21 मार्च विश्व वानिकी दिवस पर विशेष
भारतवर्ष में वनसंपदा का बहुत महत्व है। मान्यता है कि सघन वनों की छाया में ही भारतीय संस्कृति पनपी है। भारतीय जनमानस को इन्हीं वनों की छाया में साधनारत महापुरुषों से समय समय पर आदर्श जीवन संदेश प्राप्त होता रहा है। वृक्षों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्ता के अतिरिक्त भारतीय जन जीवन में वृक्षों का अधिकाधिक महत्व भी हैं। लकड़ी की उपयोगिता तो रही ही है, साथ ही पत्तियों, फूलों और फलों आदि का भी विशेष महत्व रहा है । वैद्यक शास्त्र में इन वस्तुओं की बड़ी महिमा तथा उपयोगिता बताई गई है।
भारत वर्ष के अविभाजित मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित) का यह भू-भाग, काफी पहले से अपने वनाच्छादित सौदर्य के लिये प्रसिद्ध रहा है! विंध्य पर्वतमाला के दक्षिण में ही स्थित रहा है! वह गहन वनक्षेत्र वही स्थित रहा है! उस गंभीर वनक्षेत्र का काफी बड़ा भाग जो दण्डक वन अथवा दण्डक अरण्य कहलाता था! आज भी प्रदेश का सत्ताईस प्रतिशत भू भाग वनाच्छादित है! वास्तव में प्रदेश का वन परिवेश अनुपम अदभूत हैं! वनसंपदा की दृष्टि से प्रदेश देश का सर्वाधिक समृद्धिशाली राज्य हैं। इस राज्य को प्रकृति ने विशाल वनसंपदा प्रदान की हैं! प्रदेश में लगभग हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन हैं, जो राज्य में भू भाग का लगभग पैंतीस प्रतिशत पर्यावरण, भूमि तथा जलीय दृष्टि से हमारे वन देश के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं! संपूर्ण देश की आदिवासी जनसंख्या का बीस प्रतिशत मध्यप्रदेश में हैं! और उनमें से अधिकांश वनक्षेत्र में निवास करते हैं! इनके हित वनों से जुड़े हुये हैं! सात प्रमुख नदियों का जल स्त्रोत एवं पर्यावरण का आधार होने के साथ साथ हमारे जंगलों पर बढ़ती हुई आबादी का प्रभाव तो हैं ही साथ ही साथ आबादी की बढ़ती हुई जरूरतों से भी कम प्रभावित हो रहे हैं।

वनों के बिना देश प्रदेश की कल्पना नहीं कर सकते हैं! देश के विकास, आर्थिक संपन्नता का आत्मनिर्भरता की कुंजी हरित प्रदेशों में निहित है! यह न केवल अपनी बल्कि अपने पड़ोसी राज्यों की भी जरूरतों को पूरा करते रहे हैं। स्पष्ट है कि पर्यावरण और सामाजिक मनुष्य की आर्थिक विकास की पूर्ति के राष्ट्रीय संदर्भ में इन प्रदेशों का बहुत बड़ा महत्व है। जैसे अविभाजित मध्यप्रदेश लगभग 15 लाख घन मीटर लकड़ी तीन करोड़ बांस, 50 लाख मानक बोरा तेंदूपत्ता, चालीस हजार टन साल बीज, दस हजार टन हरी और अनेक महत्वपूर्ण यनोपज का उत्पादक यह प्रदेश सामाजिक, व्यापारिक और औद्योगिक आवश्यकताओं पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देता है। समय के साथ वानिकी की सोच में परिवर्तन आया हैं। अब जनकल्याण और सहयोग की विचारधारा प्रबल हुई हैं। अनेक प्रयास भी हो रहे हैं, जिसके माध्यम से वानिकी ग्राम विकास का पर्याय बन रही है। सामाजिक वानिकी कार्यक्रम का उददेश्य उजडे और वनस्पति विहीन क्षेत्रों को समाज के लाभ के लिये फिर से हरा भरा बनाना है।
प्रदेश सरकार ने जनता के सहयोग से जनता के लिये वन लगाने की योजना शुरू की है। पूर्व में परम्परागत वानिकी के तहत आरक्षित और सुरक्षित वनों में वन विभाग की ओर से पौध रोपण कर उनकी रक्षा की जाती थी। इस उत्पादक योजना का मुख्य उददेश्य राज्य के आर्थिक स्त्रोतों में वृद्धि करना था ।किन्तु सामाजिक वानिकी का मुख्य लक्ष्य जन जन में, सार्वजनिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं, ग्रामीण पंचायतों में वनों के प्रति आस्था जागृत कर उनका संरक्षण करना है। वन विभाग की प्राथमिकताएं निम्न हैं- विद्यमान वनों को सुरक्षित रखना, वनों का विकास तथा वनक्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ाना, जनता को वानिकी से जोड़ते हुये वृक्षारोपण और वानिकी को बढ़ावा देना।

