1949, औपचारिक रूप से प्रस्तावना की अंतिम पंक्ति में दर्ज है, जो इसके संवैधानिक अधिकार और ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करती है।

  • 26 जनवरी 1950 – संविधान लागू हुआ

जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, तो भारत औपचारिक रूप से एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया, जिसने स्वतंत्र भारत में संवैधानिक शासन की शुरुआत की। 1976 में 42वें संशोधन अधिनियम के ज़रिए, ‘समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए। इसके बाद भारत संप्रभु, समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया। नए बनाए गए संविधान को भारत सरकार अधिनियम 1935 के स्थान पर लागू किया गया। इसके साथ ही, संविधान के तहत काम करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिकार और संप्रभुता सौंप दी गई। 26 जनवरी की तारीख जानबूझकर चुनी गई थी, क्योंकि यह तारीख 1930 के ‘पूर्ण स्वराज’ के ऐतिहासिक विरासत को संजोए हुए थी, इस दिन पूर्ण स्वतंत्रता को राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित किया गया था। इस तारीख को संविधान लागू करके, स्वतंत्र भारत ने प्रतीकात्मक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन के राजनीतिक संघर्ष को संवैधानिक गणराज्य के संस्थागत ढांचे से जोड़ा।

भारत का संविधानअपनाया गया: 26 नवंबर, 1949लागू हुआ: 26 जनवरी, 1950भारत का संविधान वह आधारभूत दस्तावेज है जिससे भारतीय राज्य का कामकाज संचालित होता है। इसके लागू होने के साथ ही, भारत औपचारिक रूप से एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया, जो कानून और लोकतांत्रिक संस्थानों द्वारा निर्देशित है। 1976 में 42वें संशोधन अधिनियम के जरिए, इसमें ‘समाजवादी’ और धर्मनिर्पेक्ष’ शब्द जोड़े गए, जिससे भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया।प्रस्तावना गणराज्य के मार्गदर्शक सिद्धांतों,  न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को निर्धारित करती है, जो संविधान के कामकाज और इसके प्रावधानों की व्याख्या का आधार हैं। संविधान में संघ और राज्य दोनों स्तरों पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों और जिम्मेदारियों को निर्धारित करके शासन की संरचना को परिभाषित किया गया है। यह नियंत्रण, संतुलन और जवाबदेही की एक प्रणाली स्थापित करता है।यह निम्नलिखित का भी प्रावधान करता है: मौलिक अधिकार, आवश्यक स्वतंत्रता और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत, शासन और सार्वजनिक नीति का मार्गदर्शन करते हैं। मौलिक कर्तव्य: जो नागरिक जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं। ये सभी प्रावधान मिलकर उस संवैधानिक ढांचे का निर्माण करते हैं जिसके माध्यम से भारत का शासन चलाया जाता है और ये गणराज्य के लोकतांत्रिक कामकाज का मार्गदर्शन करते है। 

गणतंत्र दिवस आज: राष्ट्रीय उत्सव और जीवंत संवैधानिक मूल्य

हर साल गणतंत्र दिवस एक साझा राष्ट्रीय गौरव के रूप में मनाया जाता है, इस दिन समारोह, रंग और सामूहिक यादें एक साथ मिल जाती हैं। राजधानी से लेकर देश के दूर-दराज के इलाकों में यह दिन ध्वजारोहण करके और सशस्त्र बलों और स्कूली बच्चों की परेड के आयोजनों से मनाया जाता है, जिससे इस दिन के महत्व का एक साझा एहसास जगता है।

इन परेडों में सबसे भव्य और महत्वपूर्ण परेड नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित की जाती है, जो देश की सांस्कृतिक विरासत और सैन्य शक्ति  की एक बहुरंगी तस्वीर दिखाती है। दिन की शुरुआत राष्ट्रीय समर स्मारक पर प्रधानमंत्री द्वारा शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ होती है, जिससे मुख्य समारोह से पहले राष्ट्रीय गौरव का माहौल बनता है।


परेड की एक खास बात यह है कि इसमें राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और मंत्रालयों की झांकियां प्रदर्शित की जाती हैं, जो क्षेत्रीय संस्कृति और राष्ट्रीय महत्व के विषयों को दिखाती हैं। जुलूस में शामिल सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी इसकी औपचारिक लय को बाधित किए बिना इसमें भव्यता पैदा करती हैं। परेड का एक मुख्य आकर्षण उन शहीदों को सम्मानित करना है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है और देश सेवा करने वाले सैन्य कर्मियों व नागरिकों को वीरता पुरस्कार प्रदान करना है। मोटरसाइकिल कलाबाज़ी के प्रदर्शन और भारतीय वायु सेना के फ्लाई-पास्ट जैसे मुख्य आकर्षणों के बाद परेड का भव्य समापन होता है।

औपचारिक कार्यक्रम तीन दिन बाद 29 जनवरी को संपन्न  होते हैं। इसे ‘बीटिंग द रिट्रीट’ समारोह कहा जाता है, यह विजय चौक पर होती है और गणतंत्र दिवस समारोह के औपचारिक समापन का प्रतीक है। ‘बीटिंग रिट्रीट’ सदियों पुरानी सैन्य परंपरा का प्रतीक है, जब सूर्यास्त के समय ‘रिट्रीट’ की ध्वनि बजने पर सैनिक लड़ना बंद कर देते थे, अपने हथियारों को म्यान में रख लेते थे और युद्ध के मैदान से हटकर शिविरों में वापस लौट जाते थे।

संदर्भ:

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