NEW English Version

हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी : आस्था, प्रेम और मंगलकामना का पावन संगम

14 सितंबर हरितालिका तीज गणेश चतुर्थी पर विशेष

भाद्रपद की पावन बेला में शिव-पार्वती की आराधना और गणपति वंदना का पर्व

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि वे जीवन-मूल्यों, पारिवारिक संबंधों, प्रकृति और सामाजिक सद्भाव को अपने भीतर समेटे होते हैं। भाद्रपद मास इसी दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। वर्षा ऋतु के बीच जब धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब भाद्रपद के पर्व भारतीय जनमानस में नई ऊर्जा, उल्लास और आध्यात्मिक चेतना का संचार करते हैं। इसी क्रम में हरितालिका तीज व्रत और गणेश चतुर्थी दो ऐसे महत्वपूर्ण पर्व हैं, जिनमें एक ओर दांपत्य जीवन की मंगलकामना और नारी की अटूट आस्था दिखाई देती है, तो दूसरी ओर भगवान गणेश की आराधना के माध्यम से बुद्धि, विवेक, समृद्धि और शुभारंभ की कामना की जाती है।हरितालिका तीज : नारी की अटूट आस्था का पर्व।हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। अनेक महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की मंगलकामना के लिए निर्जला अथवा उपवास रखती हैं।

हरितालिका तीज की कथा माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की उनकी दृढ़ इच्छा से जुड़ी है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उनकी इसी अटूट साधना और संकल्प का स्मरण करते हुए सुहागिन महिलाएं तीज का व्रत करती हैं। लेकिन इस पर्व को केवल पति की दीर्घायु की कामना तक सीमित करके देखना इसकी व्यापकता को कम कर देना होगा। इसके भीतर नारी के संकल्प, धैर्य, आत्मविश्वास और अपने जीवनसाथी के प्रति समर्पण की भावना भी निहित है।

शिव-पार्वती : दांपत्य जीवन के आदर्श हैं।भारतीय दर्शन में शिव और पार्वती का संबंध केवल देवी-देवता का संबंध नहीं, बल्कि समानता, सहभागिता और परस्पर सम्मान पर आधारित दांपत्य का आदर्श भी माना गया है। शिव बिना शक्ति के अधूरे हैं और शक्ति बिना शिव के। यही भाव भारतीय संस्कृति में स्त्री और पुरुष की परस्पर पूरकता को व्यक्त करता है। परिवार तभी मजबूत होता है, जब उसमें अधिकार से अधिक विश्वास, अपेक्षा से अधिक सहयोग और अहंकार से अधिक प्रेम हो। इस दृष्टि से हरितालिका तीज आधुनिक समाज के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देती है कि दांपत्य जीवन की सफलता केवल परंपरागत भूमिकाओं से नहीं, बल्कि सम्मान, संवाद, विश्वास और समान भागीदारी से सुनिश्चित होती है।

तीज : लोकजीवन का उत्सव भी है। हरितालिका तीज केवल पूजा और व्रत का दिन नहीं है। छत्तीसगढ़ सहित देश के अनेक हिस्सों में यह महिलाओं के मिलन और उल्लास का अवसर भी बन जाता है। महिलाएं सजती-संवरती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, पारंपरिक गीत गाती हैं और झूले का आनंद लेती हैं। तीज के लोकगीतों में स्त्री के मन की भावनाएं, मायके की स्मृतियां, ससुराल का जीवन, प्रेम, विरह और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता सहज रूप से अभिव्यक्त होती है।

इस प्रकार तीज हमारी लोकसंस्कृति और लोकस्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाली परंपरा भी है। गणेश चतुर्थी : शुभारंभ और विवेक का पर्व है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया जाता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक के देवता के रूप में पूजा जाता है। भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण करने की परंपरा है। गणेश जी का स्वरूप अपने आप में एक संदेश है। उनका विशाल मस्तक हमें व्यापक सोच रखने की प्रेरणा देता है, बड़े कान अधिक सुनने का संदेश देते हैं और छोटी आंखें एकाग्रता का। उनका बड़ा उदर जीवन की परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करने का प्रतीक माना जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी को केवल मूर्ति स्थापना और पूजा का पर्व मानना पर्याप्त नहीं है। यह बुद्धि, विवेक, संयम और सकारात्मक सोच को जीवन में उतारने का अवसर भी है।

गणपति : विघ्नहर्ता से आगे जीवन-दृष्टि । आज का मनुष्य अनेक प्रकार के तनाव, प्रतिस्पर्धा और असमंजस से घिरा हुआ है। ऐसे समय में गणेश चतुर्थी का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। विघ्नों से बचने की प्रार्थना के साथ हमें यह भी संकल्प लेना चाहिए कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना धैर्य और विवेक के साथ करेंगे। केवल विघ्नों के समाप्त होने की प्रतीक्षा करना पर्याप्त नहीं; उन्हें दूर करने के लिए सही निर्णय, परिश्रम और सकारात्मक दृष्टिकोण भी आवश्यक है। गणेश जी के हाथ में अंकुश और पाश का प्रतीकात्मक अर्थ भी हमें अपने मन और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा देता है।

दो पर्व, एक ही है जिसका  संदेश हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी अलग-अलग धार्मिक भावभूमि से जुड़े पर्व हैं, लेकिन दोनों के भीतर एक सुंदर समानता दिखाई देती है।तीज हमें संकल्प, प्रेम और पारिवारिक समर्पण का संदेश देती है, जबकि गणेश चतुर्थी बुद्धि, विवेक और शुभारंभ की प्रेरणा देती है। एक ओर शिव-पार्वती का दांपत्य जीवन हमें संबंधों को प्रेम और सम्मान से निभाने की सीख देता है, तो दूसरी ओर गणेश जी का स्वरूप हमें बताता है कि जीवन की सफलता के लिए बुद्धि और विवेक भी उतने ही आवश्यक हैं। पर्यावरण संरक्षण का संकल्प भी हो, समय के साथ त्योहार मनाने की पद्धतियों में परिवर्तन आया है। गणेश उत्सव ने सामाजिक एकता और सार्वजनिक सहभागिता को मजबूत किया है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी जुड़ी है। मूर्ति स्थापना में प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का प्रयोग, रासायनिक रंगों से बचाव तथा जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।भगवान गणेश स्वयं प्रकृति से जुड़े प्रतीकों के साथ दिखाई देते हैं। इसलिए उनके उत्सव का सबसे सुंदर रूप वही होगा, जिसमें भक्ति के साथ प्रकृति के प्रति संवेदना भी दिखाई दे।

नई पीढ़ी तक पहुंचे पर्वों का वास्तविक संदेश यही है कि आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों और युवाओं को त्योहारों की बाहरी चमक-दमक के साथ उनके पीछे छिपे जीवन-मूल्यों से भी परिचित कराया जाए। उन्हें बताया जाए कि तीज केवल श्रृंगार और व्रत का पर्व नहीं, बल्कि पारिवारिक प्रेम, नारी के संकल्प और लोकसंस्कृति की विरासत है। इसी तरह गणेश चतुर्थी केवल मूर्ति स्थापना का उत्सव नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक, अनुशासन और शुभ कर्म की प्रेरणा है। जब हमारी नई पीढ़ी त्योहारों के अर्थ और उद्देश्य को समझेगी, तभी हमारी सांस्कृतिक परंपराएं केवल औपचारिकता न रहकर जीवन का हिस्सा बनी रहेंगी।

आस्था के साथ मानवीयता भी जरूरी है।भारतीय संस्कृति ने सदैव धर्म को मानव कल्याण से जोड़कर देखा है। इसलिए इन पर्वों के अवसर पर हमें अपने आसपास जरूरतमंद लोगों की सहायता, पशु-पक्षियों के प्रति करुणा, पर्यावरण की रक्षा और समाज में आपसी भाईचारे को मजबूत करने का संकल्प भी लेना चाहिए। व्रत और पूजा तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ हमारे व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे। पर्व हमें जोड़ें, केवल उत्सव न बनें।भाद्रपद की यह पावन बेला हमें दो महान सांस्कृतिक संदेश देती है – संबंधों में प्रेम और जीवन में विवेक।

हरितालिका तीज हमें माता पार्वती के अटूट संकल्प से प्रेरणा देती है, तो गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के माध्यम से बुद्धि और विवेक का महत्व समझाती है। दोनों पर्व मिलकर जैसे यही कहते हैं कि जीवन को सुंदर बनाने के लिए केवल भावनाएं पर्याप्त नहीं और केवल बुद्धि भी पर्याप्त नहीं; प्रेम, विश्वास, विवेक और कर्तव्य इन सभी का संतुलन आवश्यक है। आइए, इस पावन अवसर पर हम केवल अपने परिवार के सुख-समृद्धि की कामना न करें, बल्कि समाज में प्रेम, सद्भाव और सहयोग बढ़ाने का संकल्प भी लें। यही हमारी संस्कृति की वास्तविक शक्ति है और यही इन पावन पर्वों की सच्ची सार्थकता है।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
Book Showcase

Best Selling Books

Ikigai: The Japanese secret to a long and happy life

By Héctor García, Francesc Miralles

₹318

Book 2 Cover

Why I am an Atheist and Other Works

By Bhagat Singh

₹104

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

Until Love Sets Us Apart

By Aditya Nighhot

₹176

Translate »