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संपत्ति और स्वार्थ की दौड़ में कहीं इंसान अपने ही रिश्तों का हत्यारा तो नहीं बन रहा?

जब पैसा रिश्तों से बड़ा हो जाए

आज का समाज आर्थिक प्रगति, बेहतर जीवन और अधिक सुविधाओं की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पैसा जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन है, लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब वही पैसा जीवन का उद्देश्य और रिश्तों से भी बड़ा मूल्य बन जाए। जमीन, मकान, संपत्ति, कर्ज, लेन-देन और आर्थिक स्वार्थ को लेकर परिवारों में बढ़ते विवाद कई बार मारपीट, दुश्मनी और गंभीर अपराध तक पहुंच जाते हैं। ऐसे मामलों में सवाल केवल अपराध का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है जिसमें धन की कीमत इंसान की कीमत से अधिक समझी जाने लगती है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) देश में दर्ज अपराधों का आधिकारिक संकलन और विश्लेषण करता है। उसके आंकड़ों से अपराध की व्यापक तस्वीर सामने आती है, लेकिन किसी एक अपराध को केवल ‘पैसे के लालच’ से जोड़ देना वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं होगा। हत्या और अन्य गंभीर अपराधों के पीछे संपत्ति-विवाद, पारिवारिक कलह, व्यक्तिगत दुश्मनी, नशा, आवेश और अन्य परिस्थितियां अलग-अलग मामलों में भूमिका निभा सकती हैं। “जमीन के एक टुकड़े के लिए रिश्तों का खून” सबसे पीड़ादायक स्थिति तब सामने आती है जब विवाद परिवार के भीतर ही पैदा होता है। जिस भाई के साथ बचपन बीता, जिस बहन के साथ परिवार की स्मृतियां जुड़ी हैं, जिन माता-पिता ने संतान के भविष्य के लिए अपना जीवन खपा दिया या जिस पति-पत्नी ने साथ जीवन बिताने का संकल्प लिया,उन्हीं रिश्तों में जब संपत्ति और धन का विवाद सर्वोपरि हो जाता है, तो पारिवारिक विश्वास की नींव हिल जाती है।

कई मामलों में विवाद शुरुआत में बातचीत, हिस्सेदारी या अधिकार के प्रश्न से शुरू होता है, लेकिन धीरे-धीरे अहंकार, अविश्वास और लालच उसे हिंसा की ओर धकेल सकते हैं। इसलिए संपत्ति का विवाद स्वयं अपराध नहीं है; विवाद को हिंसा और अपराध में बदलने वाली मानसिकता चिंता का वास्तविक विषय है।

अपराध के बाद क्या बचता है? यह इस पूरे विषय का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पक्ष है। कोई व्यक्ति जिस जमीन, मकान या धन के लिए अपराध करता है, अपराध के बाद वह संपत्ति उसके जीवन की सुरक्षा नहीं कर सकती। हत्या कर देने के बाद खोया हुआ रिश्ता वापस नहीं आता। जेल, मुकदमा, सामाजिक बदनामी और परिवार के टूटने की कीमत भी अपराधी और उसके परिजन वर्षों तक चुकाते हैं। अर्थात जिस संपत्ति को पाने के लिए अपराध किया गया, वही संपत्ति अंततः एक ऐसे अपराध की वजह बन जाती है जिसकी कीमत पूरी जिंदगी चुकानी पड़ सकती है।

नशा और अपराध ,खतरनाक गठजोड़ है इस समस्या का एक दूसरा पहलू नशा है। नशे की स्थिति निर्णय क्षमता, आत्मनियंत्रण और व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। जब पहले से मौजूद आर्थिक या पारिवारिक विवाद के साथ नशा जुड़ जाता है तो परिस्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। हालांकि प्रत्येक नशेड़ी अपराधी नहीं होता और प्रत्येक अपराध नशे से नहीं जुड़ा होता, लेकिन नशे की रोकथाम को परिवार और समाज की प्राथमिकताओं में रखना जरूरी है। बच्चों को संपत्ति नहीं, संस्कार की विरासत दें,आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या दे रहे हैं? बैंक बैलेंस, जमीन और मकान जरूरी हैं, लेकिन यदि इन्हीं के साथ संवेदना, संयम, सहिष्णुता और रिश्तों का सम्मान नहीं दिया गया तो आर्थिक समृद्धि भी समाज को सुरक्षित नहीं बना सकती। बच्चों को बचपन से यह समझाना होगा कि संपत्ति का बंटवारा हो सकता है, लेकिन रिश्तों का नहीं; धन कमाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ जीवन वापस नहीं लाया जा सकता। विवाद हो तो बातचीत, मध्यस्थता और कानून का रास्ता अपनाया जाए,हिंसा का नहीं।

इस विषय पर परिवार और समाज को अभी चेतना होगा।इस प्रवृत्ति को रोकने की जिम्मेदारी केवल पुलिस या न्याय व्यवस्था की नहीं है। परिवार पहला विद्यालय है और समाज सबसे बड़ा शिक्षक। परिवारों में संवाद बढ़ाना, बुजुर्गों के प्रति सम्मान, भाई-बहनों के बीच पारदर्शिता, संपत्ति के मामलों में स्पष्ट कानूनी दस्तावेज और विवाद होने पर समय रहते मध्यस्थता ये छोटे कदम बड़े संघर्षों को रोक सकते हैं। समाज को भी ऐसे व्यक्ति को ‘सफल’ नहीं मानना चाहिए जिसके पास बहुत पैसा है, बल्कि उस व्यक्ति को सम्मान देना चाहिए जिसने धन के साथ मानवीयता भी बचाकर रखी है।

आखिर पैसा किसके लिए? यह सवाल हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना होगा..जिस धन के लिए मैं इतना संघर्ष कर रहा हूं, वह मेरे लिए है या मैं उसके लिए? यदि धन हमें बेहतर इंसान बनाने के बजाय रिश्तों से दूर कर रहा है, यदि संपत्ति हमें भाई से दुश्मन बना रही है, यदि लालच हमें माता-पिता, पत्नी, पति या संतान के विरुद्ध खड़ा कर रहा है, तो हमें रुककर अपने जीवन की दिशा पर विचार करना होगा। क्योंकि अंततः मकान, जमीन, बैंक-बैलेंस और संपत्ति यहीं रह जाती है। मनुष्य अपने साथ कुछ नहीं ले जाता। उसके साथ केवल उसके कर्म, उसकी स्मृतियां और उसके द्वारा बांटा गया प्रेम रह जाता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल अपराध रोकने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है जिसमें पैसा साधन से बढ़कर जीवन का मालिक बन जाता है। समाज को तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ी को हम संपत्ति का वारिस बनाना चाहते हैं या संस्कारों का। धन कमाइए, संपत्ति बनाइए, लेकिन उसके लिए इंसानियत मत खोइए …क्योंकि पैसा फिर कमाया जा सकता है, रिश्ते और जीवन नहीं।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस

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