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परीक्षा की शुचिता और नौकरी की सुरक्षाः झारखंड की चुनौती

झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर पिछले पच्चीस दिनों से चला आ रहा छात्र आंदोलन अब एक नए और अधिक जटिल चरण में पहुंच गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने छात्र आंदोलन के दबाव, परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और परीक्षा संचालन की विश्वसनीयता पर उठे गंभीर सवालों के बीच जेएसएससी-सीजीएल, चैदहवीं जेपीएससी सहित टीडीपीएल से जुड़ी अनेक भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा की है। सरकार ने वर्ष 2014 के बाद हुई नियुक्ति परीक्षाओं की जांच कराने और व्यवस्था में सुधार के लिए भी कदम उठाने की बात कही है। इस फैसले से आंदोलनरत छात्रों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन इसके साथ ही पहले से चयनित होकर सरकारी सेवा में कार्यरत हजारों युवाओं के सामने रोजगार और भविष्य का संकट खड़ा हो गया है। यही विरोधाभास झारखंड के वर्तमान भर्ती विवाद को केवल परीक्षा घोटाले का मामला न बनाकर न्याय, प्रशासनिक जवाबदेही और मानवीय संवेदना का गंभीर प्रश्न बना देता है। रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में 25 जुलाई 2026 से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन जेपीएससी और जेएसएससी की भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी के विरोध में था। छात्र विभिन्न परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच, संदिग्ध प्रक्रियाओं को निरस्त करने और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे थे। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने सोलह दिनों तक आमरण अनशन किया। सरकार की घोषणा के बाद उन्होंने अनशन समाप्त किया, हालांकि कुछ छात्र अब भी केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की मांग पर कायम हैं। सरकार ने आठ अलग-अलग अधिसूचनाओं के माध्यम से कुल 44 परीक्षाओं को रद्द करने की सूची जारी की है।
यदि किसी परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक हुआ हो, संगठित धांधली हुई हो या चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली गंभीर अनियमितता प्रमाणित हो, तो उस प्रक्रिया की जांच और आवश्यक होने पर परीक्षा रद्द करना स्वाभाविक रूप से जरूरी है। सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगिता करने वाले लाखों युवाओं का विश्वास तभी कायम रह सकता है, जब उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी मेहनत किसी दलाल, भ्रष्ट अधिकारी, परीक्षा संचालक या अनुचित साधन अपनाने वाले व्यक्ति के कारण व्यर्थ नहीं जाएगी।

इसलिए छात्रों की पारदर्शी और निष्पक्ष भर्ती व्यवस्था की मांग पूरी तरह जायज है। लेकिन समस्या उस समय गंभीर हो जाती है जब किसी परीक्षा में हुई सामूहिक अनियमितता के कारण उन अभ्यर्थियों को भी नौकरी से हटाने का फैसला किया जाता है जिनके विरुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर किसी गलत आचरण का प्रमाण नहीं है। जेएसएससी-सीजीएल के चयनित कर्मचारियों का वर्तमान विरोध इसी मूल प्रश्न को सामने रखता है। दिसंबर 2023 में परीक्षा आयोजित हुई थी। पेपर लीक के आरोपों के बाद सितंबर 2024 में परीक्षा दोबारा आयोजित की गई। मामला न्यायालय तक पहुंचा और न्यायिक प्रक्रिया के बाद परिणाम घोषित किए गए। सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र भी दिए गए और अनेक लोग सरकारी सेवा में कार्यरत हो गए। अब पूरी प्रक्रिया को निरस्त किए जाने से लगभग दो हजार चयनित कर्मचारी सीधे प्रभावित हुए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 1975 लोगों की नियुक्तियां इस फैसले से प्रभावित हुई हैं। इन कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार परीक्षा दी, सफलता प्राप्त की, नियुक्ति पत्र पाया और सेवा में योगदान किया। यदि किसी स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ है तो उसकी जांच हो, लेकिन सभी चयनित अभ्यर्थियों को दोषी मानकर नौकरी से हटाना न्यायसंगत नहीं है।
सरकारी नौकरी मिलने के बाद अनेक युवाओं ने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ऋण लिया, मकान या अन्य आवश्यकताओं के लिए वित्तीय जिम्मेदारियां उठाईं और अपनी दूसरी नौकरियां छोड़ दीं। उनके जीवन की योजनाएं नियमित वेतन और सरकारी सेवा की स्थिरता पर आधारित हो गईं। हटाए गए कर्मचारियों की पीड़ा और नाराजगी को भी उसी गंभीरता से सुना जाना चाहिए, जिस गंभीरता से छात्रों की शिकायतें सुनी गईं। यहां मूल सवाल यह है कि परीक्षा में अनियमितता और अभ्यर्थी की व्यक्तिगत संलिप्तता के बीच अंतर कैसे किया जाए। यदि किसी अभ्यर्थी ने पेपर खरीदा, नकल की, अनुचित साधन अपनाया या किसी दलाल के माध्यम से लाभ प्राप्त किया, तो उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जिसने बिना किसी सिद्ध कदाचार के परीक्षा दी, परिणाम में सफल हुआ और नियुक्त होकर सेवा कर रहा है, उसके मामले में केवल परीक्षा प्रक्रिया की खामी को आधार बनाकर सामूहिक दंड देना न्याय के सिद्धांतों पर प्रश्न खड़े करता है। दोषी को बचाना अन्याय है, लेकिन निर्दोष को दंडित करना भी उतना ही बड़ा अन्याय है। सरकार को इसी संतुलन की कसौटी पर अपने निर्णय को परखना होगा। राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे आंदोलनरत छात्रों के विश्वास को बनाए रखना है और दूसरी ओर हटाए गए कर्मचारियों के अधिकारों तथा आजीविका की रक्षा का रास्ता तलाशना है। केवल परीक्षा रद्द कर देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। सरकार को स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करानी होगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अनियमितता किस स्तर पर हुई, कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार थे और किन अभ्यर्थियों ने अनुचित लाभ उठाया। जांच की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिस पर छात्र भी विश्वास कर सकें और चयनित कर्मचारी भी। यदि जांच निष्पक्ष होगी तो दोषियों पर कार्रवाई के साथ निर्दोषों को राहत देने का रास्ता भी निकलेगा।

सरकार को अपने निर्णय के कानूनी आधार को स्पष्ट करना होगा और प्रभावित कर्मचारियों को अपनी बात रखने का उचित अवसर देना होगा। किसी भी प्रशासनिक निर्णय की मजबूती केवल उसकी मंशा से नहीं, बल्कि उसकी विधिक प्रक्रिया और न्यायसंगतता से तय होती है। यदि कर्मचारियों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है तो उन्हें कानून के माध्यम से अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। सरकार को भी न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए पारदर्शी ढंग से सभी दस्तावेज और जांच के तथ्य सामने रखने चाहिए। झारखंड का यह संकट केवल एक राज्य की भर्ती व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता से जुड़े बड़े सवाल की ओर संकेत करता है। एक पेपर लीक या भर्ती में धांधली उनकी मेहनत, समय और मानसिक ऊर्जा को प्रभावित करती है। इसलिए प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, डिजिटल व्यवस्था, मूल्यांकन की पारदर्शिता और परिणामों की विश्वसनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। निजी परीक्षा एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपने की स्थिति में भी उनकी जवाबदेही, निगरानी और दंड की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है। किसी एजेंसी की गलती के कारण पूरी पीढ़ी का भविष्य अनिश्चित नहीं होना चाहिए।

सरकार को अब ऐसा स्थायी तंत्र विकसित करना चाहिए जिसमें परीक्षा प्रक्रिया के प्रत्येक चरण की जवाबदेही तय हो। शिकायतों के निवारण की समयबद्ध व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि छात्रों को आंदोलन या लंबी कानूनी लड़ाई का सहारा लेने की आवश्यकता कम हो। साथ ही, यदि किसी परीक्षा में गंभीर गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो दोषियों पर त्वरित कार्रवाई और प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए न्यायपूर्ण वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए। झारखंड में वर्तमान परिस्थिति से सबसे बड़ी सीख यही है कि सरकार को छात्रों और कर्मचारियों में से किसी एक को चुनने के बजाय न्याय का रास्ता चुनना होगा। छात्रों की मेहनत और भविष्य की रक्षा जरूरी है, लेकिन निर्दोष चयनित कर्मचारियों की आजीविका की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। परीक्षा रद्द करना अंतिम समाधान नहीं, बल्कि एक कठिन प्रक्रिया की शुरुआत है। वास्तविक सफलता तब होगी जब दोषी पहचाने जाएं, भ्रष्ट तंत्र पर कठोर प्रहार हो, निर्दोषों को राहत मिले और भविष्य की भर्ती व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी बने। सरकार यदि निष्पक्ष जांच, कानूनी प्रक्रिया, मानवीय संवेदना और संस्थागत सुधार के आधार पर आगे बढ़ती है तो आज का संकट झारखंड की भर्ती व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाने का अवसर बन सकता है। अन्यथा एक आंदोलन समाप्त होकर दूसरा आंदोलन शुरू होता रहेगा और सबसे बड़ी कीमत वही युवा पीढ़ी चुकाएगी, जो मेहनत के बल पर अपने भविष्य का निर्माण करना चाहती है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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