दोस्त
कुछ लोग जीवन में आते हैं और समय के साथ चले जाते हैं। कुछ लोग आते हैं, कुछ समय साथ रहते हैं और फिर यादों में कहीं धुंधले पड़ जाते हैं। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें समय, दूरी और मृत्यु भी समाप्त नहीं कर पाती। वे लोग हमारे जीवन से भले ही चले जाएं, लेकिन उनकी बातें, उनका हंसना, उनका अपनापन और उनका निश्छल व्यवहार मन के किसी कोने में हमेशा जीवित रहता है। बृजेश अग्रहरि ‘पप्पू भाई’ मेरे लिए ऐसा ही एक दोस्त था। आज वह इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी यादें आज भी मेरे साथ चलती हैं। उसकी बातें कभी-कभी अचानक कानों में गूंजने लगती हैं, उसका चेहरा आंखों के सामने आ जाता है और मन अनायास ही पूछ बैठता है आखिर इतनी जल्दी क्यों चले गए पप्पू?
हम दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। वह उदई चौक में रहता था। अपने परिवार में तीसरे नंबर का भाई था, लेकिन परिवार की अनेक जिम्मेदारियों को उसने हमेशा तत्परता से निभाया। उसके बड़े भाई कमलेश अग्रहरि मेरे सहपाठी थे, लेकिन मेरी वास्तविक और गहरी दोस्ती पप्पू से थी। यह दोस्ती कुछ दिनों या वर्षों की नहीं, बल्कि उसके जीवन के अंतिम क्षण तक कायम रही। मेरे जीवन में अनेक मित्र आए। कुछ बेहद अच्छे मिले और कुछ ऐसे भी मिले जिनकी याद रखना मैं जरूरी नहीं समझता। लेकिन पप्पू इन सबसे बिल्कुल अलग था। उसकी जगह कोई दूसरा मित्र कभी नहीं ले सकता।
पप्पू का सबसे बड़ा गुण था उसका निष्कपट और निश्छल स्वभाव। उसमें छल-कपट नहीं था। वह संग्रह करने वाला व्यक्ति नहीं था। जिंदगी को वह अपनी ही धुन में जीता था, आज यहां, कल वहां। खाओ, पियो, हंसो और मस्त रहो। उसके लिए जिंदगी बहुत बड़ी योजनाओं और स्वार्थों का नाम नहीं थी, बल्कि उसे वह अपने ढंग से जीना चाहता था। सन 1986-87 के आसपास हमारी दोस्ती और गहरी हुई। उन दिनों मोहल्ले में हमारा एक पूरा दोस्ताना संसार था सुभाष, गुड्डू, संतोष, रमेश सिंधी, गुड्डू संतोष गुप्ता, छुटकौना, मनोज ताम्रकार, संजू, बबलू और न जाने कितने साथी। कोई त्योहार हो, पिकनिक हो, कहीं बैठकर हंसी-मजाक करना हो या बस यूं ही दिन गुजारना हो ,हम सब साथ रहते थे। लगभग 1990 के आसपास पप्पू ने अपने घर के बाहर सड़क किनारे किराए की जगह पर साइकिल स्टैंड और मैकेनिक की दुकान के साथ कैरम क्लब भी शुरू किया। वह जगह देखते ही देखते हमारे दोस्तों का अड्डा बन गई। दिनभर वहां कैरम की गोटियां खनकतीं, हंसी-मजाक होता और दोस्तों की भीड़ लगी रहती। साइकिल के काम से भी उसकी अच्छी आमदनी होने लगी थी।
लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। एक दिन उसके पिता ने न जाने किस बात पर नाराज होकर उसे घर से निकाल दिया। वह क्षण पप्पू के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बन गया।कहा जाता है कि स्वाभिमान आदमी को बहुत कुछ सहना सिखाता है, लेकिन कभी-कभी वही स्वाभिमान उसे अपने ही घर की देहरी से दूर भी कर देता है। पप्पू ने पिता की कड़वी बात को अपने दिल पर इतना ले लिया कि वह बिना कपड़े लिए, बिना कुछ खाए और नंगे पांव घर से निकल गया।
मुझे उस समय इसकी जानकारी तक नहीं थी। जब पता चला तो मन बहुत दुखी हुआ। मैंने उसकी खोज शुरू की। आखिर पता चला कि वह अरपा नदी के उस पार चिंगराजपारा की ओर एसईसीएल कॉलोनी में किसी परिचित के यहां अपना ठिकाना बनाए हुए है। वहीं उसने एक छोटी-सी पान की दुकान शुरू कर दी और अपने जीवन की नई लड़ाई शुरू कर दी। यहीं से मैंने पप्पू को एक नए रूप में देखा। वह परिस्थितियों से टूटने वाला आदमी नहीं था। उसमें गजब की व्यवहार- कुशलता थी। वह नम्र था, सहयोगी था और किसी की मदद के लिए बिना लाभ-हानि सोचे खड़ा हो जाता था। शायद यही कारण था कि जहां भी जाता, लोग उससे जुड़ते चले जाते। उससे मैंने भी बहुत कुछ सीखा ,नम्रता, स्नेह, सहयोग और बिना किसी स्वार्थ के किसी के साथ खड़े हो जाना।
पप्पू में एक और अद्भुत गुण,ऐसा हुनर था ..वह जिस काम को हाथ में लेता, उसमें अपनी जगह बना लेता। ऐसा लगता था जैसे उसके हाथ में हुनर हो तो मिट्टी को भी आकार देकर बेच दे। पान की दुकान के बाद उसने फूलों की सजावट का काम शुरू किया।
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