ज़िंदगी कभी-कभी हमारे सामने ऐसे प्रश्न रख देती है, जिनका उत्तर केवल दिल से नहीं, बल्कि विवेक से देना पड़ता है। यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम करते हो जिसकी मंज़िल में तुम्हारा नाम ही नहीं है, तो यह स्वीकार कर लेना ही प्रेम की पहली परिपक्वता है। प्रेम का अर्थ किसी को पा लेना नहीं, बल्कि उसकी इच्छा और स्वतंत्रता का सम्मान करना भी है। जिस हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम नहीं है, वहाँ अपने आँसुओं से रिश्ते नहीं उगाए जा सकते।
दूसरी ओर यदि कोई तुम्हें सच्चे मन से चाहता है, तुम्हारा सम्मान करता है, तुम्हारी खुशियों में अपनी खुशी देखता है, लेकिन तुम्हारे मन में उसके लिए केवल मित्रता है, तो उसकी भावनाओं को आशा का भ्रम देकर बाँध लेना भी अन्याय होगा। दया से जन्मा रिश्ता कभी प्रेम नहीं बनता, और दया पर टिका विवाह अक्सर दोनों के जीवन को अधूरा कर देता है।

और फिर आता है तीसरा मार्ग विवाह का। याद रखो, विवाह किसी अधूरी कहानी का अंत नहीं, बल्कि एक नई कहानी की शुरुआत है। इसलिए विवाह केवल इसलिए मत करो कि समय निकल रहा है, समाज कह रहा है या कोई तुम्हें बहुत चाहता है। विवाह तब करो, जब तुम्हारा मन निश्चिंत हो, आत्मा सहमत हो और तुम्हें यह विश्वास हो कि तुम सामने वाले के साथ केवल जीवन नहीं, बल्कि अपना सम्पूर्ण अस्तित्व बाँट सकते हो।
कभी-कभी सबसे साहसी निर्णय किसी का हाथ पकड़ लेना नहीं, बल्कि कुछ समय तक अकेले चलने का निर्णय लेना होता है। अकेलापन क्षणिक हो सकता है, लेकिन गलत निर्णय का बोझ जीवनभर साथ चलता है।
याद रखो जिसे तुम चाहते हो, वह तुम्हें नहीं चाहता; जो तुम्हें चाहता है, उसे तुम नहीं चाहते; तो इसका अर्थ यह नहीं कि प्रेम समाप्त हो गया। इसका अर्थ केवल इतना है कि ईश्वर ने अभी तुम्हारे हिस्से का सही साथी तुम्हें नहीं सौंपा है।
अपने मन को शांत करो, स्वयं को समय दो, अपने व्यक्तित्व को संवारो और किसी ऐसे संबंध की प्रतीक्षा करो जिसमें प्रेम एकतरफ़ा नहीं, बल्कि दोनों दिशाओं से बहने वाली नदी हो।
सलाह केवल इतनी-सी है “किसी को पाने की ज़िद मत करो, किसी को खोने के डर से स्वयं को मत खोओ। वह रिश्ता चुनो जिसमें प्रेम के साथ सम्मान हो, सम्मान के साथ विश्वास हो और विश्वास के साथ जीवनभर साथ निभाने की सच्ची इच्छा हो। क्योंकि सच्चा विवाह वहीं सफल होता है, जहाँ दो शरीर नहीं, दो आत्माएँ एक-दूसरे को पूरे मन से स्वीकार करती हैं।”

संपादक
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