सन् 1882 में जर्मन वैज्ञानिक राबर्ट कोच ने क्षय रोग (टीबी) के जीवाणु माइको बैक्टेरियम ट्यूबरक्यूलोसिस की खोज की थी। इस खोज ने चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा दी और मानवता को एक घातक बीमारी से लड़ने की वैज्ञानिक आधारशिला प्रदान की।परंतु एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी प्रश्न बना हुआ है – क्या हम टीबी को इतिहास बना पाए हैं, या यह अब भी वर्तमान की कठोर सच्चाई है?
क्षय रोग एक संक्रामक बीमारी है, जो मुख्यतः फेफड़ों को प्रभावित करती है, परंतु शरीर के अन्य अंगों पर भी असर डाल सकती है। आधुनिक दवाओं और उपचार पद्धतियों के बावजूद, टीबी आज भी दुनिया के कई देशों में मृत्यु और बीमारी का प्रमुख कारण बनी हुई है। यह विडंबना है कि टीबी का इलाज संभव और उपलब्ध है, फिर भी लाखों लोग समय पर जांच और उपचार से वंचित रह जाते हैं। इसका कारण केवल स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि गरीबी, कुपोषण, भीड़भाड़, और जागरूकता का अभाव है।स्पष्ट है टीबी एक चिकित्सा समस्या होने के साथ-साथ सामाजिक असमानता का दर्पण भी है।

