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भारत में जल्दी जाँच से ब्रेस्ट कैंसर के परिणामों में हो रहा है सुधार

आरजी हॉस्पिटल्स, कोलकाता ने इस बात पर जोर दिया है कि ब्रेस्ट कैंसर एक साइलेंट किलर बीमारी से बदलकर अब कई लोगों के लिए इलाज योग्य बीमारी बन गया है। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण ब्रेस्ट कैंसर का जल्दी पता लगना है। भारत में 2025 में ही अकेले लगभग 2.4 लाख नए केस सामने आए। पहले 57% से ज्यादा मरीज़ एडवांस स्टेज में आते थे, और उनके बचने की दर 40% से कम हो जाती थी। अब कुछ अच्छे बदलाव हुए हैं। ज्यादा जागरूकता और स्क्रीनिंग तक आसान उपलब्धता की वजह से ज्यादा महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर का जल्दी पता चल रहा है। स्टेज 1 में पता चलने पर 5 साल का सर्वाइवल रेट 90% या उससे भी ज्यादा हो सकता है। हालाँकि, ब्रेस्ट कैंसर अभी-भी एक बड़ी चिंता का विषय है। वर्ष 2022 में दुनिया भर में इससे लगभग 670,000 लोगों की मौत हुई। यह 185 देशों में से 157 में महिलाओं में सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर था। 2050 तक हर साल ब्रेस्ट कैंसर के नए केस 3.2 मिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है। इससे हर साल लगभग 1.1 मिलियन मौतें होंगी। इसका मतलब होगा कि 2022 की तुलना में मामलों में 38% और मौतों में 68% की बढ़ोतरी होगी।

जल्दी जाँच कराने का महत्व

भारत में और अन्य एशियाई देशों में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर अक्सर पश्चिमी देशों के मुकाबले 10 साल पहले होता है। ज्यादातर यह कैंसर 45 साल की उम्र के आसपास होता है। यह जेनेटिक्स, रोजमर्रा की आदतें और देरी से चेकअप कराने के कारण बढ़ता है। शहरी आबादी के पास मैमोग्राम करने के लिए उपलब्धता ज्यादा होती है। वहीं, गाँव में 70% से ज्यादा बेस्ट कैंसर का पता तीसरे या चौथे स्टेज में चलता है। इस दौरान इलाज बहुत ही मुश्किल हो जाता है। एनएफएचएस-5 जैसे राष्ट्रीय सर्वे दिखाते हैं कि अभी-भी देश में बेस्ट कैंसर की जाँच बहुत कम होती है। केवल लगभग 1% महिलाएँ ही मैमोग्राम और 0.9% महिलाएँ ही क्लीनिकल ब्रेस्ट एग्ज़ाम करवाती हैं, लेकिन आयुष्मान भारत जैसे प्रोग्राम 30 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर जाँच करवा रहे हैं, और आसान डोरस्टेप स्क्रीनिंग के लिए कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स (आशा) का इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारतीय महिलाओं के लिए स्मार्ट स्क्रीनिंग

भारत में एक ही स्क्रीनिंग का तरीका हर किसी के लिए काम नहीं करता, क्योंकि हमारे हालात और माहौल बहुत अलग अलग होते हैं। हर महीने खुद से ब्रेस्ट चेक करने से आपको नियंत्रण करने में मदद मिलती है। गाँठों की धीरे से जाँच करके, आप बदलावों का जल्दी पता लगा सकते हैं और जरूरत पड़ने पर समय पर मेडिकल मदद ले सकते हैं।

आरजी हॉस्पिटल्स कोलकाता की ब्रेस्ट सर्जरी, लेप्रोस्कॉपी/जनरल सर्जरी- सीनियर कंसल्टेंट डॉ ताप्ती सेन ने कहा, “हर साल एक ट्रेंड नर्स से क्लीनिकल ब्रेस्ट एग्ज़ाम (सीबीई) करवाना, समस्याओं का पता लगाने का एक भरोसेमंद और कम खर्चीला तरीका है। यह ज्यादातर लोगों के लिए उपलब्ध होता है। जिन महिलाओं को ज्यादा खतरा होता है जैसे कि जिनके परिवार में ब्रेस्ट कैंसर की हिस्ट्री रही हो या जिनके ब्रेस्ट डेंस हों, उन्हें डॉक्टर से बात करनी चाहिए और 40 साल की उम्र के आसपास मैमोग्राम शुरू करने के बारे में सोचना चाहिए।”

अल्ट्रासाउंड कम उम्र की महिलाओं के लिए बेहतर काम करता है। जिनके ब्रेस्ट टिशू घने होते हैं, जहाँ मैमोग्राम उतने असरदार नहीं हो सकते। भविष्य में जीनोम इंडिया ज्यादा कस्टमाइज़्ड देखभाल देने में मदद के लिए पर्सनल जेनेटिक रिस्क मैप बनाने का योजना बना रहा है।

डॉक्टर इस बीमारी को बहुत गंभीरता से लेते हैं। वे जल्दी पता लगा करके एचईआर2-टारगेटेड थेरेपी के साथ इलाज़ करते हैं, जिससे कैंसर के दोबारा होने का खतरा कम हो सकता है। यह तरीका कैंसर का जल्दी पता लगाने और हर व्यक्ति के लिए सही इलाज देने में मदद करता है। इससे कैंसर से जान बचने की संभावना और जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है।

भारत की ब्रेस्ट कैंसर की लड़ाई में तरक्की और रुकावटें

सरकार 19 स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट और 20 टर्शियरी सेंटर के साथ-साथ एनपीसीडीसीएस (नेशनल प्रोग्राम फॉर प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ कैंसर, डायबिटीज, कार्डियोवैस्कुलर डिजीज, एंड स्ट्रोक) स्क्रीनिंग प्रोग्राम के साथ कोशिशें तेज़ कर रही है, ताकि अच्छी देखभाल सबको मिल सके। एनपीसीडीसीएस, जैसा कि ज्यादातर लोग जानते हैं, भारत में एक बड़ी पहल है जिसका उद्देश्य कैंसर की रोकथाम, जल्दी डायग्नोसिस और असरदार इलाज़ के ज़रिए नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज (एनसीडी) के बढ़ते बोझ को कम करना है। इतने प्रयासों के बावजूद भी चुनौतियाँ अभी-भी बनी हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती इस बीमारी से जुड़ा कलंक और मिथक है, जिसकी वजह से लोग सामने आकर बीमारी को स्वीकार नहीं करते हैं। सिर्फ 20 से 30% महिलाओं को ही इसके खास लक्षणों के बारे में पता होता है। बिहार या उत्तर प्रदेश जैसी जगहों पर ब्रेस्ट कैंसर की देखभाल, लक्षण और रोकथाम के बारे में अभी-भी लोगों को ठीक से मालूम नहीं हैं। फिर भी बड़े पैमाने पर पोलियो ड्राइव में भारत की सफलता दिखाती है कि हम बड़े पैमाने पर काम करके ब्रेस्ट उन्मूलन का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अब समय आ गया है कि पिंक कैंपेन स्मार्ट, इंटेलिजेंस-लेड सिस्टम में बदल जाएं जो हर कोने तक असरदार तरीके से पहुँचें।

भविष्य की राह

ब्रेस्ट हेल्थ के बारे में खुलकर बात करके आज ही अपने परिवार को जागरूक करें। सभी को नियमित चेकअप करवाने के लिए बढ़ावा दें ताकि वे किसी भी बदलाव को जल्दी देख सकें। 30 साल की उम्र के बाद हर साल क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्ज़ाम (सीबीई) करवाने की आदत डालें। यदि आप हाई-रिस्क ग्रुप में हैं, तो सुरक्षित रहने के लिए नियमित मैमोग्राम भी करवाएँ। डिजिटल हेल्थ प्रोग्राम अब चेक-अप और रेफरल को ट्रैक करने में मदद करते हैं, ताकि कुछ भी न छूटे। जागरूकता और जल्दी कार्रवाई से जान बचाई जा सकती हैं।

Muskan Singh

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