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स्टील स्लैग से बनेंगी मजबूत और किफायती सड़कें, निर्माण लागत में 40 प्रतिशत तक कमी का दावा

नई दिल्ली। भारत में सड़क निर्माण के क्षेत्र में औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। प्रसंस्कृत स्टील स्लैग एग्रीगेट्स से सड़क निर्माण की स्वदेशी तकनीक न केवल औद्योगिक उप-उत्पाद के उपयोग का नया रास्ता खोल रही है, बल्कि सड़क निर्माण की लागत और टिकाऊपन के लिहाज से भी संभावनाएं पैदा कर रही है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि स्टील स्लैग रोड तकनीक सड़क निर्माण की लागत में लगभग 40 प्रतिशत तक कमी ला सकती है और पारंपरिक सड़कों की तुलना में चार गुना अधिक मजबूती प्रदान कर सकती है।

डॉ. जितेंद्र सिंह यह बात नई दिल्ली में सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) और जिंदल स्टील लिमिटेड की संयुक्त परियोजना को ‘प्रसंस्कृत स्टील स्लैग एग्रीगेट्स से बनी विश्व की सबसे लंबी सड़क’ के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड प्रदान किए जाने के अवसर पर कह रहे थे। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में निर्मित 1.85 किलोमीटर लंबी सड़क को इस तकनीक के बड़े पैमाने पर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

औद्योगिक उप-उत्पाद को सड़क निर्माण में उपयोग करने की पहल

इस तकनीक में इस्पात उत्पादन के दौरान निकलने वाले स्टील स्लैग को वैज्ञानिक प्रक्रिया से प्रसंस्कृत कर सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले एग्रीगेट्स में परिवर्तित किया जाता है। इससे एक ओर औद्योगिक उप-उत्पाद के उपयोग की संभावना बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर सड़क निर्माण में प्राकृतिक एग्रीगेट्स पर निर्भरता कम करने का रास्ता खुलता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत में तेजी से बढ़ते राजमार्गों, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारों, बंदरगाहों और शहरी बुनियादी ढांचे के बीच निर्माण सामग्री की बढ़ती जरूरत के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है। उनके अनुसार, स्टील स्लैग रोड पहल इन दोनों आवश्यकताओं को एक साथ संबोधित करने की क्षमता रखती है।

उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वेस्ट टू वेल्थ’ और सर्कुलर इकोनॉमी के दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि औद्योगिक सामग्री को केवल अपशिष्ट मानने के बजाय विज्ञान और तकनीक के माध्यम से उससे आर्थिक मूल्य पैदा किया जा सकता है।

15 वर्ष तक रखरखाव की आवश्यकता कम होने का दावा

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इस तकनीक से बनी सड़कों के रखरखाव चक्र को भी बढ़ाया जा सकता है और लगभग 15 वर्षों के बाद रखरखाव की आवश्यकता पड़ने की संभावना है। हालांकि, सड़क की वास्तविक सेवा अवधि और रखरखाव की जरूरतें स्थानीय परिस्थितियों, यातायात भार, डिजाइन, निर्माण गुणवत्ता और रखरखाव व्यवस्था जैसे कारकों पर निर्भर करेंगी।

उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण में मजबूती और लंबे समय तक टिकाऊपन का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि कई ग्रामीण और क्षेत्रीय सड़कें अब पहले की तुलना में कहीं अधिक भारी यातायात का सामना कर रही हैं। आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के साथ ऐसी सड़कों पर भारी ट्रक और व्यावसायिक वाहन चलने लगे हैं, जिनका मूल डिजाइन अपेक्षाकृत हल्के यातायात को ध्यान में रखकर किया गया था।

कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में उपयोग की संभावना

भारत की भौगोलिक और जलवायु विविधता को देखते हुए इस तकनीक के उपयोग की संभावनाएं व्यापक हो सकती हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने पूर्वोत्तर भारत में भारी वर्षा के कारण सड़क निर्माण और रखरखाव में आने वाली कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई इलाकों में वर्ष के सीमित महीनों में ही निर्माण कार्य संभव हो पाता है।

ऐसे क्षेत्रों में जहां भारी बारिश, कठिन भूभाग और अधिक यातायात के कारण पारंपरिक सड़कें जल्दी क्षतिग्रस्त होती हैं, अधिक मजबूत सड़क निर्माण तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। उन्होंने विशेष रूप से कठिन और दुर्गम क्षेत्रों में इस तकनीक की संभावनाओं का मूल्यांकन करने पर जोर दिया।

हजीरा से रायगढ़ तक पहुंची तकनीक

स्टील स्लैग आधारित सड़क निर्माण तकनीक का प्रयोग इससे पहले भी विभिन्न परियोजनाओं में किया जा चुका है। गुजरात के हजीरा में एक प्रमुख प्रदर्शन परियोजना के तहत प्रसंस्कृत स्टील स्लैग एग्रीगेट्स का इस्तेमाल औद्योगिक क्षेत्र को हजीरा पोर्ट से जोड़ने वाली छह लेन सड़क में किया गया।

इसके बाद मुंबई-गोवा राष्ट्रीय राजमार्ग-66 के एक हिस्से में भी इस तकनीक का इस्तेमाल हुआ। यहां लगभग 80,000 टन स्टील स्लैग को प्रसंस्कृत एग्रीगेट्स में परिवर्तित कर करीब एक किलोमीटर लंबे चार लेन सड़क खंड के निर्माण में इस्तेमाल किया गया।

तकनीक को अरुणाचल प्रदेश के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों सहित हेवी-ड्यूटी सड़क अवसंरचना में भी तैनात किया गया है। हजीरा पोर्ट के भीतर मल्टी-पर्पज बर्थ को कोयला यार्ड से जोड़ने वाली 1.1 किलोमीटर लंबी सड़क में भी स्टील स्लैग एग्रीगेट्स का इस्तेमाल किया गया है।

इन परियोजनाओं से यह संकेत मिलता है कि उचित प्रसंस्करण, सड़क डिजाइन और गुणवत्ता नियंत्रण के साथ स्टील स्लैग को औद्योगिक एवं परिवहन अवसंरचना में उपयोगी निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक परियोजना से कई राज्यों तक विस्तार पर जोर

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अब इस तकनीक को एक परियोजना से अनेक परियोजनाओं और एक राज्य से कई राज्यों तक ले जाने की जरूरत है। उन्होंने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के साथ रेलवे, अन्य सरकारी विभागों, राज्य सरकारों तथा निजी क्षेत्र की निर्माण और बुनियादी ढांचा कंपनियों को भी इसके उपयोग की संभावनाओं पर विचार करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि केवल तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है। इसके बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए इंजीनियरों, कार्यान्वयन एजेंसियों और परियोजना संचालकों के बीच जागरूकता बढ़ाना तथा तकनीकी मानकों और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है।

सीएसआईआर-सीआरआरआई की ओर से विकसित वैज्ञानिक दिशानिर्देश, प्रसंस्करण प्रोटोकॉल और गुणवत्ता नियंत्रण ढांचा इस तकनीक के व्यवस्थित इस्तेमाल का आधार बन सकते हैं। हालांकि, किसी भी परियोजना में इसके उपयोग का निर्णय स्थानीय तकनीकी और आर्थिक परिस्थितियों के मूल्यांकन के बाद किया जाना होगा।

रायगढ़ परियोजना ने बनाया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में निर्मित 1.85 किलोमीटर लंबी स्टील स्लैग सड़क को ‘प्रसंस्कृत स्टील स्लैग एग्रीगेट्स से बनी विश्व की सबसे लंबी सड़क’ के रूप में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड प्रदान किया गया।

कार्यक्रम में सड़क का वर्चुअल उद्घाटन किया गया। इसके अलावा तकनीक पर आधारित वैज्ञानिक डॉक्यूमेंट्री जारी की गई और सीएसआईआर-सीआरआरआई तथा जिंदल स्टील के बीच प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसी अवसर पर ‘स्टील ग्रिट’ ब्रांड भी लॉन्च किया गया और परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों को सम्मानित किया गया।

सांसद एवं जिंदल स्टील के अध्यक्ष तथा इंडियन स्टील एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन जिंदल, डीएसआईआर की सचिव एवं सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलाईसेल्वी, नीति आयोग के पूर्व सदस्य एवं डीआरडीओ के पूर्व महानिदेशक डॉ. वी.के. सारस्वत, सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. सी.एच. रवि शेखर, गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के प्रतिनिधि, वैज्ञानिक, इंजीनियर और उद्योग जगत के प्रतिनिधि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

अगला लक्ष्य 40 किलोमीटर लंबी सड़क परियोजना

रायगढ़ की 1.85 किलोमीटर लंबी सड़क के बाद अब इस तकनीक को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी है। डॉ. एन. कलाईसेल्वी ने बताया कि सीएसआईआर-सीआरआरआई को ओडिशा में जिंदल स्टील के अंगुल संयंत्र से जुड़ी 40 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए वर्क ऑर्डर प्राप्त हुआ है।

यह परियोजना वर्तमान गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड से कहीं बड़े पैमाने पर तकनीक के इस्तेमाल का अवसर प्रदान करेगी। इसके पूरा होने के बाद स्टील स्लैग आधारित सड़क निर्माण तकनीक के व्यावहारिक विस्तार और बड़े स्तर पर कार्यान्वयन की क्षमता का और बेहतर आकलन किया जा सकेगा।

डॉ. कलाईसेल्वी ने सीएसआईआर-सीआरआरआई और जिंदल स्टील की साझेदारी को इस उपलब्धि का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों, विशेष रूप से डॉ. सतीश पांडे की भूमिका की सराहना की, जिन्होंने तकनीक को शुरुआती प्रदर्शन परियोजनाओं से आगे बढ़ाकर विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं तक पहुंचाने में योगदान दिया।

‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्टील स्लैग रोड तकनीक को विज्ञान, उद्योग और बुनियादी ढांचे के बीच सहयोग का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह की परियोजनाएं यह दिखाती हैं कि अनुसंधान संस्थानों में विकसित तकनीकों को वास्तविक परियोजनाओं में लागू कर औद्योगिक उप-उत्पादों को उपयोगी संसाधनों में बदला जा सकता है।

उन्होंने सीएसआईआर की अन्य रिसाइक्लिंग और रिसोर्स रिकवरी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस्तेमाल किए गए कुकिंग ऑयल से बायोफ्यूल तैयार करने और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से मूल्यवान सामग्री निकालने जैसी पहलें भविष्य की सर्कुलर इकोनॉमी का हिस्सा हैं। उनके अनुसार, गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड को अंतिम उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक सफलता तब होगी, जब तकनीक का इस्तेमाल देश के उन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हो, जहां तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से यह उपयुक्त हो।

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