विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस 28 मई पर विशेष
मासिक धर्म महिलाओं के जीवन की एक स्वाभाविक और महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है, लेकिन विडंबना यह है कि आज भी समाज के अनेक हिस्सों में इस विषय पर खुलकर चर्चा नहीं की जाती। कई सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओं के कारण मासिक धर्म को आज भी संकोच, शर्म या अपवित्रता से जोड़कर देखा जाता है। परिणामस्वरूप अनेक किशोरियां और महिलाएं इससे जुड़ी सही जानकारी, स्वास्थ्य सेवाओं और आवश्यक सहयोग से वंचित रह जाती हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि मासिक धर्म न केवल महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य का अभिन्न हिस्सा है, बल्कि उनके समग्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

इसी जागरूकता को बढ़ावा देने और मासिक धर्म से जुड़े मिथकों एवं सामाजिक कलंक को समाप्त करने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 28 मई को विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है। इस तिथि का चयन भी प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। मई वर्ष का पांचवां महीना है, जो मासिक धर्म की औसत पांच दिन की अवधि का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि 28 तारीख औसत मासिक चक्र की लंबाई को दर्शाती है। वर्ष 2026 की थीम “एक मासिक धर्म अनुकूल दुनिया के लिए एक साथ” रखी गई है, जो इस दिशा में सामूहिक प्रयासों और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन लगभग सात वर्षों तक मासिक धर्म का अनुभव करती है। सामान्यतः रक्तस्राव तीन से सात दिनों तक रहता है और मासिक चक्र लगभग 28 दिनों का होता है, हालांकि यह 21 से 35 दिनों के बीच भी भिन्न हो सकता है। इस अवधि के दौरान शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।
मासिक धर्म चक्र के दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोनों के स्तर में उतार चढ़ाव होता है। इन परिवर्तनों का प्रभाव मस्तिष्क में उपस्थित सेरोटोनिन जैसे रसायनों पर पड़ता है, जो व्यक्ति की मनोदशा, ऊर्जा स्तर और भावनात्मक संतुलन को नियंत्रित करते हैं। यही कारण है कि अनेक महिलाओं को इस दौरान चिड़चिड़ापन, चिंता, उदासी, थकान और मनोदशा में अचानक बदलाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 30 से 80 प्रतिशत महिलाओं में प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम अर्थात पीएमएस के लक्षण देखे जाते हैं। यह एक सामान्य स्थिति है, जिसमें मासिक धर्म शुरू होने से कुछ दिन पहले शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ महिलाओं में इसका अधिक गंभीर रूप प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर अर्थात पीएमडीडी विकसित हो सकता है। इस स्थिति में भावनात्मक और मानसिक लक्षण इतने तीव्र हो सकते हैं कि दैनिक जीवन, कार्यक्षमता और सामाजिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है।
मासिक धर्म से पहले और उसके दौरान महिलाओं को अनेक प्रकार के शारीरिक लक्षणों का अनुभव हो सकता है। इनमें स्तनों में संवेदनशीलता बढ़ना, भूख में बदलाव, वजन बढ़ना, पेट फूलना, पीठ दर्द, सिरदर्द, जी मिचलाना, कब्ज और सामान्य शारीरिक असहजता शामिल हैं। इसके साथ ही मानसिक और भावनात्मक स्तर पर चिड़चिड़ापन, छोटी छोटी बातों पर गुस्सा आना, अचानक उदासी महसूस होना, रोने की इच्छा होना, अत्यधिक थकान, बेचैनी, घबराहट, एकाग्रता में कमी, आत्मविश्वास में गिरावट तथा कुछ विशेष खाद्य पदार्थों के प्रति तीव्र इच्छा जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। गंभीर मामलों में निराशा या आत्महत्या जैसे नकारात्मक विचार भी उत्पन्न हो सकते हैं, जिन्हें कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
मासिक धर्म से जुड़े मानसिक और शारीरिक प्रभावों को कम करने के लिए उचित स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां अत्यंत आवश्यक हैं। स्वच्छता के दृष्टिकोण से सैनिटरी पैड को हर चार से छह घंटे में बदलना चाहिए या आवश्यकता होने पर उससे पहले भी बदल देना चाहिए। मासिक धर्म उत्पादों को बदलने से पहले और बाद में हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोना चाहिए। साफ और हवादार अंतर्वस्त्र पहनना तथा सुगंधित उत्पादों के अत्यधिक उपयोग से बचना भी आवश्यक है। प्रयुक्त उत्पादों का सुरक्षित निपटान किया जाना चाहिए। यदि कपड़े के पुनः उपयोग योग्य पैड का प्रयोग किया जाता है तो उन्हें अच्छी तरह धोकर धूप में सुखाना चाहिए। इसके अतिरिक्त महिलाओं को अपने मासिक चक्र, रक्तस्राव की मात्रा, दर्द और अन्य लक्षणों पर नियमित रूप से नजर रखनी चाहिए। यदि रक्तस्राव, दर्द, स्राव या दुर्गंध असामान्य प्रतीत हो तो चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।
मासिक धर्म के दौरान मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक दोनों प्रकार के उपाय प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं। संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा अर्थात सीबीटी जैसी उपचार पद्धतियां भावनात्मक लक्षणों को नियंत्रित करने में सहायक मानी जाती हैं। व्यक्तिगत परामर्श, तनाव प्रबंधन तकनीकें और रिलैक्सेशन अभ्यास भी मानसिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
व्यवहारिक स्तर पर महिलाओं को अपने मासिक चक्र का नियमित रिकॉर्ड रखना चाहिए। आज अनेक मोबाइल एप्लिकेशन और डिजिटल उपकरण उपलब्ध हैं, जिनकी सहायता से मासिक धर्म और उससे जुड़े भावनात्मक परिवर्तनों को ट्रैक किया जा सकता है। इससे महिलाओं को अपने शरीर में होने वाले बदलावों को बेहतर ढंग से समझने और उसके अनुसार अपनी दिनचर्या की योजना बनाने में मदद मिलती है।
संतुलित और पौष्टिक आहार भी मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, ताजे फल, साबुत अनाज और मेवे शामिल करने चाहिए। कैफीन तथा शराब का सेवन सीमित या बंद रखना बेहतर माना जाता है क्योंकि ये मनोदशा और नींद को प्रभावित कर सकते हैं। नियमित व्यायाम और योग भी तनाव कम करने तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने में अत्यंत उपयोगी हैं। प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि शरीर में एंडोर्फिन हार्मोन के स्राव को बढ़ाती है, जिससे मन प्रसन्न और ऊर्जावान बना रहता है।
पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद भी मासिक धर्म के दौरान मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिदिन कम से कम सात घंटे की नींद लेने से थकान, तनाव और चिड़चिड़ापन कम होता है। इसके साथ ही महिलाओं को इस दौरान स्वयं की देखभाल पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अत्यधिक कार्यभार लेने से बचना, संगीत सुनना, पुस्तक पढ़ना, प्रकृति के बीच समय बिताना या अपनी पसंद की गतिविधियों में शामिल होना मानसिक शांति और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है।
वर्तमान डिजिटल युग में स्क्रीन टाइम का प्रभाव भी मासिक धर्म स्वास्थ्य पर चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन गया है। मोबाइल फोन, टैबलेट और अन्य डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। इन उपकरणों से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोनों के संतुलन को प्रभावित करती है, जिससे मासिक चक्र में अनियमितता, दर्द और अन्य हार्मोनल समस्याओं की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए संतुलित स्क्रीन टाइम बनाए रखना लाभकारी माना जाता है।
कुछ महिलाओं में मासिक धर्म संबंधी समस्याएं इतनी गंभीर हो सकती हैं कि चिकित्सकीय उपचार आवश्यक हो जाता है। हार्मोनल थेरेपी, दर्द निवारक दवाएं और आवश्यकता पड़ने पर अन्य चिकित्सकीय उपाय शारीरिक लक्षणों को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। पीएमएस या पीएमडीडी से गंभीर रूप से प्रभावित महिलाओं के लिए विशेषज्ञ की सलाह पर एंटीडिप्रेसेंट जैसी दवाएं भी उपयोगी साबित हो सकती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि मासिक धर्म के दौरान मानसिक तनाव असहनीय हो जाए, लगातार उदासी बनी रहे या आत्महत्या जैसे विचार आने लगें, तो तुरंत मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक या स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। समय पर सहायता प्राप्त करना न केवल मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाता है।
विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस हमें यह संदेश देता है कि मासिक धर्म कोई शर्म या संकोच का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, गरिमा और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। जब समाज मासिक धर्म के प्रति संवेदनशील और जागरूक बनेगा, तभी महिलाएं अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बात कर सकेंगी और एक स्वस्थ, सुरक्षित तथा सम्मानजनक जीवन जी सकेंगी।

वरिष्ठ परामर्शदाता
एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी
प्रस्तुति: उमेश कुमार सिंह, एवीके न्यूज सर्विस