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महाराज छत्रसाल बुंदेला का संघर्ष सत्ता के लिए नहीं,  आत्मसम्मान और स्वराज के लिए 

महाराजा छत्रसाल बुंदेला जयंती (4 मई) पर विशेष आलेख

भारत के इतिहास में वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता संग्राम की जब भी चर्चा होती है, तो बुंदेलखंड के महान योद्धा महाराजा छत्रसाल बुंदेला का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। 4 मई को उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरण करना न केवल उनके पराक्रम को नमन करना है, बल्कि उस स्वतंत्रता चेतना को भी याद करना है, जिसने मुगलकालीन दमन के विरुद्ध जन-जन में आत्मविश्वास जगाया।

महाराजा छत्रसाल का जन्म 4 मई 1649 को बुंदेलखंड क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता चंपतराय बुंदेला स्वयं एक पराक्रमी योद्धा थे, जिन्होंने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया। बाल्यकाल से ही छत्रसाल ने युद्ध कौशल, शौर्य और स्वाधीनता की भावना अपने पिता से ही सीखी। कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े छत्रसाल ने अपने जीवन का उद्देश्य अन्याय के विरुद्ध संघर्ष को बना लिया।

युवावस्था में छत्रसाल ने दक्षिण भारत जाकर छत्रपति शिवाजी महाराज से भेंट की। शिवाजी महाराज के स्वराज और गुरिल्ला युद्ध नीति से वे अत्यंत प्रभावित हुए। कहा जाता है कि शिवाजी ने उन्हें बुंदेलखंड लौटकर वहां स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। यही प्रेरणा आगे चलकर उनके जीवन का आधार बनी।

छत्रसाल बुंदेला ने मुगलों के विरुद्ध सशक्त संघर्ष छेड़ा और धीरे-धीरे बुंदेलखंड के विशाल क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया। उन्होंने न केवल युद्ध में विजय प्राप्त की, बल्कि एक सुदृढ़ और सुव्यवस्थित राज्य की नींव भी रखी। उनका शासन न्यायप्रिय, धर्मनिरपेक्ष और जनकल्याणकारी था।

महाराजा छत्रसाल ने मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में कई युद्ध लड़े। उन्होंने मुगल सेना के विरुद्ध गुरिल्ला पद्धति अपनाई और अनेक बार उन्हें पराजित किया। उनका संघर्ष केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वराज के लिए था।

जीवन के अंतिम चरण में जब मुगल सेनापति मोहम्मद खान बंगश ने उन पर आक्रमण किया, तब छत्रसाल ने मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम से सहायता मांगी। बाजीराव ने समय पर पहुंचकर बंगश को पराजित किया और छत्रसाल को पुनः उनका राज्य दिलाया। इस सहयोग के प्रतीक स्वरूप छत्रसाल ने अपने राज्य का एक भाग बाजीराव को सौंप दिया। महाराजा छत्रसाल केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और कला के संरक्षक भी थे। उन्होंने अनेक मंदिरों, तालाबों और धर्मस्थलों का निर्माण कराया। उनका दरबार विद्वानों और कवियों का केंद्र था। प्रसिद्ध कवि कवि भूषण ने उनकी वीरता का गुणगान किया है।

छत्रसाल का जीवन त्याग, पराक्रम और न्याय का अद्भुत संगम था। वे प्रजा के प्रति अत्यंत संवेदनशील और न्यायप्रिय शासक थे। उन्होंने हमेशा धर्म और मानवता को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है।

महाराजा छत्रसाल का निधन 1731 में हुआ, लेकिन उनकी वीरगाथाएं आज भी बुंदेलखंड की धरती पर गूंजती हैं। उनके द्वारा स्थापित राज्य और उनकी नीतियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनीं।

महाराजा छत्रसाल बुंदेला भारतीय इतिहास के उन महान नायकों में से हैं, जिन्होंने अपने बल, बुद्धि और साहस से स्वराज की स्थापना की। उनकी जयंती पर हमें उनके आदर्शों,स्वाभिमान, न्याय और राष्ट्रप्रेम—को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।

“जो झुका नहीं, जो रुका नहीं, वही छत्रसाल कहलाया,

बुंदेलों की आन-बान का है जिसने परचम लहराया।।”

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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