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युद्ध के बाद भी जिंदा रहती त्रासदी: शांति की पुकार

4 अप्रैल –  “बारूदी सुरंग जागरूकता हेतु अंतर्राष्ट्रीय दिवस”

यह दिवस भूमि में बिछाई गई बारूदी सुरंगों के खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनके निष्कासन के प्रयासों को समर्थन देने के उद्देश्य से मनाया जाता है। मानव इतिहास में युद्ध केवल सीमाओं के संघर्ष नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सभ्यताओं, संस्कृतियों और मानवता को गहरे घाव दिए हैं। 4 अप्रैल को मनाया जाने वाला यह दिवस हमें उस भयावह सच्चाई से रूबरू कराता है कि युद्ध समाप्त हो जाने के बाद भी उसकी विभीषिका समाप्त नहीं होती। ज़मीन के भीतर छिपी बारूदी सुरंगें- माइंस- सालों तक निर्दोष लोगों की जान लेती रहती हैं और जीवन को अपंग बना देती हैं।

विकास, शांति और सुरक्षा के इस आधुनिक युग में भी दुनिया के कई हिस्से ऐसे हैं जहाँ लोग हर कदम सोच-समझकर रखते हैं, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि अगला कदम उनके जीवन का अंतिम कदम बन सकता है। खेत, रास्ते, गाँव सब कुछ असुरक्षित हो जाता है। यह विडंबना ही है कि जो ज़मीन जीवन देने का स्रोत होती है, वही मौत का जाल बन जाती है।

सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब इन विस्फोटों का शिकार आम नागरिक, बच्चे और किसान बनते हैं। जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं होता, वही इसकी कीमत चुकाते हैं। यह न केवल शारीरिक क्षति है, बल्कि मानसिक आघात और सामाजिक असुरक्षा का भी कारण बनता है। एक व्यक्ति के घायल होने से पूरा परिवार और समुदाय प्रभावित होता है। यह दिवस केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में सक्रिय होने का आह्वान भी है। बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय करने , पीड़ितों के पुनर्वास और जागरूकता फैलाने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं।         

अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी विकास और मानवीय दृष्टिकोण ही इस समस्या का समाधान प्रदान कर सकते हैं। इसके साथ ही यह दिन हमें यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या युद्ध वास्तव में किसी समस्या का समाधान है? या यह केवल नई समस्याओं को जन्म देता है? शांति, संवाद और कूटनीति ही वह मार्ग हैं जो स्थायी समाधान प्रदान कर सकते हैं। मानवता की रक्षा के लिए हमें युद्ध की मानसिकता से ऊपर उठकर सहअस्तित्व की भावना को अपनाना होगा।

अंततः, यह दिवस हमें एक गहरा संदेश देता है कि शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि सुरक्षा, विश्वास और मानवीय गरिमा की स्थापना है। जब तक दुनिया का हर कोना सुरक्षित नहीं होगा, तब तक मानवता पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकती।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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