27 सितंबर – विश्व पर्यटन दिवस
विश्व के प्रत्येक देश की अपनी एक विशिष्ट पहचान होती है। कहीं प्राकृतिक सौंदर्य लोगों को आकर्षित करता है, कहीं ऐतिहासिक धरोहर, कहीं आध्यात्मिक आस्था तो कहीं सांस्कृतिक विविधता। इन सभी विशेषताओं को एक-दूसरे से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम पर्यटन है। पर्यटन केवल भ्रमण या मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान, आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और राष्ट्रीय एकता का सशक्त आधार भी है। इसी उद्देश्य से प्रतिवर्ष 27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है।
भारत पर्यटन की दृष्टि से विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। हिमालय की हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर समुद्र तटों तक, रेगिस्तान से लेकर वर्षावनों तक, प्राचीन मंदिरों से लेकर भव्य किलों तक और विविध लोकसंस्कृतियों से लेकर आधुनिक महानगरों तक भारत का प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यही विविधता देश को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाती है।
पर्यटन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देता है। जब पर्यटक किसी क्षेत्र में आते हैं, तो होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय भोजन, पर्यटन मार्गदर्शक, छोटे व्यापारी और अनेक सेवा क्षेत्रों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। इस प्रकार पर्यटन केवल आय का स्रोत नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का आधार भी बनता है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत पर्यटन की सबसे बड़ी शक्ति है। ताजमहल, खजुराहो, कोणार्क, हम्पी, अजंता-एलोरा, काशी, उज्जैन, अमृतसर, बोधगया और अनेक ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इन स्थलों के माध्यम से भारत की प्राचीन सभ्यता, कला, स्थापत्य और आध्यात्मिक परंपरा की झलक पूरे विश्व को देखने का अवसर मिलता है।
यदि छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यह राज्य प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यटन की अपार संभावनाओं से समृद्ध है। चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, सिरपुर, डोंगरगढ़, भोरमदेव मंदिर, मैनपाट और अमरकंटक जैसे अनेक स्थल देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं। यहाँ की जनजातीय संस्कृति, लोकनृत्य, हस्तशिल्प और पारंपरिक जीवनशैली पर्यटन को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।
पर्यटन का संबंध केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से भी है। यदि पर्यटन अनियंत्रित और अव्यवस्थित हो, तो प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता और सांस्कृतिक धरोहरों को नुकसान पहुँच सकता है। इसलिए आज उत्तरदायी (Responsible) और सतत (Sustainable) पर्यटन की अवधारणा को विशेष महत्व दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य पर्यटन विकास और प्रकृति संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है।

