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‘गेंदे की है रंगत न्यारी’ : बालमन की संवेदनाओं, संस्कारों और कल्पनाओं का रंगीन संसार

हिंदी बालसाहित्य के प्रतिष्ठित रचनाकार रामेश्वर प्रसाद सारस्वत (आर.पी. सारस्वत) का नवीन बाल कविता-संग्रह ‘गेंदे की है रंगत न्यारी’ अविचल प्रकाशन, हल्द्वानी (नैनीताल) से प्रकाशित हुआ है। बालसाहित्य के क्षेत्र में सारस्वत जी का योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने लंबे समय से बच्चों के लिए ऐसी रचनाएँ लिखी हैं जिनमें मनोरंजन, ज्ञान, संवेदना और मूल्यबोध का संतुलित समावेश मिलता है। प्रस्तुत संग्रह इसी रचनात्मक परंपरा का सशक्त विस्तार है।

इस संग्रह में कुल 44 बाल कविताएँ संकलित हैं, जिनके विषय अत्यंत विविध और बाल-जगत से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। प्रकृति, पशु-पक्षी, फल-फूल, खेल, शिक्षा, लोकजीवन, संस्कृति तथा समकालीन जीवन के अनेक पक्ष इन कविताओं में सहज रूप से अभिव्यक्त हुए हैं। ‘माखन चोर’, ‘गन्ने का रस ताजा’, ‘फूल खिले हैं कितने सारे’, ‘टेडीबीयर’, ‘गुरुकुल’, ‘सूरज आने वाला है’, ‘गिलहरी’, ‘पासवर्ड’, ‘रेल चली जी’, ‘पुस्तकालय’ तथा शीर्षक कविता ‘गेंदे की है रंगत न्यारी’ जैसी रचनाएँ संग्रह को विशेष आकर्षण प्रदान करती हैं।

बाल-मनोविज्ञान की गहरी समझ

किसी भी सफल बाल कविता की पहली शर्त यह है कि वह बच्चों की रुचियों, जिज्ञासाओं और अनुभवों से जुड़ सके। सारस्वत जी की कविताएँ इस कसौटी पर खरी उतरती हैं। वे बच्चों की दुनिया को बाहर से नहीं देखते, बल्कि उसी का हिस्सा बनकर उसकी अभिव्यक्ति करते हैं। खिलौने, खेल, पशु-पक्षी और विद्यालयी जीवन से जुड़े प्रसंग बच्चों के लिए सहज आत्मीयता का वातावरण निर्मित करते हैं।

‘टेडीबीयर’, ‘मेरा गुड्डा’, ‘खेल’ और ‘हरा-भरा मैदान खेल का’ जैसी कविताएँ बालमन की स्वाभाविक चंचलता और सक्रियता को अभिव्यक्त करती हैं। ‘खेल’ कविता में मनोरंजन और प्रेरणा का संतुलित संयोजन देखने को मिलता है-

“जब देखो तब घर के बाहर,

रहे खेलता खेल !

नहीं पढ़ेगा तो फिर बच्चू,

हो जाएगा फेल !

कि कब कुछ पाठ पढ़ेगा ?

पढ़ेगा बड़ा बनेगा !!”

यहाँ कवि बच्चों को खेल और अध्ययन के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है। उपदेश की कठोरता के स्थान पर संवादात्मक शैली कविता को प्रभावशाली बनाती है।

मनोरंजन का सहज और जीवंत संसार

बाल कविता का मूल स्वभाव आनंदमय होता है। संग्रह की अनेक रचनाएँ अपनी लयात्मकता, तुक-सौंदर्य और सरल प्रस्तुति के कारण बच्चों को आकर्षित करती हैं। ‘धमा-चौकड़ी हल्ला-गुल्ला’, ‘कचौड़ी बाई’ और ‘सुन रे मच्छर’ जैसी कविताओं में हास्य, चंचलता और खेलभावना का सुंदर समावेश है।

‘धमा-चौकड़ी हल्ला-गुल्ला’ केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामूहिकता और सामाजिक समरसता का संदेश भी देती है-

“बिस्किट टॉफी चौकलेट हम,

सब मिलकर के खाएँगे !

धमा-चौकड़ी हल्ला-गुल्ला,

जमकर खूब मचाएँगे !!

इसी तरह ही हँसते-गाते,

जीवन को महकाएँगे।

ऊँच-नीच की तोड़ बेड़ियाँ,

प्रेम-भाव अपनाएँगे।”

इन पंक्तियों में बालसुलभ उल्लास के साथ समानता और प्रेम का भाव भी निहित है, जो कविता को मनोरंजन से आगे ले जाता है।

ज्ञान और शिक्षा का रचनात्मक समावेश

संग्रह की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें शिक्षा और ज्ञान का स्वर सहज रूप से उपस्थित है। कवि बच्चों को नैतिक उपदेश देने के बजाय रोचक प्रसंगों और सरस भाषा के माध्यम से उपयोगी संदेश देते हैं। ‘गुरुकुल’, ‘पुस्तकालय’, ‘पासवर्ड’, ‘अ से अब अमरूद पढ़ेंगे’ और ‘अब परीक्षा की घड़ी है’ जैसी कविताएँ इसी दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।

‘गुरुकुल’ कविता भारतीय शिक्षा-परंपरा और प्रकृति-सान्निध्य के महत्व को रेखांकित करती है-

“प्रकृति के पास जा मन की,

असीमित शांति पाते हैं।

यहाँ गुरुकुल मनोरम है,

जहाँ गुरुवर पढ़ाते हैं।

पठन-पाठन यहाँ होता,

सदा दिन-रात वेदों का।

यहाँ साधक सभी मिलकर,

सफल जीवन बनाते हैं।”

इसी प्रकार ‘अब परीक्षा की घड़ी है’ कविता परीक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करती है। यह भयमुक्त और आत्मविश्वासपूर्ण तैयारी का संदेश देती है-

“पढ़ लिए हैं वर्ष भर हम,

अब परीक्षा की घड़ी है।

शांत हो हम लिख रहे हैं,

अब न कोई हड़बड़ी है !”

यह कविता विद्यार्थियों में संयम, आत्मविश्वास और नियमित अध्ययन के महत्व को स्थापित करती है।

प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील दृष्टि

संग्रह में प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं है, बल्कि वह बच्चों के भावनात्मक और नैतिक विकास का माध्यम भी बनती है। फूलों, पक्षियों, बादलों और ऋतुओं के माध्यम से कवि बच्चों को प्राकृतिक परिवेश से जोड़ते हैं। ‘फूल खिले हैं कितने सारे’ कविता में प्रकृति का रंग-बिरंगा संसार अत्यंत सरलता से उभरता है-

“कितने सारे कितने सारे,

फूल खिले हैं कितने सारे।

तरह-तरह के रंग-बिरंगे,

लगते कितने प्यारे-प्यारे॥”

प्रकृति-संबंधी कविताओं में वर्णनात्मकता के साथ संवेदनात्मकता भी मौजूद है। ‘चिड़ियाँ चुगतीं दाने’ कविता जीव-जंतुओं के प्रति दया और सह-अस्तित्व का संदेश देती है-

“आओ बच्चो नेक काम को,

तुम भी तो अपनाओ।

सब जीवों पर दया करो नित,

यह सबको समझाओ।”

इसी क्रम में ‘छत पर पानी रखो’ कविता पर्यावरणीय संवेदनशीलता का सुंदर उदाहरण है-

“छत पर पानी रखो कि पीने,

गौरैया आ जाएगी।

चोंच डुबो कर पानी पीकर,

झट-से फिर उड़ जाएगी।

पानी तो पीएँगीं ही ये,

इसमें डूब नहाएँगी।

चींचीं करके आसमान को,

सिर पर खूब उठाएँगी।”

यह कविता बच्चों को छोटे-छोटे कार्यों के माध्यम से प्रकृति और पक्षियों के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराती है।

भाषा, लय और शिल्प की सहजता

सारस्वत जी की भाषा उनकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। उन्होंने कठिन शब्दावली और जटिल अभिव्यक्तियों से बचते हुए बोलचाल की सरल हिंदी का प्रयोग किया है। यही कारण है कि कविताएँ बालकों के लिए सहज ग्रहणीय बन जाती हैं।

कविताओं में तुक, लय और संगीतात्मकता का सुंदर संतुलन मिलता है। अधिकांश रचनाएँ पाठ और वाचन दोनों के लिए उपयुक्त हैं। ‘माखन चोर’ कविता में कृष्ण के पौराणिक व्यक्तित्व का संक्षिप्त किंतु प्रभावी चित्रण किया गया है-

“जिसने कंस मार कर ब्रज को,

दुर्जन मुक्त कराया।

इंद्रदेव का मान घटाने,

कर गिरिराज उठाया।

नाग कालिया को नाथा,

फन-फन पर बीन बजाया।

अर्जुन को रण बीच खड़ा कर,

गीता पाठ पढ़ाया।”

इसी प्रकार ‘गन्ने का रस ताजा’ कविता ग्रामीण जीवन की सहजता और आत्मीयता का चित्र प्रस्तुत करती है-

“नींबू, पोदीना-ठंडक को,

थोड़ी बर्फ मिलाता।

डिस्पोजल रखता ग्लास है,

उन में डाल पिलाता।”

यह लोकजीवन की सादगी और यथार्थ का जीवंत चित्र है।

कल्पना और यथार्थ का संतुलित समन्वय

बालसाहित्य का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चों की कल्पनाशक्ति को विकसित करना भी है। संग्रह की अनेक कविताएँ यथार्थ और कल्पना के सुंदर मेल का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। कवि चाँद, बादल, पक्षियों और वन्यजीवन के माध्यम से बच्चों के मन में जिज्ञासा तथा रचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करते हैं। ‘एक शेरनी’ कविता इसका सुंदर उदाहरण है-

“एक शेरनी शावक तीन।

यह जंगल का प्यारा सीन।

इनकी है मस्ती की चाल।

एक-एक पग चलें सँभाल।

जंगल ही इनका घर-बार।

ये ही है इनका संसार॥”

इन पंक्तियों में वन्यजीवन का दृश्यात्मक और सजीव चित्र उपस्थित होता है, जो बच्चों की कल्पना को विस्तार देता है।

मूल्यबोध और संस्कारों की सहज अभिव्यक्ति

संग्रह की कविताएँ बच्चों में नैतिक मूल्यों का विकास करने का प्रयास करती हैं, किंतु यह प्रयास कहीं भी बोझिल नहीं बनता। परिश्रम, अनुशासन, करुणा, सहानुभूति और आत्मविश्वास जैसे गुण स्वाभाविक रूप से कविताओं में अभिव्यक्त हुए हैं। ‘सौ में से सौ नंबर लाई’ कविता अध्ययनशीलता और आत्मविश्वास का प्रेरक चित्र प्रस्तुत करती है-

“सौ में से सौ नंबर लाई,

कक्षा में नंबर वन आई।

हिंदी मुझको लगती प्यारी,

अंग्रेजी से पक्की यारी।

दादू को सरप्राइज दूंगी,

उनका रोशन नाम करूँगी।”

यह कविता उपलब्धि के साथ पारिवारिक सम्मान और आत्मगौरव की भावना को भी व्यक्त करती है।

निष्कर्षत: ‘गेंदे की है रंगत न्यारी’ एक ऐसा बाल कविता-संग्रह है जिसमें मनोरंजन, ज्ञान, प्रकृति-प्रेम, कल्पनाशीलता और मूल्यबोध का संतुलित एवं प्रभावी समन्वय दिखाई देता है। रामेश्वर प्रसाद सारस्वत ने बालमन की संवेदनाओं को समझते हुए ऐसी कविताओं की रचना की है जो बच्चों को आनंदित भी करती हैं और उन्हें जीवनोपयोगी सीख भी प्रदान करती हैं। सरल भाषा, सहज लय, विषय-विविधता और बाल-मनोविज्ञान की गहरी समझ इस संग्रह को विशिष्ट बनाती है। कुछ कविताओं में संदेशात्मकता अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है, किंतु उनकी रोचक प्रस्तुति उसे बोझिल नहीं होने देती। इस दृष्टि से यह संग्रह समकालीन हिंदी बालसाहित्य की एक महत्वपूर्ण और पठनीय कृति के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।

डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी
डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी

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