रूठ गए हैं सावन के बादल,
सूना-सूना सारा आकाश।
पलकों पर आशाएँ ठहरीं,
टूट न जाए मन का विश्वास।
बेसब्र आँखों से किसान अब,
नभ की राह निहारे रोज़।
सूखी धरती, सूखे सपने,
मन में उठते कितने सोज़।
हल तो चला, बीज भी बोए,
श्रम का अर्घ्य चढ़ाया है।
लेकिन मेघों ने अब तक तो,
अपना वचन निभाया कहाँ है?
पसीने की हर एक बूँद से,
धरती का आँचल भीग रहा।
पर अमृत बरसाने वाला,
बादल जाने कहाँ ठहर गया।
उमस भरी इस लंबी साँस ने,
जन-जीवन को व्याकुल कर डाला।
तपती गलियाँ, तपते आँगन,
हर चेहरा लगता है काला।
बच्चों की मुस्कान थम-सी गई,
जन्तुपक्षी भी नीरव बैठे हैं।
वन-उपवन की सूनी शाखें,
मानो आँसू पीते रहते हैं।
अरपा की धारा मौन खड़ी है,
जंगल भी उदास नज़र आते।
बिलासपुर की प्यासी धरती,
मेघों को बार-बार बुलाते।
छत्तीसगढ़ का धान का कटोरा,
आज व्यथा की कथा सुनाता।
हर किसान की धड़कन बनकर,
बादल को संदेश पहुँचाता।
हे मेघ! अब इतना मत रूठो,
धरती का धैर्य टूट न जाए।
किसान के श्रम का हर मोती,
आँसू बनकर छूट न जाए।
बरसो ऐसे, जैसे माँ अपनी
संतानों को गले लगाती है।
धरती-गगन के स्नेहाश्रु बन,
जीवन में हरियाली लाती है।
जब पहली बूँद गिरेगी भू पर,
हर कण दीप-सा मुस्काएगा।
किसान के चेहरे का संतोष,
भारत का भविष्य कहलाएगा।
बरसो मेघ! अब देर न करना,
हर सूखी साँस में प्राण भरो।
बिलासपुर से लेकर बस्तर तक,
हर खेत को फिर से हरा करो।
धरती के कण-कण में फिर से,
जीवन का संगीत जगाओ।
किसान के श्रम का मान रखो,
अमृत-वर्षा बनकर आओ।।
