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जहाँ बुज़ुर्ग सम्मानित होते हैं, वहीं संस्कार जीवित रहते हैं

21 अगस्त : विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर विशेष

“मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः”—भारतीय संस्कृति का यह अमर संदेश केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का आधार है। हमारे यहाँ माता-पिता और बुज़ुर्गों को परिवार का मुखिया, मार्गदर्शक और अनुभव का भंडार माना गया है। उनके चरणों में केवल आयु का सम्मान नहीं, बल्कि जीवन भर के संघर्ष, त्याग, अनुभव और संस्कारों का सम्मान निहित है। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता में बुज़ुर्गों को परिवार की जड़ और समाज की आत्मा कहा गया है।

प्रतिवर्ष 21 अगस्त को विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य समाज में वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, सुरक्षा, स्वास्थ्य, अधिकारों और गरिमामय जीवन के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस हमें यह भी स्मरण कराता है कि जिस समाज में बुज़ुर्गों का सम्मान होता है, वहीं संस्कार, संवेदनाएँ और मानवीय मूल्य जीवित रहते हैं।

भारत की पारिवारिक व्यवस्था सदैव संयुक्त परिवार की परंपरा पर आधारित रही है। दादा-दादी और नाना-नानी केवल परिवार के सदस्य नहीं होते थे, बल्कि वे बच्चों के प्रथम शिक्षक, संस्कारों के संवाहक और अनुभव के जीवंत विद्यालय होते थे। रामायण, महाभारत, उपनिषद और लोककथाओं में भी गुरुजनों और वृद्धजनों के सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बुज़ुर्गों के अनुभवों ने अनेक पीढ़ियों को दिशा दी है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में परिवारों को संभाला, जीवन-मूल्यों का संरक्षण किया और समाज को स्थिरता प्रदान की।

आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने सामाजिक संरचना को बदल दिया है। आज अनेक वरिष्ठ नागरिक अकेलेपन, उपेक्षा और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, वही हाथ आज सहारे की प्रतीक्षा करते दिखाई देते हैं। डिजिटल युग ने पीढ़ियों के बीच संवाद की दूरी भी बढ़ाई है। मोबाइल और इंटरनेट ने लोगों को जोड़ा अवश्य है, पर कई परिवारों में आपसी संवाद कम हुआ है। ऐसे में बुज़ुर्गों का अकेलापन एक गंभीर सामाजिक चिंता बनकर उभरा है।

एक राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी युवा आबादी नहीं होती, बल्कि उसके अनुभवी नागरिक भी होते हैं। वरिष्ठ नागरिकों ने अपने जीवन में संघर्ष, सफलता, असफलता और परिवर्तन के अनेक दौर देखे हैं। उनके अनुभव प्रशासन, शिक्षा, साहित्य, कृषि, उद्योग, विज्ञान, पत्रकारिता और सामाजिक जीवन—हर क्षेत्र के लिए अमूल्य हैं। यदि समाज उनके अनुभवों का सम्मानपूर्वक उपयोग करे, तो अनेक समस्याओं का समाधान सहज रूप से मिल सकता है।

बढ़ती आयु के साथ स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ स्वाभाविक हैं। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, संतुलित आहार, योग, व्यायाम और मानसिक सक्रियता वरिष्ठ नागरिकों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। लेकिन इससे भी अधिक आवश्यक है भावनात्मक सुरक्षा। सम्मान, अपनापन, संवाद और परिवार का साथ ऐसी औषधियाँ हैं, जिन्हें कोई दवा प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।

भारत में वरिष्ठ नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए विभिन्न कानून और योजनाएँ लागू हैं। वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएँ, रियायतें और माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 जैसे प्रावधान उनकी गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं। किंतु कानून तभी प्रभावी बनते हैं जब समाज संवेदनशील हो।

आज की युवा पीढ़ी कल की वरिष्ठ पीढ़ी होगी। इसलिए बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि भविष्य के समाज में निवेश भी है। यदि बच्चे अपने दादा-दादी और माता-पिता के साथ समय बिताएँ, उनकी बातें सुनें और उनके अनुभवों से सीखें, तो परिवारों में संस्कार और संवेदनाएँ दोनों सुदृढ़ होंगी।

किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने बुज़ुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जो समाज अपने वृद्धजनों का सम्मान करता है, वही अपनी संस्कृति, इतिहास और नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रख पाता है। आइए, विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर यह संकल्प लें कि हम अपने घर के बुज़ुर्गों को केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सौभाग्य मानेंगे। उनके अनुभवों का सम्मान करेंगे, उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगे और उन्हें यह विश्वास दिलाएँगे कि वे आज भी परिवार और समाज के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने पहले थे।

बुज़ुर्ग किसी परिवार का अतीत नहीं, बल्कि उसका जीवंत इतिहास होते हैं। उनकी मुस्कान में पीढ़ियों का आशीर्वाद छिपा होता है और उनके अनुभवों में भविष्य का मार्गदर्शन। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ संस्कारवान बनें, तो हमें अपने वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान, स्नेह और सुरक्षा का वातावरण देना होगा। क्योंकि सच यही है —

“जहाँ बुज़ुर्ग सम्मानित होते हैं, वहीं संस्कार जीवित रहते हैं।”
झुर्रियों में जीवन का अनुभव, आँखों में सपनों की शान,
उनके आशीषों से महके,
हर आँगन, हर हिन्दुस्तान।
जो झुककर उनका मान करे, उसका जीवन धन्य बने,
बुज़ुर्ग जहाँ सम्मानित हों,
वहीं सदा संस्कार तने।।

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