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सुपरनोवा SN 2023zcu का अध्ययन ब्रह्मांडीय दूरी मापन में बनेगा महत्वपूर्ण आधार

नई दिल्ली/नैनीताल। पृथ्वी से लगभग 9.07 करोड़ प्रकाश-वर्ष दूर स्थित सर्पिल आकाशगंगा एनजीसी 2139 में वर्ष 2023 में खोजे गए सुपरनोवा SN 2023zcu के विस्तृत अध्ययन ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सुपरनोवा की प्रकृति और विकास को समझने से ब्रह्मांडीय दूरी मापन प्रणाली को और अधिक सटीक बनाया जा सकेगा।

यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अधीन स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES), नैनीताल के वैज्ञानिकों मोनालिसा दुबे, डॉ. कुंतल मिश्रा और नवीन दुकिया सहित अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम द्वारा किया गया है। शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित शोध पत्रिका “द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल” में प्रकाशित हुए हैं।

क्या होता है सुपरनोवा

सुपरनोवा ब्रह्मांड में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोटों में से एक है। जब कोई विशाल तारा अपना परमाणु ईंधन समाप्त कर देता है और गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध स्वयं को संभाल नहीं पाता, तब उसका कोर ढह जाता है और एक भीषण विस्फोट होता है। इस प्रक्रिया को “कोर-कोलैप्स सुपरनोवा” कहा जाता है।

SN 2023zcu को “टाइप IIP सुपरनोवा” श्रेणी में रखा गया है। इस प्रकार के सुपरनोवा सामान्यतः लाल महादानव तारों (Red Supergiant Stars) से उत्पन्न होते हैं, जिनका द्रव्यमान सूर्य से लगभग 8 से 17 गुना तक होता है। शोधपत्र के अनुसार, SN 2023zcu का मूल तारा लगभग 12 से 15 सौर द्रव्यमान का था।

विस्फोट के एक दिन के भीतर हुई खोज

SN 2023zcu की खोज 8 दिसंबर 2023 को ATLAS सर्वेक्षण द्वारा की गई थी। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे विस्फोट के लगभग एक दिन के भीतर ही पहचान लिया गया। इससे शोधकर्ताओं को इसके प्रारंभिक विकास चरणों का अत्यंत सटीक अवलोकन करने का अवसर मिला।

यह सुपरनोवा आकाशगंगा NGC 2139 में स्थित है, जिसका रेडशिफ्ट 0.006124 दर्ज किया गया है। शोधकर्ताओं ने इसकी दूरी लगभग 27.8 ± 2.0 मेगापार्सेक (करीब 9.07 करोड़ प्रकाश-वर्ष) आंकी है।

दूरी मापन में क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन

वैज्ञानिकों ने SN 2023zcu की दूरी निर्धारित करने के लिए “एक्सपैंडिंग फोटोस्फेरिक मेथड” (EPM) का उपयोग किया। इस तकनीक में सुपरनोवा की फैलती हुई सतह के वास्तविक आकार और उसकी चमक के तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर दूरी का अनुमान लगाया जाता है।

टाइप IIP सुपरनोवा इस तकनीक के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माने जाते हैं, क्योंकि इनमें हाइड्रोजन की मोटी बाहरी परत मौजूद रहती है, जो एक स्पष्ट और सुव्यवस्थित सतह बनाती है। इससे तापमान और विस्तार वेग का अधिक सटीक मापन संभव हो पाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन भविष्य में ब्रह्मांडीय दूरी मापन की विश्वसनीयता को मजबूत करने में सहायक होगा।

प्रारंभिक स्पेक्ट्रा में मिले महत्वपूर्ण संकेत

अध्ययन के दौरान प्राप्त प्रारंभिक स्पेक्ट्रा में सुपरनोवा पदार्थ और आसपास की गैस के बीच सीमित अंतःक्रिया के संकेत मिले। इससे अनुमान लगाया गया कि विस्फोट से पहले तारे ने अपेक्षाकृत कम मात्रा में द्रव्यमान खोया था।

विकास के दौरान स्पेक्ट्रा में हाइड्रोजन की प्रमुख विशेषताओं के साथ-साथ लोहा, कैल्शियम, सोडियम और मैग्नीशियम जैसे तत्वों की उपस्थिति दर्ज की गई। निहारिका अवस्था में ऑक्सीजन, लोहा और कैल्शियम की निषिद्ध उत्सर्जन रेखाएं भी स्पष्ट रूप से दिखाई दीं, जो तारकीय विस्फोट के दौरान भारी तत्वों के निर्माण की पुष्टि करती हैं।

ऊर्जा और चमक का विश्लेषण

शोधकर्ताओं ने सुपरनोवा की बोलोमेट्रिक ल्यूमिनोसिटी का मॉडल तैयार कर उसकी कुल ऊर्जा का अध्ययन किया। इसके आधार पर अनुमान लगाया गया कि विस्फोट की ऊर्जा लगभग 2 × 10⁵¹ एर्ग थी, जो सामान्य लाल महादानव तारों के विस्फोटों के अनुरूप है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि सुपरनोवा का प्रकाश वक्र लगभग 100 दिनों तक स्थिर “पठारी अवस्था” में बना रहा, जो टाइप IIP सुपरनोवा की प्रमुख विशेषता मानी जाती है।

ब्रह्मांड की समझ को मिलेगा नया आयाम

वैज्ञानिकों का कहना है कि सुपरनोवा केवल विस्फोट नहीं होते, बल्कि वे ब्रह्मांड में भारी तत्वों के निर्माण और वितरण के प्रमुख स्रोत हैं। इन्हीं तत्वों से आगे चलकर नए तारे, ग्रह और जीवन की आधारभूत संरचनाएं बनती हैं। SN 2023zcu का यह अध्ययन न केवल टाइप IIP सुपरनोवा की संरचना और विकास को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा, बल्कि भविष्य में ब्रह्मांड की दूरी, विस्तार और विकास से जुड़े शोधों को भी नई दिशा प्रदान करेगा।

Source: https://ui.adsabs.harvard.edu/abs/2026ApJ…999…93D/abstract

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