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“अकती के अंधियार मा उजाला” सुनीता दीदी

(एक छत्तीसगढ़ी प्रहसन नाटक – बाल विवाह ऊपर कटाक्ष)

  पात्र परिचय:

मंगरू कका – परंपरा के नाम पर अड़े रहय्या गांव के बुजुर्ग

रामसाय – गरीब किसान, अपन लइका के बिहाव जल्दी कराय बर उतावला

पिंकी – 14 साल के चंचल लड़की (नाबालिग)

मुन्ना – 15 साल के लड़का (नाबालिग), खेल-कूद म मगन

सुनीता दीदी – आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, समझदार अउ जागरूक

सरपंच जी – गांव के मुखिया

गांव वाले (2-3) – हास्य अउ समर्थन बर

                  —

दृश्य 1: गांव के चौपाल

(मंगरू कका अउ रामसाय बैठे हें, अकती (अक्षय तृतीया) के चर्चा होवत हे)

मंगरू कका:

अरे रामसाय! अकती आवत हे, बढ़िया मुहूर्त आय गे। तोर पिंकी के बिहाव कर देबे, बड़ पुण्य मिलही!

रामसाय:

हाँ कका, मोर घलो मन म एही बात आय रहिस। छोटे-छोटे म बिहाव हो जाथे त चिंता खतम!

(तभी मुन्ना अउ पिंकी आके खेलत-कूदत हें)

मुन्ना (हँसते हुए):

अरे पिंकी! चल गिल्ली-डंडा खेले बर  जाबो!

पिंकी:

हाँ रे! पढ़ई त बाद म होही, अभी खेलबो!

(दोनों के बात सुनत सुनत सुनीता दीदी आवत हे)

दृश्य 2: (समझाइश अउ हांसी )

सुनीता दीदी:

का होगे कका, का योजना बनत हे?

मंगरू कका:

अरे दीदी, अकती म हमर नोनी के बिहाव के तैयारी चलत हे।

सुनीता (हँसते हुए):

कका! नोनी हर तौ अभी बहुते छोटे हावय .. ए बिहाव हावय कका। गुड़िया गुड्डी के खेल थोरी हे की उम्र नहीं होए ले भी ओकर  कर देबे बिहाव… बिहाव आय कि “बच्चा पार्टी के वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता”?

(गांव वाले हँस पड़थें)

रामसाय:

दीदी, पुरखा मन के रीत आय, एला निभाना जरूरी हे।

सुनीता:

रामसाय भइया, पुरखा मन बैल गाड़ी चलावत रहिन, त आजो घलो का बैल गाड़ी म जाबो?

आजी अब जमाना बदल गे हे कका।

मंगरू कका (थोड़ा चिढ़कर):

त मोर बात गलत हे का?

सुनीता:

कका, कानून कहिथे – 18 साल से कम लड़की अउ 21 साल से कम लड़का के बिहाव अपराध हेवय।

अऊ फेर ये लइका मन अभी गुड़िया-गुड्डा खेलत हें, जिम्मेदारी का समझहीं..?

दृश्य 3: हास्यपूर्ण मोड़

(मुन्ना अउ पिंकी फिर आथें)

सुनीता:

मुन्ना, तोर बिहाव होही त का करबे रे?

मुन्ना:

पहिली बात त मोला मोटर साइकिल चाही, फेर ओही म बइठ के रोज खेले‌ बर जाहूं!

सुनीता: अउ तैं का करबे पिंकी?

पिंकी:

मोर तो सपना आय मास्टरनी बनना! लेकिन मोर बिहाव कर देहीं त मय स्कूल कइसे जाहूं?

(पिंकी के गोठ ला सब सुनके गांव वाले सोच म पड़ जाथें)

दृश्य 4:(गांव म बिहाव के तैयारी जोर-शोर ले चलत हे। ढोल-नगाड़ा बजत हे। सुनीता दीदी चिंतित दिखत हें)

सुनीता दीदी (गंभीर स्वर म):

कका, रामसाय! तैं हर नइइच्च माने हस न मोर अतेक समझाए के बाद भी । अब तोला आखिरी बार कहत हंव—ये बाल विवाह गलत हे, कानून के खिलाफ हे जाने।

रामसाय (थोड़ा कठोर स्वर म):

दीदी, आप जादा मत सिखावव… ये हमर घर-परिवार के मामला हे।

गांव वाला 1 (धमकी के लहजा म):

अगर बिहाव रुकवाए के कोसिस करबे, त ठीक नई होही दीदी!

(थोड़ी देर के सन्नाटा… सुनीता दीदी दृढ़ता से मोबाइल निकालथें)

सुनीता दीदी:

मोला डर नई लागय। तुमनन के डराए मां ।इहां लइका मन के भविष्य के सवाल आय।

(फोन लगाथें)

“हेलो, पुलिस थाना? गांव म बाल विवाह होवत हे… तुरंत आवव।”

(कुछ समय बाद पुलिस अउ सरपंच पहुंचथें)

सरपंच (कड़क आवाज म):

कऊन हिम्मत करिस कानून तोड़े के?

पुलिस अधिकारी:

तुरंत बिहाव रोकव! ये अपराध आय।

जब तुमन ल एकर नुकसान के बारे में पूरा समझाए रहीस सुनीता दीदी.. तव तुमन ल समझ में नइ आईसे..? बाल बिहाव म तुमन के लईका मन के जिंनगी खराब त होहीच्च अउ तुमन ल  जेलों म जाए परही..?

(ढोल-नगाड़ा बंद हो जाथे, सब तरफ चुप्पी हो जाथे अउ खुसुर पुसुर होए लागथे )

दृश्य 5: बदलाव के शुरुआत

रामसाय (पछतावा म):

दीदी… माफी चाहत हंव। आप सही रहू। मोर पिंकी पढ़ही।

मंगरू कका (हल्का हास्य म):

अरे, अब समझ म आ गे—पुराना सोच ला बदलना परही!

पिंकी (खुशी से):

मोर सपना अब जिंदा रहिही …मय मास्टरनी बनहूं!

मुन्ना:

अऊ मंय खिलाड़ी बनहूं अउ देश म नाम कमाहूं !….!! ( लइका मन के बाती ल सुनके सब्बो गांव वाले हांसे लगथें )

समापन टिप्पणी (नैतिक संदेश):

ए नाटिका ह सिरिफ हँसी-मजाक नई, एक सच्चाई के आईना आय।

जिहां एक बहादुर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपन कर्तव्य निभाके, समाज ला अंधियार ले उजाला दिसा म ले जाथे।

बाल विवाह रोकना…सिरिफ कानून नई, हमन सबके जिम्मेदारी आय।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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