खगोलविदों ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह स्पष्ट किया है कि सूर्य से उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म और लगभग अदृश्य कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) भी पृथ्वी पर तीव्र भूचुंबकीय तूफान पैदा करने की क्षमता रखते हैं। मार्च 2023 में सूर्य से निकलकर पृथ्वी तक पहुंचे एक ऐसे ही स्टील्थ सीएमई के अध्ययन से अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी को लेकर नई जटिलताएं सामने आई हैं।
कोरोनल मास इजेक्शन सूर्य के वायुमंडल से प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों का विशाल निष्कासन होता है, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराकर भूचुंबकीय तूफान उत्पन्न कर सकता है। ऐसे तूफानों का सीधा प्रभाव उपग्रहों, संचार प्रणालियों, नेविगेशन नेटवर्क और बिजली ग्रिड पर पड़ता है। आम तौर पर तीव्र भूचुंबकीय तूफान सूर्य पर बड़े विस्फोटों, एक्स-रे फ्लेयर्स या रेडियो संकेतों के साथ जुड़े होते हैं, जिससे उनका पूर्वानुमान अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

हालांकि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग 10 प्रतिशत तीव्र भूचुंबकीय तूफान ऐसे कमजोर या गुप्त सौर विस्फोटों से उत्पन्न होते हैं, जो मौजूदा अवलोकन प्रणालियों की सीमाओं के कारण सूर्य के पास पहचान में ही नहीं आते। इन्हें स्टील्थ सीएमई कहा जाता है। ऐसे मामलों में पृथ्वी पर प्रभाव सामने आने तक किसी स्पष्ट चेतावनी संकेत का अभाव रहता है, जिससे अंतरिक्ष मौसम का पूर्वानुमान और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
मार्च 2023 की स्टील्थ सीएमई का विश्लेषण
हालिया अध्ययन में खगोलविदों ने 19 मार्च 2023 को घटित एक स्टील्थ सीएमई की गहन जांच की। यह सीएमई सूर्य से निकलने के लगभग तीन दिन बाद पृथ्वी पर एक तीव्र भूचुंबकीय तूफान का कारण बनी। विश्लेषण में पाया गया कि अपेक्षाकृत कमजोर होने के बावजूद इस सीएमई में दक्षिणी चुंबकीय घटक और बढ़ी हुई प्लाज्मा घनत्व मौजूद थी, जिसने पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र पर इसका प्रभाव काफी बढ़ा दिया।
यह सीएमई सूर्य के केंद्र के पास स्थित एक अनुदैर्ध्य फिलामेंट चैनल के विस्फोट से उत्पन्न हुई थी। सामान्य शक्तिशाली सीएमई के विपरीत, इस घटना के साथ न तो कोई स्पष्ट एक्स-रे फ्लेयर दर्ज हुआ और न ही रेडियो विस्फोट, जिससे यह सूर्य के पास लगभग अदृश्य बनी रही।
भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान की अहम भूमिका
इस शोध का नेतृत्व भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने किया, जो भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है। अध्ययन के प्रमुख लेखक पी. वेमारेड्डी ने बताया कि इस प्रकार के कमजोर सीएमई सूर्य पर कोई भी स्पष्ट संकेत नहीं छोड़ते, जिससे मौजूदा अवलोकन क्षमताओं के साथ इनकी पहचान बेहद कठिन हो जाती है।
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए नासा के कई अंतरिक्ष अभियानों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग किया, जिनमें नासा सोलर डायनेमिक ऑब्जर्वेटरी, सोलर ऑर्बिटर, स्टीरियो-ए और विंड मिशन शामिल हैं।
कोरोनल होल की निर्णायक भूमिका
सोलर डायनेमिक ऑब्जर्वेटरी से प्राप्त पराबैंगनी छवियों में सीएमई के स्रोत क्षेत्र के पास एक कोरोनल होल की उपस्थिति सामने आई। कोरोनल होल सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र में ऐसे क्षेत्र होते हैं जहां से तीव्र सौर पवन निकलती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस स्टील्थ सीएमई को पास स्थित कोरोनल होल से निकली तेज सौर पवन का सहारा मिला, जिससे यह सूर्य के पास ही समाप्त होने के बजाय पृथ्वी तक पहुंच सकी।
यह खोज इस बात को रेखांकित करती है कि कोरोनल होल सूक्ष्म सौर विस्फोटों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और उनके प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
अंतरग्रहीय विकास और भूचुंबकीय प्रभाव
अध्ययन में सूर्य से त्रिज्या दूरी में लगभग संरेखित अंतरिक्ष यानों द्वारा किए गए इन सीटू अवलोकनों के आधार पर अंतरग्रहीय कोरोनल मास इजेक्शन के विकास का भी विश्लेषण किया गया। उच्च गति वाली सौर पवन के पीछे यात्रा कर रहे इस आईसीएमई में किसी स्पष्ट शॉक या आवरण का अभाव देखा गया।
अवलोकनों से पता चला कि आईसीएमई के भीतर चुंबकीय बादल का विस्तार धीमी गति से हुआ, उसका त्रिज्यीय आकार बढ़ा और विस्तार दर घटती गई। चुंबकीय संरचना में प्रसार के दौरान घूर्णन भी देखा गया, जो स्रोत क्षेत्र के अनुरूप दाहिनी ओर की हेलिसिटी को दर्शाता है। चुंबकीय बादल की सीमाओं के पास प्लाज्मा घनत्व में वृद्धि दर्ज की गई, जिसने पृथ्वी पर इसके प्रभाव को और सशक्त बनाया।
शोधकर्ताओं ने सौर पवन वेग, घनत्व, चुंबकीय क्षेत्र और विद्युत क्षेत्रों के आधार पर भूचुंबकीय सूचकांकों का प्रतिरूपण भी किया। प्रतिरूपित परिणामों और वास्तविक भूचुंबकीय सूचकांकों के बीच मजबूत सामंजस्य पाया गया, विशेष रूप से तब जब सौर पवन घनत्व और विद्युत क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों को शामिल किया गया।
अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान के लिए निहितार्थ
अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि सूर्य के पास लगभग अदृश्य रहने वाले सूक्ष्म सीएमई भी, यदि उनमें दक्षिणी चुंबकीय घटक और उच्च घनत्व हो, तो पृथ्वी पर गंभीर अंतरिक्ष मौसम प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। हेलियोस्फीयर के भीतर जटिल सौर पवन संरचनाओं के साथ इनका गतिशील विकास अंतरिक्ष मौसम के सटीक पूर्वानुमान को और अधिक कठिन बना देता है।
यह शोध अंतरिक्ष मौसम निगरानी प्रणालियों को और अधिक संवेदनशील और व्यापक बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है, ताकि भविष्य में ऐसे गुप्त सौर विस्फोटों से उत्पन्न खतरों के लिए समय रहते चेतावनी दी जा सके।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसके सह-लेखक आईआईएसईआर तिरुपति के के. सेल्वा भारती हैं, जो उस समय भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान में एमएससी इंटर्नशिप के छात्र थे।