NEW English Version

स्वस्थ पर्यावरण तो स्वस्थ मानव, यही स्वस्थ पृथ्वी का संकल्प

विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस, 26 सितंबर 2026 पर विशेष

विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस 2026 का संदेश है- “पर्यावरण स्वास्थ्य-समुदायों की रक्षा के लिए विज्ञान के साथ खड़े होना।” यह थीम केवल पर्यावरण की रक्षा का आह्वान नहीं है, बल्कि विज्ञान, प्रमाण और सामूहिक जिम्मेदारी को मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा से जोड़ती है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता यही समझने की है कि पर्यावरण और स्वास्थ्य दो अलग-अलग विषय नहीं हैं। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जिस पानी को पीते हैं, जिस मिट्टी में अन्न उगता है, जिस तापमान में हमारा शरीर जीता है और जिस जैव-विविधता के बीच हमारा जीवन चलता है, ये सभी हमारे स्वास्थ्य के अदृश्य आधार हैं। पर्यावरण बीमार होगा तो मनुष्य स्वस्थ नहीं रह सकता और मनुष्य का अस्वस्थ जीवन पर्यावरण को और अधिक बीमार करेगा। दुनिया की आबादी आठ अरब से अधिक हो चुकी है और जल-संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग 3.6 अरब लोग वर्ष में कम-से-कम एक महीने अपर्याप्त जल उपलब्धता का सामना करते हैं। वर्ष 2000 के बाद बाढ़ से जुड़ी आपदाओं में 134 प्रतिशत और सूखे की संख्या व अवधि में 29 प्रतिशत वृद्धि हुई है। इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि पानी कम हो रहा है, इसका अर्थ यह भी है कि बीमारियां, विस्थापन, खाद्य-असुरक्षा और मानसिक तनाव बढ़ने की जमीन तैयार हो रही है।

जलवायु परिवर्तन का सबसे कठोर चेहरा आज मानव शरीर पर दिखाई दे रहा है। डब्ल्यू.एच.ओ. के अनुसार 2000-2004 की तुलना में 2017-2021 के दौरान 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में गर्मी से संबंधित मृत्यु-दर लगभग 85 प्रतिशत बढ़ी। गर्मी केवल असुविधा नहीं है, यह हृदय, श्वसन, मधुमेह, मानसिक स्वास्थ्य और अन्य बीमारियों को गंभीर बना सकती है। इसीलिए जलवायु नीति को स्वास्थ्य नीति से अलग देखने का समय समाप्त हो चुका है। वास्तव में पर्यावरणीय जोखिम आज वैश्विक स्वास्थ्य का मौन संकट बन चुके हैं। डब्ल्यू.एच.ओ. के अनुसार पर्यावरण से जुड़े जोखिमों को कम करके दुनिया में होने वाली लगभग 24 प्रतिशत मौतों को रोका जा सकता है। वायु प्रदूषण अकेले हर वर्ष लाखों समयपूर्व मौतों से जुड़ा है। इसलिए अस्पतालों की संख्या बढ़ाना ही स्वास्थ्य व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। यदि हवा प्रदूषित है, पानी असुरक्षित है, मिट्टी जहरीली है और शहरों में गर्मी बढ़ रही है, तो बीमारी के कारणों को छोड़े रखकर केवल इलाज की व्यवस्था बढ़ाना अधूरा प्रयास होगा।


आज दुनिया को “इलाज आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था” से “रोकथाम आधारित पर्यावरणीय स्वास्थ्य व्यवस्था” की ओर बढ़ना होगा। अस्पताल बीमारी आने के बाद काम करता है, लेकिन स्वच्छ हवा बीमारी आने से पहले ही उसकी संभावना कम कर देती है। सुरक्षित पेयजल अस्पतालों पर बोझ घटाता है। हरित क्षेत्र मानसिक स्वास्थ्य को सहारा देते हैं। स्वच्छ ऊर्जा श्वसन रोगों का जोखिम घटाती है। बेहतर सार्वजनिक परिवहन वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन दोनों को कम कर सकता है। यही पर्यावरण और स्वास्थ्य का वास्तविक सहजीवन है। इसलिए विकास की परिभाषा पर भी पुनर्विचार जरूरी है। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, अधिक उपभोग और अधिक उत्पादन अपने आप में विकास नहीं हैं। विकास वह है जिसमें मनुष्य के साथ नदी, जंगल, मिट्टी, पशु-पक्षी और आने वाली पीढ़ियों के जीवन का भी स्थान हो। यूएनईपी के नवीनतम ग्लोबल इनवारमेंट आउटलुक-7 ने भी रेखांकित किया है कि स्थिर जलवायु, स्वस्थ प्रकृति, बेहतर भूमि-प्रबंधन और प्रदूषण-मुक्त वातावरण में निवेश से आने वाले दशकों में अर्थव्यवस्था को बड़े लाभ मिल सकते हैं, जबकि वर्तमान विनाशकारी रास्ता जलवायु, जैव-विविधता, भूमि और स्वास्थ्य पर भारी कीमत डाल सकता है।

यहां भारत के लिए भी एक बड़ी संभावना छिपी है। जल-संरक्षण को केवल सरकारी योजना न बनाकर जन-आंदोलन बनाना होगा। वर्षाजल संचयन, तालाबों और झीलों का पुनर्जीवन, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह की रक्षा, भूजल का वैज्ञानिक प्रबंधन, जल-अपव्यय पर नियंत्रण और कृषि में कम पानी वाली तकनीकों का विस्तार-ये सब पर्यावरण नीति के साथ-साथ स्वास्थ्य नीति भी हैं। हर पुनर्जीवित तालाब केवल पानी नहीं बचाता, वह भविष्य की बीमारी, विस्थापन और खाद्य-संकट को भी कम करने में योगदान देता है। इसी प्रकार जंगलों और जैव-विविधता की रक्षा को भी स्वास्थ्य के केंद्र में लाना होगा। मनुष्य ने जब जंगलों को काटा, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट किया और प्रकृति के संतुलन को तोड़ा, तो उसका प्रभाव केवल पेड़-पौधों तक सीमित नहीं रहा। डब्ल्यू.एच.ओ. आज पर्यावरण, पशु और मानव स्वास्थ्य को एक साथ देखने वाले “वन हैल्थ” दृष्टिकोण पर बल देता है। इसका संदेश स्पष्ट है-मानव स्वास्थ्य को पृथक द्वीप की तरह सुरक्षित नहीं किया जा सकता, स्वस्थ मनुष्य के लिए स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र आवश्यक है।

नई दिशा यह होनी चाहिए कि प्रत्येक शहर अपना “पर्यावरण स्वास्थ्य बजट” बनाए। इसमें केवल सड़क और भवन नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति हरित क्षेत्र, स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, वृक्ष आवरण, जल-संचयन, कचरा प्रबंधन, गर्मी से सुरक्षा और जैव-विविधता जैसे मानकों को भी शामिल किया जाए। प्रत्येक विद्यालय में बच्चों को केवल पर्यावरण दिवस पर पौधा लगाने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें अपने क्षेत्र की नदी, तालाब, जलस्तर, वायु गुणवत्ता और जैव-विविधता का स्थानीय संरक्षक बनाया जाए। अस्पतालों को भी ऊर्जा-कुशल, कम-कार्बन और जल-संरक्षण आधारित बनाया जाए। विज्ञान इस अभियान का मार्गदर्शक बने और संवेदना उसका आधार। आंकड़े हमें संकट का आकार बताते हैं, लेकिन संवेदना हमें कार्रवाई के लिए प्रेरित करती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रकृति कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे हम बचा रहे हैं, हम स्वयं प्रकृति का हिस्सा हैं। नदी को बचाना अपने रक्त में बहते जल को बचाना है, जंगल को बचाना अपनी सांस को बचाना है, मिट्टी को बचाना अपने भोजन को बचाना है और जलवायु को बचाना अपने भविष्य को बचाना है। आज आवश्यकता पर्यावरण बनाम विकास की बहस की नहीं, बल्कि पर्यावरण-सम्मत विकास की है। विज्ञान हमें रास्ता दिखा रहा है और प्रकृति हमें उसकी कीमत का संकेत दे रही है। अब निर्णय मनुष्य को करना है कि वह संसाधनों का स्वामी बनकर उन्हें समाप्त करेगा या संरक्षक बनकर उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएगा।

विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस 2026 का वास्तविक संदेश यही होना चाहिए-स्वास्थ्य मंत्रालय अकेले स्वस्थ समाज नहीं बना सकता और पर्यावरण मंत्रालय अकेले स्वस्थ पृथ्वी नहीं बचा सकता। दोनों को एक साथ चलना होगा। स्वच्छ हवा, निर्मल जल, स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित भोजन, संतुलित जलवायु और समृद्ध जैव-विविधता-ये पर्यावरण के विषय भर नहीं, मानव जीवन के मौलिक अधिकार हैं। अंततः हमें ऐसी दुनिया बनानी है जहां अस्पताल कम और स्वस्थ जीवन अधिक दिखाई दे, जहां बोतलबंद पानी खरीदना मजबूरी नहीं, सुरक्षित प्राकृतिक जल सामान्य जीवन का हिस्सा हो। जहां वृक्ष सजावट नहीं, जीवन-सहचर माने जाएं, जहां नदी संसाधन नहीं, जीवंत धरोहर समझी जाए। पर्यावरण को स्वस्थ करना ही मानव स्वास्थ्य को स्वस्थ करना है और मानव जीवन को स्वस्थ बनाना ही पर्यावरण की सबसे बड़ी सुरक्षा है। यही सोच स्वस्थ पर्यावरण, स्वस्थ मनुष्य और स्वस्थ विश्व की नई त्रिवेणी बना सकती है। यही विज्ञान के साथ खड़े होने का वास्तविक अर्थ है और यही विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस की सार्थकता भी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »