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अतिथि बनकर जाएं तो न दिखाएं नखरे

भारतीय संस्कृति में “अतिथि देवो भवः” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य है। हमारे यहाँ अतिथि का आगमन शुभ माना जाता है। घर की रसोई में हलचल बढ़ जाती है, बैठक सजी-धजी लगने लगती है और मन में एक सहज उत्साह जाग उठता है कि आने वाला व्यक्ति अपनेपन और आदर का अनुभव करे। परंतु विडंबना यह है कि कभी-कभी कुछ अतिथि अनजाने में ही इस आत्मीयता पर पानी फेर देते हैं सिर्फ इस कारण कि वे चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक या परोसे गए नाश्ते को लेकर नखरे दिखाने लगते हैं।

आज के बदलते समय में खान-पान की पसंद-नापसंद स्वाभाविक है। किसी को चाय नहीं पसंद, किसी को कॉफी नहीं जंचती, कोई कोल्ड ड्रिंक से परहेज़ करता है। परंतु समस्या तब खड़ी होती है जब इन बातों को ऐसे ढंग से कहा जाए कि मेजबान असहज हो जाए। “मैं तो चाय नहीं पीता”, “कॉफी से मुझे एलर्जी है”, “कोल्ड ड्रिंक बिल्कुल नहीं”, “ये बिस्कुट नहीं खाता”, “तेल ज्यादा है” ऐसी टिप्पणियाँ यदि संवेदनशीलता के बिना कही जाएँ तो मेजबान की भावना आहत हो सकती है।

मेजबानी केवल परोसना नहीं, भावना है

जब कोई व्यक्ति अपने घर पर किसी को आमंत्रित करता है, तो वह केवल चाय या नाश्ता नहीं परोसता वह अपनी भावनाएँ, अपना समय और अपनी श्रद्धा परोसता है। वह सोचता है कि अतिथि को क्या अच्छा लगेगा, घर में क्या उपलब्ध है, कैसे स्वागत किया जाए। ऐसे में यदि अतिथि हर वस्तु में कमी निकालने लगे या बार-बार मना करता रहे, तो मेजबान के लिए स्थिति दुविधापूर्ण हो जाती है।

सोचिए, यदि आप किसी के घर जाएँ और मेजबान बार-बार पूछे—तो फिर आप क्या लेंगे?”—और हर उत्तर में ‘न’ ही मिले, तो अंततः वह क्या परोसे? उसकी आतिथ्य-भावना कहाँ व्यक्त हो? अतिथि के रूप में हमारा दायित्व भी कम नहीं है। यदि हमें किसी चीज़ से चिकित्सकीय कारणों से परहेज़ है, तो विनम्रता से पहले ही सूचित कर देना उचित है। परंतु सामान्य परिस्थितियों में जो भी स्नेहपूर्वक परोसा जाए, उसका थोड़ा-सा स्वाद लेकर धन्यवाद कहना ही शिष्टाचार है।

सच तो यह है कि अतिथि का उद्देश्य भोजन नहीं, संबंधों की ऊष्मा होना चाहिए। यदि हम केवल स्वाद और पसंद के आधार पर प्रतिक्रिया देंगे, तो संबंधों की मिठास फीकी पड़ सकती है।

‘ना’ कहने की भी एक संस्कृति हो

जीवन में हर बात स्वीकार करना आवश्यक नहीं, परंतु उसे कहने का तरीका बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि सचमुच चाय नहीं पीते, तो मुस्कुराकर कहा जा सकता है “यदि संभव हो तो मुझे सादा पानी ही दे दीजिए।” या “थोड़ी-सी चाय ले लूंगा।” इससे मेजबान को यह अनुभव होता है कि आपने उसकी भावना का सम्मान किया।

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कटु या उपेक्षापूर्ण ढंग से इनकार करना सामाजिक शिष्टाचार के विपरीत है। यह ध्यान रखना चाहिए कि हम किसी होटल या रेस्तरां में नहीं, किसी के घर में बैठे हैं जहाँ औपचारिकता से अधिक आत्मीयता होती है। हम अक्सर भूल जाते हैं कि किसी के घर जाकर हम उसके संसाधनों का नहीं, उसके मन का आदर करते हैं। अतिथि का सौम्य व्यवहार ही मेजबान के लिए सबसे बड़ा उपहार होता है। यदि हम हर चीज़ में चयन और आलोचना की दृष्टि रखेंगे, तो धीरे-धीरे लोग बुलाने से कतराने लगेंगे। संबंधों की डोर बहुत कोमल होती है। एक छोटी-सी टिप्पणी भी उसमें गांठ डाल सकती है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार में सहजता और विनम्रता बनाए रखें।  आज की पीढ़ी अधिक स्पष्टवादी है, जो अच्छी बात है। परंतु स्पष्टता और असंवेदनशीलता में अंतर है। बच्चों को यह सिखाना होगा कि अतिथि बनना भी एक कला है। यदि उन्हें कुछ पसंद न हो, तो विनम्रता से कैसे कहें; और यदि संभव हो तो थोड़ा-सा स्वीकार कर संबंधों की मिठास बनाए रखें। अतिथि बनकर जाना केवल मिलने-जुलने की औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। हमें यह समझना होगा कि किसी के घर परोसी गई चाय या नाश्ता केवल खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि सम्मान और स्नेह का प्रतीक है।

आइए, हम अतिथि बनकर आलोचक नहीं, संबंधों के संरक्षक बनें। जो भी प्रेमपूर्वक परोसा जाए, उसका आनंद लें क्योंकि स्वाद से अधिक महत्त्व उस भावना का है, जिसके साथ वह हमारे सामने रखा गया है। यदि हम इतना भर सीख जाएँ, तो “अतिथि देवो भवः” केवल दीवारों पर लिखा वाक्य नहीं, हमारे व्यवहार का सजीव सत्य बन जाएगा।

डा. पंकज भारद्वाज 
डा. पंकज भारद्वाज 
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