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एआई आधारित समाधान से समयपूर्व जन्म की चुनौती से निपटने की दिशा में भारत की बड़ी पहल: 12,000 महिलाओं पर सबसे बड़ा प्रेग्नेंसी कोहोर्ट अध्ययन

नई दिल्ली: मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत ने एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि की ओर कदम बढ़ाया है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष मामलों के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि GARBH-INi पहल के तहत 12,000 महिलाओं पर आधारित देश का सबसे बड़ा प्रेग्नेंसी कोहोर्ट अध्ययन समय से पहले जन्म की गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में एक निर्णायक प्रयास है। इस अध्ययन का उद्देश्य स्वदेशी और एआई आधारित समाधान विकसित करना है, जो भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप हों।

डॉ. जितेंद्र सिंह नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित “GARBH-INi के निष्कर्षों और परिणामों का प्रसार” कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। यह पहल जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संचालित है, जिसमें देश के प्रमुख वैज्ञानिक, शोधकर्ता और नीति विशेषज्ञ शामिल हुए। कार्यक्रम में जैव प्रौद्योगिकी सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले, नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. पॉल, ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक डॉ. गणेशन कार्तिकेयन सहित कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित रहीं।

अपने संबोधन में डॉ. सिंह ने कहा कि समय से पहले जन्म नवजात मृत्यु दर और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का एक प्रमुख कारण है, और वैश्विक स्तर पर इसके बोझ में भारत की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है। ऐसे में भारतीय जनसंख्या और परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। उन्होंने कहा कि GARBH-INi कार्यक्रम इस दिशा में एक व्यापक, डेटा आधारित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें क्लिनिकल महामारी विज्ञान, मल्टी ओमिक्स बायोमार्कर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समन्वय किया गया है।

इस पहल के तहत लगभग 12,000 गर्भवती महिलाओं का सफलतापूर्वक पंजीकरण किया गया है, जो दक्षिण एशिया के सबसे बड़े गर्भावस्था समूहों में से एक है। इस अध्ययन के दौरान 1.6 मिलियन से अधिक वर्गीकृत जैव नमूने और 10 लाख से अधिक अल्ट्रासाउंड छवियां एकत्रित की गई हैं, जो अनुसंधान के लिए एक मजबूत और विश्वसनीय आधार प्रदान करती हैं।

डॉ. सिंह ने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं। इनमें भारतीय महिलाओं के लिए विशेष रूप से विकसित एआई आधारित गर्भावस्था डेटिंग मॉडल, समयपूर्व जन्म के माइक्रोबायोम आधारित संकेतकों की पहचान, त्वरित निदान उपकरणों का विकास और प्रारंभिक जोखिम मूल्यांकन के लिए आनुवंशिक मार्करों की खोज शामिल है। उन्होंने कहा कि ये सभी उपलब्धियां मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएंगी।

कार्यक्रम के दौरान GARBH-INi पहल की प्रमुख उपलब्धियों को संकलित करने वाले एक विशेष संग्रह का विमोचन भी किया गया। इसके साथ ही राष्ट्रीय बायो रिपॉजिटरी और GARBH-INi DRISHTI डेटा साझा मंच की स्थापना की गई है, जिससे देश और दुनिया के शोधकर्ताओं को व्यापक स्तर पर डेटा तक पहुंच मिल सकेगी और वैश्विक वैज्ञानिक अनुसंधान को गति मिलेगी।

इस अवसर पर कई महत्वपूर्ण साझेदारियों और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों को भी औपचारिक रूप दिया गया। सुन्दयोता नुमांडिस प्रोबायोस्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड को माइक्रोबायोम आधारित बायोथेराप्यूटिक्स तकनीक हस्तांतरित की गई, जबकि DOTO हेल्थ प्राइवेट लिमिटेड और Qure.ai टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के साथ एआई सक्षम अल्ट्रासाउंड रिपोर्टिंग और जोखिम आकलन मंच विकसित करने के लिए आशय पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए। GARBH-INi AnandiMaa पहल के अंतर्गत यह कदम तकनीकी नवाचार को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले परिवारों को भी सम्मानित किया और उनके योगदान को वैज्ञानिक प्रगति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि मातृ और शिशु स्वास्थ्य केवल एक सामाजिक विषय नहीं, बल्कि देश के भविष्य के विकास का आधार है। आज जन्म लेने वाले बच्चे ही वर्ष 2047 में भारत की उत्पादकता और क्षमता को निर्धारित करेंगे।

उन्होंने भारत की तेजी से बढ़ती जैव अर्थव्यवस्था का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 2014 में लगभग 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर यह क्षेत्र आज लगभग 195 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है। इस वृद्धि में जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र की अहम भूमिका रही है, जिसने भारत को वैश्विक स्तर पर निवारक और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में एक सशक्त पहचान दिलाई है।

नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. पॉल ने कहा कि कार्यक्रम के अगले चरण में विकसित उपकरणों और पूर्वानुमान मॉडल्स के प्रभावी उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। उन्होंने निरंतर वैज्ञानिक अनुसंधान, मजबूत सहयोग और परिणामों के गहन विश्लेषण की आवश्यकता पर बल दिया।

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