23 सितंबर वामन जयंती
जब छोटे से वामन ने राजा बलि को दिया बड़ा संदेश जिसमें अहंकार पर धर्म और दान की विजय विजय का मर्म छिपा है। भारतीय संस्कृति में भगवान के अवतारों की कथाएं केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं हैं। इनके भीतर जीवन और समाज के लिए गहरे संदेश भी निहित हैं। भगवान विष्णु के पांचवें अवतार माने जाने वाले वामन अवतार की कथा भी ऐसी ही प्रेरणादायी कथा है, जिसमें विनम्रता, वचनपालन, दान, अहंकार और धर्म के अनेक आयाम दिखाई देते हैं।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन जयंती मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लेकर राजा बलि के अहंकार को समाप्त किया और धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि शक्ति हमेशा विशाल शरीर या बाहरी वैभव में नहीं होती; कई बार विनम्रता और विवेक ही सबसे बड़ी शक्ति बन जाते हैं।
पुराणों के अनुसार राजा बलि असुर कुल में जन्मे होने के बावजूद महान दानी, पराक्रमी और प्रजावत्सल राजा थे। अपने पराक्रम और तप के बल पर उन्होंने तीनों लोकों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। राजा बलि ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। उसी समय भगवान विष्णु एक छोटे से ब्राह्मण बालक के रूप में उनके सामने उपस्थित हुए। उनका स्वरूप अत्यंत साधारण था, लेकिन उनके व्यक्तित्व में अद्भुत तेज था। राजा बलि ने वामन से कुछ मांगने का आग्रह किया। वामन ने केवल तीन पग भूमि मांग ली। बलि को लगा कि इतनी छोटी-सी मांग पूरी करना अत्यंत सरल है। उन्होंने वचन दे दिया। लेकिन वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में पृथ्वी, दूसरे पग में आकाश नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए स्थान शेष नहीं था। राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा पग उनके सिर पर रखा जाए। भगवान ने बलि की प्रतिज्ञा, दानशीलता और समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें विशेष सम्मान प्रदान किया।

वामन जयंती की कथा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है, वचन की मर्यादा। राजा बलि जानते थे कि उन्होंने जो वचन दिया है, उसे पूरा करना उनके लिए कठिन हो चुका है। फिर भी उन्होंने अपने वचन से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। आज जब व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में वादों और संकल्पों का महत्व कम होता दिखाई देता है, तब राजा बलि का चरित्र हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके धन और शक्ति से नहीं, बल्कि उसके वचन और चरित्र से होती है।
वामन द्वारा मांगे गए तीन पग केवल भूमि के तीन हिस्सों की मांग नहीं माने जाते। भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में इनके अनेक प्रतीकात्मक अर्थ निकाले गए हैं। इन्हें मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा से जोड़कर भी देखा जा सकता है। अर्थात जीवन का वास्तविक संतुलन तभी संभव है, जब मनुष्य अपने शरीर, मन और आत्मिक चेतना – तीनों को संयमित और संतुलित रखे। एक अन्य दृष्टि से तीन पग हमें यह भी स्मरण कराते हैं कि मनुष्य चाहे कितनी भी उपलब्धियां हासिल कर ले, उसके अधिकार और वैभव की भी एक सीमा होती है।
वामन अवतार का सबसे सुंदर संदेश है विनम्रता। भगवान विष्णु ने अपना कार्य किसी युद्ध या हिंसा के माध्यम से नहीं, बल्कि एक विनम्र बालक के रूप में किया। यही भारतीय दर्शन की विशेषता है कि शक्ति को केवल बाहुबल से नहीं, बल्कि बुद्धि, नीति और संयम से भी जोड़ा गया है। आज के प्रतिस्पर्धी दौर में मनुष्य अक्सर अपनी उपलब्धियों पर अहंकार करने लगता है। पद, पैसा, प्रतिष्ठा और अधिकार उसे दूसरों से बड़ा समझने का भ्रम पैदा कर सकते हैं। वामन जयंती ऐसे अहंकार के विरुद्ध एक सांस्कृतिक चेतावनी है। विनम्र व्यक्ति छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन उसका व्यक्तित्व विराट हो सकता है।
वामन कथा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि राजा बलि को केवल खलनायक के रूप में नहीं देखा गया। उनमें दानशीलता, वचनपालन और समर्पण जैसे अनेक श्रेष्ठ गुण थे। यही भारतीय कथाओं की सुंदरता है कि वे व्यक्ति को केवल अच्छे या बुरे के एक खांचे में नहीं रखतीं, बल्कि उसके गुण-दोष दोनों को सामने लाती हैं। बलि की महानता इस बात में दिखाई देती है कि जब उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति का बोध हुआ, तब भी उन्होंने अपने वचन से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। इसलिए वामन जयंती हमें यह भी सिखाती है कि विरोधी में भी यदि कोई गुण हो तो उसका सम्मान करना चाहिए।
राजा बलि की दानशीलता की कथा हमें दान की व्यापक अवधारणा से परिचित कराती है। दान केवल धन या वस्तु देने का नाम नहीं है। समय देना, ज्ञान बांटना, किसी जरूरतमंद का सहारा बनना, किसी निराश व्यक्ति को आशा देना और समाज के लिए अपना योगदान देना भी दान के ही रूप हैं। आज के समाज में यदि संपन्न व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में योगदान दें तो दान की परंपरा वास्तविक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।
वामन कथा में राजा बलि के पास अपार शक्ति और साम्राज्य था। लेकिन कथा का संदेश यह है कि असीमित अधिकार का भाव मनुष्य को अहंकार की ओर ले जा सकता है। आज राजनीति, प्रशासन, व्यवसाय और सामाजिक जीवन हर क्षेत्र में यह संदेश प्रासंगिक है। पद स्थायी नहीं होता। संपत्ति स्थायी नहीं होती। सत्ता स्थायी नहीं होती। स्थायी होता है तो केवल चरित्र, कर्म और लोकहित में किया गया योगदान। वर्तमान समय में जब भौतिक उपलब्धियों को सफलता का सबसे बड़ा पैमाना मान लिया गया है, वामन जयंती हमें सफलता की परिभाषा पर पुनर्विचार करने का अवसर देती है। क्या बड़ी गाड़ी, बड़ा घर और बड़ा पद ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है? भारतीय संस्कृति का उत्तर है नहीं। सच्ची सफलता वह है जिसमें शक्ति के साथ विनम्रता हो, संपत्ति के साथ दानशीलता हो, अधिकार के साथ जिम्मेदारी हो और उपलब्धि के साथ समाज के प्रति संवेदना हो। यही वामन अवतार का मूल संदेश है।
आज के युवाओं को वामन जयंती की कथा से तीन महत्वपूर्ण सीख मिल सकती हैं – पहली—ज्ञान और विवेक को शक्ति बनाइए।
दूसरी—सफलता मिलने पर अहंकार से बचिए।
तीसरी—अपनी क्षमता का उपयोग केवल स्वयं के लिए नहीं, समाज के हित में भी कीजिए। युवा जितना आगे बढ़ें, उतना ही विनम्र रहें , यही उनके व्यक्तित्व को वास्तविक ऊंचाई देंगे।वामन जयंती हमें एक अत्यंत सुंदर जीवन-दर्शन देती है, बाहरी आकार से किसी की शक्ति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। एक छोटा-सा वामन विराट बन सकता है और एक विशाल साम्राज्य भी समय के सामने छोटा पड़ सकता है।
इसलिए जीवन में शक्ति मिले तो उसके साथ विनम्रता रखिए, संपत्ति मिले तो उसमें से समाज के लिए हिस्सा निकालिए, अधिकार मिले तो उसके साथ कर्तव्य निभाइए और सफलता मिले तो अहंकार से बचिए। वामन जयंती का वास्तविक संदेश यही है कि मनुष्य की महानता उसके पास कितनी शक्ति है, इससे नहीं, बल्कि वह उस शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करता है, इससे तय होती है। आइए, इस पावन अवसर पर हम वचन पालन, विनम्रता, दानशीलता और लोककल्याण को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का संकल्प लें। वामन जयंती हमें याद दिलाती रहे विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो विराट को भी अपने सामने झुका सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
