संजीव जायसवाल ‘संजय’ हिंदी बालसाहित्य के बहुमुखी, सक्रिय और सशक्त रचनाकार हैं। कहानी, उपन्यास, नाटक और चित्रकथा जैसी विविध विधाओं में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। उनकी अनेक रचनाओं का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है तथा उन्हें ‘बाल साहित्य भारती’ सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। बालसाहित्य के प्रति उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता उनकी विविध कृतियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
हिंदी बालसाहित्य का उद्देश्य केवल बच्चों का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उनके भीतर जिज्ञासा, कल्पनाशीलता, संवेदनशीलता और स्वस्थ जीवन-दृष्टि का विकास करना भी है। इसी दृष्टि से संजीव जायसवाल ‘संजय’ की 2025 में प्रकाशित चित्रकथा ‘प्यारे-प्यारे दोस्त’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस कृति में लेखक ने स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे महत्वपूर्ण विषयों को सीधे उपदेश देने के बजाय रोचक कल्पना, सहज भाषा और चित्रात्मकता के माध्यम से बच्चों के सामने प्रस्तुत किया है। यही इसकी सबसे बड़ी रचनात्मक विशेषता है।
पुस्तक की भूमिका में लेखक स्वस्थ शरीर को मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी मानते हुए शरीर के प्रत्येक अंग की उपयोगिता तथा उसकी उचित देखभाल पर बल देते हैं। उनका मानना है कि बच्चों में स्वस्थ जीवनशैली की आदतें बचपन से ही विकसित की जानी चाहिए। इसके लिए कहानियों, खेलों और कल्पनाशील प्रसंगों का सहारा लिया जाए तो स्वास्थ्य तथा स्वच्छता से जुड़े संस्कार बच्चों के मन में सहज और स्थायी रूप से विकसित किए जा सकते हैं।
इसी विचार-दृष्टि को ‘प्यारे-प्यारे दोस्त’ की रचनात्मक संरचना का आधार बनाया गया है। संक्षिप्त कथ्य, सरल भाषा, सहज संवाद और दृश्यात्मक प्रस्तुति इसे छोटे बच्चों के लिए आकर्षक बनाते हैं। कृति की विशेषता यह है कि यह स्वास्थ्य संबंधी संदेश को बोझिल ज्ञान के रूप में नहीं, बल्कि आत्मीय और मनोरंजक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती है। इस प्रकार ‘प्यारे-प्यारे दोस्त’ बालमन को आनंदित करने के साथ-साथ स्वस्थ जीवन के प्रति सजग और जिम्मेदार बनाने वाली उपयोगी चित्रकथा सिद्ध होती है।

वरिष्ठ बाल साहित्यकार
लखनऊ
सपनों से खुलती शरीर की दुनिया
‘प्यारे-प्यारे दोस्त’ की कथा का आरंभ अत्यंत सहज है। मुन्नी रोज जल्दी सो जाती है और उसके सपनों में उसके शरीर के अंग उसके मित्र बनकर उससे मिलने आते हैं। कथा का यह आरंभ बाल-मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चा स्वभावतः कल्पनाशील होता है और उसके लिए निर्जीव वस्तुओं तथा शरीर के अंगों का मानवीकरण किसी चमत्कार से कम नहीं होता। लेखक इसी स्वाभाविक जिज्ञासा को कथा का आधार बनाते हैं।
मुन्नी के सपनों में आने वाले ये ‘दोस्त’ केवल अपने परिचय तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने-अपने कार्य और महत्व को भी बताते हैं। इस प्रकार पुस्तक शरीर-विज्ञान को किसी कठिन पाठ की तरह नहीं, बल्कि आत्मीय बातचीत की तरह प्रस्तुत करती है। यही इस कृति की सबसे बड़ी रचनात्मक उपलब्धि है।
सबसे पहले आँख मुन्नी की मित्र बनकर सामने आती है। आँख स्वयं अपना परिचय देती है और बताती है कि उसी के माध्यम से मुन्नी पढ़ती और संसार की वस्तुओं को देखती है। इस छोटे-से संवाद में आँख के महत्व के साथ उसकी स्वच्छता का संदेश भी सहज रूप में जुड़ जाता है। लेखक बच्चों को यह नहीं कहते कि ‘आँखों की सफाई आवश्यक है’; बल्कि आँख स्वयं बोलती है। इस प्रकार सूचना भावनात्मक संबंध में बदल जाती है।
इसके बाद दाँत आते हैं। दाँत स्वयं को मुन्नी का प्यारा दोस्त बताते हुए भोजन चबाने में अपनी भूमिका स्पष्ट करते हैं। आगे वे सफाई न रखने के दुष्परिणामों की ओर संकेत करते हैं, गंदगी के कारण दाँत खराब हो सकते हैं और गिर भी सकते हैं, जिससे मुन्नी ठीक से खा नहीं पाएगी। यहाँ स्वास्थ्य-संदेश को कारण और परिणाम की छोटी-सी शृंखला के माध्यम से समझाया गया है। ‘चबा-चबाकर’ जैसी पुनरुक्ति कथ्य में लय और बालसुलभ आनंद उत्पन्न करती है।
कान का प्रसंग भी इसी रचनात्मक पद्धति को आगे बढ़ाता है। कान मुन्नी को दुनिया की ‘अच्छी-अच्छी, मीठी-मीठी’ बातें सुनाने वाला दोस्त है। कान की स्वच्छता को सुनने की क्षमता से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। यहाँ भी लेखक का उद्देश्य वैज्ञानिक विवरण देना नहीं, बल्कि बच्चे के अनुभव से स्वास्थ्य की आदत को जोड़ना है।
आँत का प्रसंग पुस्तक को खान-पान की ओर ले जाता है। आँत अपने को मुन्नी की खास सहेली बताती है और भोजन के पाचन में अपनी भूमिका स्पष्ट करती है। इसके साथ फास्ट फूड से दूरी और स्वस्थ भोजन की आवश्यकता का संदेश जुड़ता है। छोटे बच्चों के वर्तमान खान-पान के संदर्भ में यह प्रसंग विशेष उपयोगी है, क्योंकि ‘क्या खाना चाहिए’ की बात को लेखक शरीर के भीतर के एक पात्र के माध्यम से समझाते हैं।
पैर का प्रसंग पुस्तक में स्वास्थ्य को सक्रिय जीवनशैली से जोड़ता है। पैर मुन्नी का सच्चा साथी है, जो उसे घूमने, टहलने और दौड़ने में सहायता करता है। इसके बाद नियमित कसरत का संदेश आता है। ‘दौड़-दौड़कर’ और ‘सरपट…सरपट…’ जैसी अभिव्यक्तियाँ कथा को गतिशील बना देती हैं। यहाँ भाषा स्वयं गति का अनुभव कराने लगती है।



