भारत और ब्राजील ने पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण तथा पेटेंट परीक्षण प्रक्रिया में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुधार के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण टीकेडीएल एक्सेस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। ब्राजील के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल प्रॉपर्टी और भारत की वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के बीच यह सहमति पत्र 21 फरवरी 2026 को संपन्न हुआ। इस अवसर पर ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उपस्थित रहे।

यह समझौता उस समय हुआ जब राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा 18 से 22 फरवरी 2026 तक भारत की राजकीय यात्रा पर थे। उनकी यात्रा के दौरान आयोजित द्विपक्षीय बैठकों और इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के संदर्भ में इस पहल को दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।
पेटेंट परीक्षण में नई पारदर्शिता
इस समझौते के तहत ब्राजील के पेटेंट कार्यालय को पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी तक पहुंच प्राप्त होगी। पेटेंट परीक्षा और अनुदान की प्रक्रिया के दौरान टीकेडीएल डेटाबेस का उपयोग प्रायर आर्ट की पहचान के लिए किया जाएगा। इससे ऐसे आविष्कारों पर गलत पेटेंट दिए जाने की संभावना कम होगी, जो पहले से भारतीय पारंपरिक ज्ञान का हिस्सा हैं।
टीकेडीएल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा और ज्ञान प्रणालियों पर आधारित विश्व का पहला व्यवस्थित प्रायर आर्ट डेटाबेस है। इसका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान के दुरुपयोग, बायोपाइरेसी और अनुचित पेटेंट दावों को रोकना है। इस सहयोग से ब्राजील को अपनी पेटेंट परीक्षण प्रणाली की गुणवत्ता और दक्षता बढ़ाने में सहायता मिलेगी, वहीं भारत के लिए यह अपने ज्ञान संसाधनों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
समझौते का आदान-प्रदान और कार्यान्वयन
सहमति पत्र का आदान-प्रदान ब्राजील के विकास, उद्योग, व्यापार और सेवा उप मंत्री मार्सियो फर्नांडो एलियास रोजा तथा भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के सचिव पेरियासामी कुमारन ने किया।
इस समझौते के क्रियान्वयन का मार्गदर्शन ब्राजील के आईएनपीआई के अध्यक्ष जूलियो सीजर मोरेरा, सीएसआईआर की महानिदेशक एवं डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी तथा भारत में सीएसआईआर टीकेडीएल यूनिट की प्रमुख डॉ. विश्वजननी जे. सत्तिगेरी द्वारा किया जाएगा।
टीकेडीएल: एक वैश्विक मानक
पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी की स्थापना वर्ष 2001 में भारत सरकार ने सीएसआईआर और आयुष मंत्रालय के सहयोग से की थी। इसका मूल उद्देश्य भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों पर गलत पेटेंट को रोकना और देश की ज्ञान विरासत की रक्षा करना है।
टीकेडीएल में वर्तमान में आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा रिग्पा और योग से संबंधित 5.2 लाख से अधिक फॉर्मूलेशन और प्रक्रियाओं का संरचित दस्तावेजीकरण उपलब्ध है। यह जानकारी प्राचीन और आधिकारिक ग्रंथों से संकलित कर आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली के अनुरूप अनूदित और वर्गीकृत की गई है।
डेटाबेस अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी और स्पेनिश सहित पांच अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में उपलब्ध है। इससे वैश्विक पेटेंट परीक्षकों को भाषा और प्रारूप की बाधाओं से मुक्त होकर प्रभावी मूल्यांकन में सहायता मिलती है। गैर प्रकटीकरण समझौतों के माध्यम से अधिकृत पेटेंट कार्यालयों को इस डेटाबेस तक पहुंच दी जाती है।
ब्राजील के शामिल होने के बाद अब दुनिया भर में 18 पेटेंट कार्यालयों को टीकेडीएल तक पहुंच प्राप्त हो चुकी है।
प्रभाव और उपलब्धियां
टीकेडीएल को पारंपरिक ज्ञान के रक्षात्मक संरक्षण के क्षेत्र में एक वैश्विक मानक माना जाता है। इसके माध्यम से उपलब्ध कराए गए प्रायर आर्ट साक्ष्यों के आधार पर विश्व भर में 375 से अधिक पेटेंट आवेदनों को रद्द, अस्वीकृत, संशोधित अथवा वापस लिया जा चुका है।
भारत और ब्राजील के बीच यह सहयोग न केवल बौद्धिक संपदा अधिकारों के क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर पारंपरिक ज्ञान की वैध सुरक्षा के लिए एक सशक्त मॉडल के रूप में भी स्थापित होगा। यह पहल यह स्पष्ट संदेश देती है कि आधुनिक नवाचार व्यवस्था में पारंपरिक ज्ञान की भूमिका को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, बल्कि उसे विधिसम्मत संरक्षण भी प्रदान किया जा रहा है।