भारत की संस्कृति में शिक्षक का स्थान सदैव अत्यंत ऊँचा रहा है। हमारी परंपरा ने शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं माना, बल्कि उसे जीवन का मार्गदर्शक, संस्कारों का संवाहक और समाज के भविष्य का निर्माता माना है। यही कारण है कि भारतीय चिंतन में ‘गुरु’ को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाला कहा गया। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भले ही शिक्षक की भूमिका का स्वरूप बदला हो, लेकिन उसका मूल दायित्व आज भी वही है ,मनुष्य को शिक्षित करने के साथ उसे बेहतर मनुष्य बनाना। भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन देश के महान शिक्षाविद्, दार्शनिक और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती का स्मरण भी है। उनके व्यक्तित्व में शिक्षा, दर्शन, संस्कृति और राष्ट्रचिंतन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। शिक्षक दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है और शिक्षक की भूमिका समाज में कितनी व्यापक है।
आज शिक्षा का संसार तेजी से बदल रहा है। डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑनलाइन शिक्षा और सूचना के असीमित स्रोतों ने ज्ञान प्राप्त करना पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। विद्यार्थी कुछ ही क्षणों में इंटरनेट से हजारों जानकारियां प्राप्त कर सकता है। ऐसे समय में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब जानकारी हर जगह उपलब्ध है, तब शिक्षक की आवश्यकता क्यों है..?
इसका उत्तर यही है कि जानकारी और ज्ञान एक नहीं हैं तथा ज्ञान और विवेक भी एक नहीं हैं। इंटरनेट सूचना दे सकता है, लेकिन सूचना का सही अर्थ समझना, तथ्य और भ्रम में अंतर करना, सही और गलत के बीच निर्णय लेना तथा ज्ञान को जीवन-मूल्यों से जोड़ना शिक्षक ही सिखाता है। एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए तैयार नहीं करता। वह उसके भीतर प्रश्न करने की क्षमता पैदा करता है। वह उसे असफलता से सीखना, सफलता में विनम्र रहना और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना सिखाता है। शिक्षक विद्यार्थी के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास, अनुशासन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के बीज बोता है।

आज समाज जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें शिक्षक का दायित्व और भी बढ़ गया है। युवाओं के सामने रोजगार और प्रतियोगिता की चुनौतियां हैं। सोशल मीडिया के प्रभाव, आभासी दुनिया, बढ़ती उपभोक्तावादी प्रवृत्ति और त्वरित सफलता की मानसिकता ने नई पीढ़ी के सामने अनेक भ्रम भी पैदा किए हैं। ऐसे समय में शिक्षक को केवल विषय विशेषज्ञ बने रहना पर्याप्त नहीं है। उसे विद्यार्थियों का मार्गदर्शक और संवेदनशील संरक्षक भी बनना होगा। शिक्षा का लक्ष्य केवल डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या व्यवसायी बनाना नहीं हो सकता। शिक्षा का अंतिम उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें। जो अपने परिवार के प्रति जिम्मेदार हों, समाज के प्रति संवेदनशील हों और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को पहचानें।
वास्तव में किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी संसद, उसकी इमारतों या उसकी अर्थव्यवस्था से ही तय नहीं होता; उसका भविष्य उन कक्षाओं में भी तैयार होता है जहां शिक्षक आने वाली पीढ़ी के मन और मस्तिष्क को आकार देता है। आज की कक्षा में बैठा विद्यार्थी ही कल का डॉक्टर, वैज्ञानिक, सैनिक, पत्रकार, न्यायाधीश, प्रशासक, किसान, उद्यमी और जनप्रतिनिधि बनेगा। इसलिए शिक्षक का प्रत्येक शब्द भविष्य के समाज को प्रभावित कर सकता है।
परंतु इसके लिए शिक्षक को भी बदलते समय के साथ स्वयं को निरंतर विकसित करना होगा। नई तकनीक से परिचित होना, विद्यार्थियों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को समझना और शिक्षा को रचनात्मक बनाना आज आवश्यक है। शिक्षक का सम्मान तभी सार्थक होगा जब समाज उसे केवल सम्मान समारोहों तक सीमित न रखकर उसकी गरिमा, स्वतंत्रता और कार्यपरिस्थितियों का भी सम्मान करे।
दूसरी ओर विद्यार्थियों की भी जिम्मेदारी है। शिक्षक से प्रश्न करना उनका अधिकार है, लेकिन शिक्षक के प्रति सम्मान और अनुशासन बनाए रखना उनका संस्कार होना चाहिए। आज के डिजिटल युग में विद्यार्थी को यह समझना होगा कि मोबाइल और इंटरनेट शिक्षक के विकल्प नहीं, बल्कि शिक्षक के मार्गदर्शन में उपयोग किए जाने वाले साधन हैं।माता-पिता और शिक्षक के बीच बेहतर संवाद भी अत्यंत आवश्यक है। बच्चे की शिक्षा केवल विद्यालय की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार उसका पहला विद्यालय है और माता-पिता उसके प्रथम शिक्षक। जब परिवार और विद्यालय एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तभी बच्चे का संतुलित व्यक्तित्व विकसित होता है।
आज हमें शिक्षा में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है ,अंकों की दौड़ से निकलकर प्रतिभा और व्यक्तित्व के विकास की ओर बढ़ना। हर विद्यार्थी एक जैसा नहीं होता। किसी में गणित की प्रतिभा होती है, किसी में साहित्य की, किसी में कला की, किसी में खेल की तो किसी में नेतृत्व की। शिक्षक का काम केवल यह देखना नहीं कि कौन विद्यार्थी परीक्षा में कितने अंक लाता है, बल्कि यह पहचानना भी है कि उसके भीतर कौन-सी विशिष्ट क्षमता छिपी हुई है।
एक शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता तब होती है जब उसका विद्यार्थी उससे आगे निकल जाता है। जिस दिन शिष्य अपने शिक्षक से अधिक ऊंचाई प्राप्त करता है, उस दिन शिक्षक छोटा नहीं होता; बल्कि उसकी साधना सफल होती है। यही गुरु-शिष्य परंपरा की वास्तविक सुंदरता है। शिक्षक समाज में मौन क्रांति का वाहक है। वह प्रतिदिन बिना किसी बड़े मंच और प्रचार के राष्ट्र निर्माण करता है। उसकी कक्षा में बोला गया कोई प्रेरक वाक्य किसी विद्यार्थी की पूरी जिंदगी बदल सकता है। उसका विश्वास किसी निराश विद्यार्थी में आत्मविश्वास पैदा कर सकता है और उसकी डांट भी कभी-कभी जीवन की बड़ी भूल से बचा सकती है।इसलिए शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को फूल, माला और शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का दिन भी होना चाहिए कि हम अपने शिक्षकों को कितना सम्मान देते हैं और हमारी शिक्षा व्यवस्था भावी पीढ़ी को किस दिशा में ले जा रही है।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो ज्ञान के साथ विवेक, सफलता के साथ संस्कार, अधिकार के साथ कर्तव्य और प्रतिस्पर्धा के साथ संवेदनशीलता दे। हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो विद्यार्थियों को केवल यह न बताएं कि जीवन में कैसे सफल होना है, बल्कि यह भी सिखाएं कि सफलता प्राप्त करने के बाद समाज और राष्ट्र के लिए कैसे उपयोगी बनना है। आज जब दुनिया तकनीकी रूप से तेजी से आगे बढ़ रही है, तब मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता भले ही अनेक काम कर सके, लेकिन करुणा, संवेदना, नैतिकता और मानवीय विवेक का निर्माण अभी भी मानवीय शिक्षक ही कर सकता है।
शिक्षक वास्तव में भविष्य का निर्माता है। वह केवल ब्लैकबोर्ड पर शब्द नहीं लिखता, वह विद्यार्थियों के मन पर जीवन की इबारत लिखता है। वह केवल पाठ नहीं पढ़ाता, वह पीढ़ियां गढ़ता है। इसलिए शिक्षक का सम्मान किसी एक दिन की औपचारिकता नहीं, बल्कि पूरे समाज की सतत जिम्मेदारी होना चाहिए। 5 सितंबर का शिक्षक दिवस हमें यही संकल्प लेने की प्रेरणा देता है कि हम शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र, चेतना, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाएंगे। क्योंकि जिस राष्ट्र के शिक्षक जागरूक, सम्मानित और उत्तरदायी होते हैं, उस राष्ट्र की आने वाली पीढ़ियां भी जागरूक, संस्कारित और जिम्मेदार होती हैं। “शिक्षक को नमन” जो स्वयं दीपक बनकर अनगिनत जीवनों में प्रकाश भरता है।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस