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‘शांतिदूत गुटर गूँ’ : शांति, प्रेम और सह-अस्तित्व का बाल-संसार

डॉ. विमला भंडारी की पिक्चर बुक ‘शांतिदूत गुटर गूँ’ बालसाहित्य की उस परंपरा में उल्लेखनीय कृति है, जिसमें मनोरंजन, ज्ञान, कल्पना, संवेदना और जीवन-मूल्यों को एक साथ साधने का प्रयास दिखाई देता है। पुस्तक का केंद्रीय पात्र कबूतर है, लेकिन वास्तव में यह केवल कबूतर की कहानी नहीं है। इसके माध्यम से लेखिका ने मनुष्य और प्रकृति के संबंध, प्रेम, करुणा, सह-अस्तित्व, सांस्कृतिक धारणाओं, वैज्ञानिक तथ्यों, इतिहास, युद्ध और शांति जैसे अनेक विषयों को बच्चों के सामने रोचक ढंग से रखा है। पुस्तक की विशेषता यह है कि कबूतर स्वयं बच्चों- अनु और बसु से संवाद करता है और अपने बारे में कथा-किस्से सुनाते हुए धीरे-धीरे ‘शांतिदूत’ के व्यापक अर्थ तक पहुँचता है। पुस्तक स्वयं इसे सरल और सहज भाषा में बच्चों से संवाद करती हुई कहानियों का संग्रह प्रस्तुत करती है तथा कबूतर को शांति, प्रेम और सद्भाव का प्रतीक बनाती है।

कहानी कहने का अनूठा ढंग

इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका कथन-शिल्प है। लेखिका ने परंपरागत ढंग से किसी बाहरी कथावाचक के माध्यम से कबूतर की कहानी नहीं सुनाई, बल्कि कबूतर को ही बोलने वाला पात्र बना दिया है। अनु और बसु उसके मित्र हैं और कबूतर उनके साथ बातचीत करते हुए अपने अनुभव, इतिहास, मिथक, लोकविश्वास और वैज्ञानिक विशेषताएँ साझा करता है। इस तरह पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह किसी किताब को पढ़ नहीं रहा, बल्कि स्वयं एक जीवित कबूतर से बातचीत कर रहा है।

आरंभ में सोलन के घर की स्मृतियों के माध्यम से अनु और बसु की कबूतर से दोस्ती स्थापित होती है। कबूतर का बच्चों के कंधे पर बैठना, गर्दन मटकाना, आँखों की पुतलियों से संकेत करना, दाना चुगना और ‘गुटर गूँ’ करना बच्चों के लिए सहज हास्य और आत्मीयता का वातावरण बनाता है। बसु की नोटबुक में कबूतर की भाषा को दर्ज करने का प्रसंग कल्पना को और अधिक रोचक बनाता है।  यहाँ लेखिका की बाल-मनोविज्ञान की समझ दिखाई देती है। बच्चे जिस वस्तु को प्रत्यक्ष देखते और अनुभव करते हैं, उसी को कथा का केंद्र बनाया गया है। इसलिए कबूतर कोई दूर का, अपरिचित या अमूर्त प्रतीक नहीं रह जाता; वह बच्चों का अपना मित्र बन जाता है।

कबूतर : पक्षी से प्रतीक तक

कृति का विकास अत्यंत रोचक ढंग से होता है। आरंभ में कबूतर केवल अनु और बसु का साथी है, लेकिन कथा आगे बढ़ते-बढ़ते वह विश्व-संस्कृति में शांति और सद्भाव के प्रतीक के रूप में सामने आता है। लेखिका कबूतर की विभिन्न संज्ञाओं और सांस्कृतिक पहचान से भी बच्चों को परिचित कराती हैं, अंग्रेजी में ‘पिजन’, हिंदू ग्रंथों में ‘कपोत’, वैज्ञानिक नाम ‘कोलम्बिडाए’ तथा ग्रीक भाषा का संदर्भ। सफेद कबूतर या डव को विशेष रूप से शांतिदूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ पुस्तक का ज्ञानात्मक पक्ष स्पष्ट होता है। बच्चों को एक सामान्य पक्षी के बहाने भाषा, विज्ञान, संस्कृति और कला से जोड़ दिया जाता है। यही पिक्चर बुक की शिक्षणात्मक शक्ति है।

पिकासो और शांति का प्रतीक

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग पाब्लो पिकासो की प्रसिद्ध सफेद कबूतर वाली पेंटिंग से जुड़ा है। लेखिका सफेद कबूतर की चोंच में जैतून की हरी शाखा को शांति के वैश्विक प्रतीक के रूप में सामने लाती हैं। पिकासो और उनकी बेटी ‘पालोमा’ के संदर्भ से कथा में कला और भाषा का सुंदर मेल भी दिखाई देता है। इसके बाद मेसोपोटामिया की जलप्रलय-कथा आती है, जिसमें कबूतर जैतून की हरी शाखा लेकर लौटता है और यह संकेत देता है कि जलस्तर कम हो गया है तथा पृथ्वी पर जीवन फिर सामान्य हो सकता है। इस कथा को शांति के प्रतीक की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जोड़ा गया है। इस प्रकार बच्चों को एक पक्षी से जुड़ी विश्वव्यापी प्रतीक-परंपरा का परिचय मिलता है।

लोकविश्वास और सांस्कृतिक विविधता

पुस्तक का सबसे व्यापक पक्ष विभिन्न देशों और संस्कृतियों में कबूतर से जुड़ी मान्यताओं का संकलन है। नवविवाहित जोड़े द्वारा कबूतर उड़ाने की लोकपरंपरा से लेकर मध्य एशिया की उस कथा तक, जिसमें कबूतर के घोंसले के कारण युद्ध टल जाता है, लेखिका बार-बार यह दिखाती हैं कि मनुष्य ने कबूतर को केवल पक्षी नहीं माना, बल्कि उसमें प्रेम, करुणा और शांति के अर्थ खोजे हैं।

मध्य एशिया की कथा विशेष रूप से प्रभावशाली है। राजा के हेलमेट में बने कबूतर के घोंसले को देखकर उसकी माँ उसे घोंसला न हटाने की सलाह देती है। राजा बिना हेलमेट के युद्धभूमि में जाता है। जब दूसरा राजा कारण जानता है और उसके भीतर पक्षी के प्रति प्रेम तथा करुणा देखता है, तो युद्ध टाल दिया जाता है। यहाँ एक छोटे से पक्षी का घोंसला दो राजाओं के बीच मनुष्यत्व का सेतु बनता है। बच्चों के लिए यह प्रसंग करुणा और अहिंसा का अत्यंत सरल पाठ बन जाता है।

पौराणिक और धार्मिक संदर्भ

कृति में कबूतर से जुड़े अनेक धार्मिक और पौराणिक संदर्भ भी आते हैं। अमरनाथ की कथा में कबूतर के जोड़े को अमरता से जोड़ा गया है। ईसाई परंपरा में पवित्र आत्मा के आगमन की खुशखबरी से कबूतर को जोड़ने का उल्लेख है। इस्लामी संदर्भ में भी कबूतर को दिव्य प्रेरणा से संबंधित मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भारतीय परंपरा में आत्मा, पवित्रता तथा कामदेव की पत्नी रति से संबंधित संदर्भ आते हैं। मेसोपोटामिया में इनाना-इश्तर, पश्चिम एशिया में अशेरा तथा यूनानी परंपरा में एफ्रोडाइट से कबूतर को जोड़े जाने की बातें भी कथा में आती हैं।

इन प्रसंगों का महत्त्व केवल धार्मिक जानकारी देने में नहीं है। इनसे यह बोध निर्मित होता है कि अलग-अलग सभ्यताओं ने प्रकृति के एक ही जीव को अपने-अपने सांस्कृतिक अनुभवों के आधार पर अलग-अलग अर्थ दिए हैं। इस दृष्टि से पुस्तक बच्चों को सांस्कृतिक विविधता के प्रति जिज्ञासा और सम्मान का भाव देती है।

हाँ, यहाँ एक सावधानी की आवश्यकता भी है। पुस्तक में मिथकीय, धार्मिक और लोकविश्वास संबंधी अनेक बातें एक साथ आती हैं। बाल पाठक के लिए तथ्य, मान्यता और कथा के बीच अंतर हमेशा स्पष्ट नहीं हो सकता। अतः शिक्षक या अभिभावक यदि इन प्रसंगों को पढ़ाते समय यह स्पष्ट करें कि कुछ बातें वैज्ञानिक तथ्य हैं और कुछ लोकविश्वास अथवा धार्मिक कथाएँ, तो पुस्तक का शैक्षिक उपयोग और अधिक प्रभावी हो सकता है।

अंधविश्वास के प्रसंग की उपयोगिता

पुस्तक केवल कबूतर की प्रशंसा करने तक सीमित नहीं रहती। यूरोप में प्रचलित उस अंधविश्वास का भी उल्लेख करती है जिसमें शैतान, चुड़ैल और बुरी आत्माओं के जीवित प्राणी का रूप लेने की बात कही जाती थी, लेकिन कबूतर को उससे अलग माना जाता था।

यह प्रसंग महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पुस्तक एकतरफा महिमामंडन से कुछ आगे जाती है। लेखिका यह दिखाती हैं कि मनुष्य ने कबूतर के बारे में अनेक प्रकार की धारणाएँ निर्मित की हैं। हालांकि यहाँ भी बाल-पाठक को वैज्ञानिक दृष्टि से अंधविश्वास की प्रकृति समझाने के लिए अतिरिक्त व्याख्या उपयोगी होती।

विज्ञान और प्रकृति-बोध

‘शांतिदूत गुटर गूँ’ का एक मजबूत पक्ष इसका वैज्ञानिक आधार है। कबूतर के भोजन, कंकर खाने, पाचन, अंडों को सेने, घोंसला बनाने, बच्चों के पालन-पोषण और उड़ने की क्षमता से संबंधित बातें कथा में आती हैं। लेखिका बताती हैं कि कबूतर लगभग डेढ़-दो महीने का अस्थायी घोंसला बनाता है, कबूतरी दो-तीन सफेद अंडे दे सकती है और अंडों के ऊष्मायन में लगभग 17 से 19 दिन लगते हैं। बच्चों के लिए विशेष रूप से रोचक तथ्य यह है कि कबूतर अपने बच्चों को एक विशेष पौष्टिक द्रव, जिसे सामान्यतः ‘क्रॉप मिल्क’ कहा जाता है, के माध्यम से पोषण देता है। पुस्तक इसे रोचक संवाद में बदल देती है। इससे विज्ञान नीरस सूचना न रहकर कथा का हिस्सा बन जाता है।कबूतर की दिशाबोध संबंधी क्षमता और संदेशवाहक के रूप में उसकी भूमिका भी पुस्तक में विस्तार से आती है। भारत से लेकर बगदाद, मंगोल साम्राज्य, मिस्र और प्राचीन ग्रीस तक कबूतरों के संदेशवाहक के रूप में प्रयोग की चर्चा की गई है। यहाँ पुस्तक का ज्ञान-विस्तार बहुत व्यापक हो जाता है। बच्चा एक ही कथा-धारा में जीवविज्ञान, इतिहास और संचार-व्यवस्था से परिचित होता है।

इतिहास में संदेशवाहक कबूतर

कबूतर और मनुष्य के संबंध को पुस्तक केवल भावनात्मक स्तर पर नहीं छोड़ती। संदेशवाहक के रूप में कबूतर की ऐतिहासिक भूमिका इस संबंध को वास्तविक उपयोगिता से जोड़ती है। युद्ध और साम्राज्य के दौर में संदेश पहुँचाने में कबूतरों की भूमिका का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि मनुष्य और पक्षी का रिश्ता हजारों वर्षों से परस्पर उपयोगिता और विश्वास पर आधारित रहा है। इसी क्रम में अमेरिकी तटरक्षक बल द्वारा समुद्री दुर्घटनाओं में लोगों की खोज के लिए कबूतरों के प्रयोग का उल्लेख भी आता है। इस प्रकार पुस्तक कबूतर को केवल ‘शांति’ का प्रतीक नहीं बनाती; वह उसकी उपयोगिता, बुद्धिमत्ता और मनुष्य के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध को भी सामने लाती है।

प्रेम, परिवार और साझेदारी

कथा का घरेलू पक्ष भी उल्लेखनीय है। कबूतर और कबूतरी का घोंसला बनाना, अंडों की रक्षा करना, बच्चों के जन्म के बाद उनकी देखभाल करना और दोनों का मिलकर परिवार चलाना बच्चों के सामने साझेदारी और पारिवारिक जिम्मेदारी का सहज उदाहरण प्रस्तुत करता है। अंडों को सेने के समय एक कबूतर के सेने और दूसरे के रखवाली करने का प्रसंग इस साझेदारी को रेखांकित करता है। बच्चों के लिए यह संदेश अत्यंत उपयोगी है कि परिवार केवल प्रेम से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, सहयोग और परस्पर देखभाल से बनता है।

शांति का आधुनिक अर्थ

पुस्तक का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण कबूतर को आधुनिक विश्व के शांति-प्रतीक के रूप में स्थापित करता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शांति आंदोलनों और सफेद कबूतर के प्रतीक के प्रसार की चर्चा के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस का संदर्भ आता है। पुस्तक में 1982 में पहले अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस और 21 सितंबर को शांति दिवस मनाए जाने का उल्लेख है।

यहाँ लेखिका की दृष्टि स्पष्ट रूप से बच्चों की ओर केंद्रित है। शांति उनके लिए केवल राष्ट्रों या राजनेताओं का विषय नहीं है; वह बच्चों की दुनिया की आवश्यकता है। पुस्तक के अंतिम हिस्से में यह विचार अत्यंत प्रभावशाली रूप में सामने आता है कि बच्चों को बारूद और हिंसा से भरी दुनिया नहीं, बल्कि हरी-भरी, सुंदर और प्रेमपूर्ण दुनिया चाहिए। यही पुस्तक की केंद्रीय संवेदना है।

चित्रात्मकता और पिक्चर बुक का स्वरूप

पुस्तक को पिक्चर बुक के रूप में प्रस्तुत किया गया है और इसकी विषयवस्तु स्वाभाविक रूप से चित्रात्मक है। कबूतर, बच्चों, घोंसले, अंडों, पिकासो की कला, जैतून की शाखा, विभिन्न सांस्कृतिक प्रतीकों और उड़ते हुए सफेद पक्षियों की कल्पना बच्चों के लिए दृश्य संसार निर्मित करती है।

अंतिम दृश्य जब पूरा कबूतर समूह आकाश की ओर उड़ जाता है और अनु तथा बसु उन्हें देखते रह जाते हैं, कहानी को भावनात्मक ऊँचाई देता है। इसके बाद बच्चों का यह संदेश कि दुनिया को युद्ध नहीं, प्रेम चाहिए और बच्चों को हिंसक दुनिया नहीं बल्कि हरी-भरी दुनिया चाहिए, पूरी पुस्तक की वैचारिक यात्रा का सार बन जाता है।

भाषा और शैली : खूबियाँ और सीमाएँ

भाषा सरल, संवादपरक और बाल-सुलभ रखने का प्रयास किया गया है। ‘गुटर गूँ’, ‘फुर-फुर’, ‘फड़फड़’, ‘गुम्म गूँ’ जैसे ध्वनि-शब्द कथा में श्रव्यता और खेलभाव पैदा करते हैं। अनु और बसु की उपस्थिति कथा को जीवंत रखती है। कबूतर के बार-बार बच्चों को ‘दोस्त’ कहने से आत्मीयता पैदा होती है। यह शैली बच्चों को पाठ से भावनात्मक रूप से जोड़ने में सफल होती है।

दूसरी ओर, पुस्तक में सूचनाओं की संख्या बहुत अधिक है। धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, लोकविश्वासों, ऐतिहासिक प्रसंगों, वैज्ञानिक तथ्यों, कला और आधुनिक शांति-प्रतीक को एक ही कथा-धारा में समेटने के कारण कहीं-कहीं कथा की गति सूचना-प्रधान हो जाती है। कुछ प्रसंगों को अधिक विस्तार देने के बजाय छोटे-छोटे स्वतंत्र अध्यायों या दृश्य-खंडों में बाँटा जाता तो बाल पाठक के लिए विषयों को ग्रहण करना और आसान हो सकता था। इसी तरह पुस्तक में तथ्य और मान्यता के स्तरों को और स्पष्ट रूप से अलग किया जा सकता था। जहाँ वैज्ञानिक जानकारी है, वहाँ उसे तथ्य के रूप में और जहाँ पौराणिक या लोकविश्वास हैं, वहाँ उन्हें ‘मान्यता’, ‘कथा’ या ‘लोकविश्वास’ के रूप में स्पष्ट करना बाल-पाठक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की दृष्टि से उपयोगी होता।

निष्कर्षत: कहाँ जा सकता है कि ‘शांतिदूत गुटर गूँ’ एक बहुआयामी बाल-कृति है। इसका उद्देश्य केवल बच्चों को कबूतर के बारे में जानकारी देना नहीं है। इसके पीछे प्रकृति के प्रति प्रेम, जीव-जंतुओं के प्रति करुणा, सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान, परिवार और साझेदारी की समझ तथा युद्ध-विरोधी चेतना विकसित करने की आकांक्षा है। कृति की सबसे बड़ी सफलता यह है कि शांति का संदेश उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत पात्र के माध्यम से बच्चों तक पहुँचता है। कबूतर बच्चों का मित्र बनकर उनसे बात करता है, अपनी कहानी सुनाता है, उन्हें दाना-पानी देने, उसके परिवार का सम्मान करने और उसके बच्चों से दूर रहने की सीख देता है। इस तरह ‘शांति’ किसी बड़े राजनीतिक शब्द से बदलकर रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन जाती है।

कृति यह भी बताती है कि मनुष्य ने कबूतर में अपने अनेक आदर्शों का प्रतिबिंब देखा है—प्रेम, निष्ठा, मातृत्व, पवित्रता, शक्ति, करुणा, संदेशवाहकता और सबसे बढ़कर शांति। पुस्तक में इन सभी अर्थों का संचय है। यदि बालसाहित्य की कसौटी पर देखा जाए तो इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि ‘ज्ञान और संवेदना का समन्वय’ है। यदि पर्यावरणीय दृष्टि से देखें तो यह मनुष्य और पक्षियों के सह-अस्तित्व की भावना पैदा करती है। यदि शांति-साहित्य के संदर्भ में देखें तो यह बच्चों के मन में युद्ध के प्रति असहमति और प्रेमपूर्ण संसार की आकांक्षा जगाती है। और यदि शिक्षण की दृष्टि से देखें तो इसमें विज्ञान, इतिहास, कला, संस्कृति और नैतिक शिक्षा के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। ‘शांतिदूत गुटर गूँ’ को एक ऐसे बाल-पुस्तक अनुभव के रूप में देखा जा सकता है जिसमें ‘गुटर गूँ’ केवल कबूतर की आवाज नहीं रह जाती, बल्कि वह मनुष्य को दिया गया एक सांकेतिक संदेश बन जाती है- ‘प्रेम से रहो, प्रकृति के साथ रहो, हिंसा से दूर रहो और शांति को जीवन-मूल्य बनाओ।‘

पुस्तक का अंतिम दृश्य इसी संदेश को स्थायी बना देता है। नीले आकाश में उड़ता सफेद कबूतर केवल कहानी से विदा नहीं होता; वह बच्चों की कल्पना में शांति का एक जीवंत प्रतीक छोड़ जाता है। आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, हिंसा, वैमनस्य और असहिष्णुता की खबरें बच्चों तक भी पहुँच रही हैं, तब ऐसी रचना का महत्त्व और बढ़ जाता है। बच्चों को युद्ध की भयावहता से डराने के बजाय शांति की सुंदर कल्पना देना इस पुस्तक की सबसे बड़ी मानवीय उपलब्धि है। इस दृष्टि से डॉ. विमला भंडारी की ‘शांतिदूत गुटर गूँ’ एक उपयोगी, ज्ञानवर्धक, कल्पनाशील और मूल्यपरक पिक्चर बुक है, जो बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों, शिक्षकों और बाल साहित्य के अध्येताओं के लिए भी विचारणीय सामग्री प्रस्तुत करती है। पुस्तक का केंद्रीय संदेश अत्यंत सरल है, लेकिन उसकी मानवीय गहराई व्यापक है- दुनिया को युद्ध नहीं, प्रेम चाहिए; बच्चों को बारूद नहीं, हरी-भरी और शांत दुनिया चाहिए।

‘शांतिदूत गुटर गूँ’ के पुस्तक के अंत में दी गई ‘अजब दोस्ती की गजब कहानी’ चित्रकथा पुस्तक के मूल शांति-संदेश को एक अलग और रोचक धरातल प्रदान करती है। इसमें जिराफ़ ‘झिनझिन झींगा’ और ऊँट ‘टुनटुन टिंगा’ की दोस्ती के माध्यम से बच्चों को प्रकृति और संसार के रंगों को देखने-समझने की सहज जिज्ञासा से जोड़ा गया है। दोनों मित्र अमरूद के पत्तों की टोपी बनाकर यात्रा पर निकलते हैं और पेड़-पौधों के हरे रंग से लेकर समुद्र के नीले रंग, जहाजों, सूर्यास्त के पीले-नारंगी रंग और रात के आकाश तक बदलते दृश्यों को आश्चर्य से देखते हैं। अंततः यात्रा की स्मृति और मित्रता के भाव के साथ वे अमरूद की बगीची में लौट आते हैं। इस चित्रकथा की सबसे बड़ी विशेषता इसका दृश्यात्मक कथानक है। कम शब्दों, संवादों और क्रमिक चित्रों के माध्यम से यात्रा, कौतूहल, अनुभव और मित्रता को व्यक्त किया गया है। जिराफ़ और ऊँट जैसे दो अलग-अलग जीवों की दोस्ती पुस्तक के व्यापक सह-अस्तित्व और सद्भाव के विचार को और पुष्ट करती है। समुद्र, जहाज, आकाश, चाँद और बदलते रंग बच्चों की कल्पना को विस्तार देते हैं। हालाँकि मुख्य पुस्तक का केंद्र कबूतर और विश्वशांति है, यह अंतिम चित्रकथा प्रत्यक्ष रूप से उसी विषय को दोहराने के बजाय मित्रता, प्रकृति-प्रेम, यात्रा और विविधता में आनंद का संदेश देती है। इसीलिए यह पुस्तक के अंत में एक सुखद, हल्का और बालमन को आनंदित करने वाला समापन है।

पुस्तक : शांतिदूत गुटर गूँ

लेखिका : डॉ. विमला भंडारी

प्रकाशक : इंडिया नेटबुक प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा

संस्करण : 2026,पृष्ठ : 37

मूल्य : ₹175

डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी
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