कितना संघर्ष पूर्ण है इक मजदूर का दैनिक जीवन
जलती भू पे सतत परिश्रम से है क्लांत उसका यौवन
है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम…
पर्वत काट बनाता राहें,नव निर्माण श्रमिक ही करता
कभी न श्रम से पीछे हटता,किसी काम से कभी न डरता
है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम…
बांध बनाता नदियों पर ये, रेलों पर पटरियां बिछाता
श्रम की शक्ति से यही श्रमिक कारखाने,भवन बनाता
है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम…
अपना तन ढकने के लिए फटा पुराना है उसका लिबास
फिर भी उसे अपने कंधों पे उत्तरदायित्व का है एहसास
है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम…
खदानें खोदकर ये कोयले को जगमग हीरा है बनाता
प्रतिदिन श्रम के स्वेद कणों से सिंचित जीवन ये है जीता
है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम…
खेत में करता मेहनत पूरी,तब मिलती उसको मजदूरी
रेगिस्तान की वंध्या धरती पर भी खिलाता ये फुलवारी
है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम…
यदि इस जग में मेहनतकश मजदूरों का जन्म न होता
न ही होता कोई ताजमहल और न ही हवामहल होता
है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम…
आओ,हम सब मिलकर इनको इस जग में सम्मान दिलाएं
जिनके श्रम से जीवित हैं हम, उनको अपना मीत बनाएं
क्योंकि, है श्रम शक्ति का यज्ञ श्रेष्ठतम… !!!

लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
