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छत्तीसगढ़ में हर पांचवा पुरुष ब्लड प्रेशर का रोगी

शोधपरक एवं चिंतनीय रिपोर्ट

बिलासपुर। स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े तब अधिक चिंताजनक हो जाते हैं, जब वे किसी अस्पताल की चारदीवारी से निकलकर पूरे समाज की जीवनशैली का प्रतिबिंब बनने लगें। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के ताजा आंकड़े ऐसी ही तस्वीर सामने रखते हैं। वर्ष 2023-24 के सर्वेक्षण में प्रदेश के 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के 20.9 प्रतिशत पुरुषों का रक्त शर्करा स्तर 140 mg/dl से अधिक पाया गया अथवा वे रक्त शर्करा नियंत्रित करने की दवा ले रहे थे। NFHS-5 में यह आंकड़ा 10.8 प्रतिशत था। यानी कुछ ही वर्षों में इसमें लगभग दोगुनी वृद्धि दर्ज हुई। रक्तचाप की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है।

छत्तीसगढ़ में हर पांचवें पुरुष में हाई ब्लड प्रेशर

प्रदेश में लगभग 20.8 प्रतिशत पुरुष और 18.4 प्रतिशत महिलाएं बढ़े हुए रक्तचाप की श्रेणी में हैं। शहरी क्षेत्रों में समस्या और स्पष्ट दिखाई देती है। शहरी पुरुषों में यह अनुपात लगभग 24.3 प्रतिशत तथा शहरी महिलाओं में 21.6 प्रतिशत बताया गया है। दूसरी ओर, शहरी छत्तीसगढ़ की 36.1 प्रतिशत महिलाएं ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में पहुंच चुकी हैं। यह आंकड़ा केवल शरीर के बढ़ते वजन का आंकड़ा नहीं है। यह उस सामाजिक बदलाव का संकेत है जिसमें शारीरिक श्रम कम हुआ है, बैठकर काम करने की आदत बढ़ी है, पैदल चलना और साइकिल चलाना घटा है तथा भोजन में नमक, चीनी, तेल और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी बढ़ी है।

दस साल में बदली स्वास्थ्य की तस्वीर

छत्तीसगढ़ लंबे समय तक कुपोषण, संक्रामक रोगों और मातृ-शिशु स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों के संदर्भ में चर्चा में रहा। लेकिन अब राज्य को एक साथ दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है ,एक तरफ अल्पपोषण, दूसरी तरफ मोटापा और गैर-संचारी रोग। NFHS-6 में प्रदेश की 15-49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में कुल 20.3 प्रतिशत ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में हैं, जबकि पुरुषों में यह अनुपात 16.1 प्रतिशत है। शहरी महिलाओं में यह आंकड़ा 36.1 प्रतिशत तक पहुंचना विशेष रूप से गंभीर है। NFHS-5 में प्रदेश की महिलाओं का कुल अनुपात 14.1 प्रतिशत था। यानी छत्तीसगढ़ में अब समस्या केवल यह नहीं है कि लोगों को पर्याप्त भोजन मिल रहा है या नहीं; प्रश्न यह भी है कि किस प्रकार का भोजन, कितनी मात्रा में और किस जीवनशैली के साथ लिया जा रहा है।

बिलासपुर के लिए भी यह चेतावनी क्यों महत्वपूर्ण है?

बिलासपुर केवल एक प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि तेजी से फैलता हुआ शहरी क्षेत्र है। शहर के विस्तार के साथ आवागमन, बैठकर काम करने वाली नौकरियां, निजी वाहनों पर निर्भरता, फास्ट फूड और बदलती खान-पान की आदतें भी बढ़ी हैं‌‌। बिलासपुर से जुड़े पुराने स्वास्थ्य आंकड़े भी गैर-संचारी रोगों की मौजूदगी की ओर संकेत कर चुके हैं। 2012-13 के Annual Health Survey में जिले में चिकित्सकीय रूप से दर्ज मधुमेह की दर राज्य औसत से अधिक दर्ज हुई थी; हालांकि वह आंकड़ा आज की वास्तविक स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि बिलासपुर में मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे रोग कोई बिल्कुल नई चुनौती नहीं हैं। हाल के शोध में छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य एवं आरोग्य केंद्रों की भूमिका का अध्ययन भी हुआ है। इसमें पाया गया कि स्वास्थ्य एवं आरोग्य केंद्र उच्च रक्तचाप संबंधी अनुमानित जरूरत का लगभग 26 प्रतिशत और मधुमेह संबंधी जरूरत का लगभग 21 प्रतिशत ही कवर कर पा रहे थे। यह बताता है कि बीमारी की रोकथाम के साथ-साथ नियमित जांच और निरंतर उपचार की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। इसका अर्थ यह नहीं कि बिलासपुर में प्रत्येक व्यक्ति खतरे में है, बल्कि यह है कि तेजी से शहरीकरण वाले शहरों में रोकथाम और समय पर जांच को स्वास्थ्य नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाना जरूरी है।

केवल बीमारी नहीं, जीवनशैली का पूरा चक्र

उच्च रक्तचाप और बढ़ा हुआ रक्त शर्करा स्तर अक्सर एक-दूसरे से जुड़े जोखिम कारकों के साथ दिखाई देते हैं। मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित भोजन, तनाव, अपर्याप्त नींद, तंबाकू और शराब का सेवन इस जोखिम को और बढ़ा सकते हैं। NFHS-6 के अनुसार छत्तीसगढ़ में 15 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 45.3 प्रतिशत पुरुष तंबाकू का किसी न किसी रूप में सेवन करते हैं। शराब के सेवन का अनुपात भी पुरुषों में लगभग 38.3 प्रतिशत बताया गया है। महिलाओं में ये आंकड़े क्रमशः 18.7 और 5.7 प्रतिशत हैं। यहां समस्या किसी एक आदत की नहीं है। जब दिन का बड़ा हिस्सा कुर्सी पर बीतता है, भोजन में अतिरिक्त नमक-चीनी और कैलोरी बढ़ती है, नींद घटती है और तनाव बढ़ता है, तब शरीर पर पड़ने वाला संयुक्त प्रभाव धीरे-धीरे सामने आता है।

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शहरों में सुविधा बढ़ी, गतिविधि घट गई

कुछ दशक पहले सामान्य जीवन ही शारीरिक व्यायाम का माध्यम था। खेत तक पैदल जाना, बाजार पैदल जाना, साइकिल चलाना, घर के काम करना, बच्चों का मैदान में खेलना और पारंपरिक खेलों में भाग लेना दैनिक जीवन का हिस्सा था।आज मोबाइल फोन, कंप्यूटर, ऑनलाइन सेवाएं, निजी वाहन और घर तक पहुंचने वाली सुविधाओं ने जीवन को आसान बनाया है। लेकिन इसी सुविधा ने शरीर की स्वाभाविक गतिविधि कम कर दी है। बिलासपुर जैसे शहरों में यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्या हमारे पास पर्याप्त सुरक्षित पैदल पथ, साइकिल मार्ग, सार्वजनिक खेल मैदान और खुले व्यायाम स्थल हैं? यदि शहर की योजना केवल वाहनों और भवनों के लिए होगी और पैदल चलने वाले नागरिक के लिए नहीं, तो भविष्य में इसका मूल्य अस्पतालों और दवाइयों के बढ़ते खर्च के रूप में चुकाना पड़ सकता है।

महिलाओं में बढ़ता मोटापा विशेष चिंता का विषय

शहरी महिलाओं में 36.1 प्रतिशत का ओवरवेट/मोटापा आंकड़ा सामाजिक दृष्टि से विशेष ध्यान मांगता है। इसे केवल सौंदर्य या शरीर के आकार का प्रश्न मानना बड़ी भूल होगी। अधिक वजन आगे चलकर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और अन्य गैर-संचारी रोगों के जोखिम से जुड़ सकता है। इसलिए महिलाओं के स्वास्थ्य को केवल मातृत्व और प्रजनन स्वास्थ्य तक सीमित देखने के बजाय उनके मधुमेह, रक्तचाप, मोटापा, मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक सक्रियता को भी प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में समान महत्व देना होगा।

ग्रामीण छत्तीसगढ़ भी अछूता नहीं

यह मान लेना भी गलत होगा कि जीवनशैली से जुड़े रोग केवल शहरों की समस्या हैं। NFHS-6 में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर जरूर दिखाई देता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में भी बदलती जीवनशैली, बाजार में उपलब्ध पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, तंबाकू, शराब और शारीरिक श्रम के बदलते स्वरूप के कारण जोखिम बढ़ रहा है।छत्तीसगढ़ जैसे विशाल ग्रामीण और आदिवासी आबादी वाले राज्य में इसका समाधान केवल बड़े शहरों के अस्पतालों से संभव नहीं है। इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, स्वास्थ्य एवं आरोग्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और गांव स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को मजबूत करना होगा।

इलाज से ज्यादा जरूरी है समय पर पहचान

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उच्च रक्तचाप और मधुमेह लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के भी रह सकते हैं। व्यक्ति स्वयं को स्वस्थ समझता रहता है और बीमारी धीरे-धीरे शरीर पर असर डालती रहती है। इसीलिए 30 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों में नियमित रक्तचाप और रक्त शर्करा जांच को सामान्य स्वास्थ्य व्यवहार बनाया जाना चाहिए। केवल बीमारी होने के बाद जांच कराने की संस्कृति बदलनी होगी। छत्तीसगढ़ में गैर-संचारी रोगों के प्रबंधन के लिए डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है। WHO के अनुसार राज्य में राष्ट्रीय NCD पोर्टल के साथ ABHA को जोड़कर स्क्रीनिंग, निदान, उपचार और फॉलोअप को बेहतर बनाने की पहल हुई है। डर्ग जिले के अनुभव में ABHA से जुड़े मरीजों में फॉलोअप और बीमारी नियंत्रण की स्थिति गैर-जुड़े मरीजों की तुलना में बेहतर पाई गई। यह अनुभव बिलासपुर समेत पूरे प्रदेश के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है।

अब स्वास्थ्य नीति का केंद्र अस्पताल नहीं, समाज होना चाहिए

सरकार को चाहिए कि प्रत्येक शहर में पैदल चलने और साइकिल चलाने को सुरक्षित बनाया जाए। सार्वजनिक पार्कों और खेल मैदानों की संख्या बढ़े। स्कूलों में खेल को केवल अतिरिक्त गतिविधि न मानकर स्वास्थ्य शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर रक्तचाप और रक्त शर्करा की जांच को नियमित और सुलभ बनाया जाए। उच्च जोखिम वाले लोगों का फॉलोअप सुनिश्चित किया जाए।तंबाकू और शराब के विरुद्ध जागरूकता अभियान केवल विज्ञापन तक सीमित न रहें।

बिलासपुर जैसे शहर में नगर नियोजन को भी स्वास्थ्य नीति से जोड़ने की जरूरत है। सड़क केवल वाहन के लिए नहीं, पैदल यात्री और साइकिल चालक के लिए भी होनी चाहिए। मोहल्लों में छोटे खेल मैदान और खुले व्यायाम स्थल विकसित किए जाने चाहिए।

परिवार से शुरू होगा बदलाव

सरकार अपनी भूमिका निभाएगी, स्वास्थ्य विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाएगा, लेकिन जीवनशैली का वास्तविक परिवर्तन घर से शुरू होगा। भोजन की थाली में सब्जियां, दालें, मोटे अनाज और संतुलित मात्रा को स्थान देना, नमक और चीनी कम करना, नियमित पैदल चलना, पर्याप्त नींद लेना, तंबाकू और शराब से दूर रहना तथा समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना,ये ऐसे छोटे कदम हैं जिनका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। हर परिवार यदि प्रतिदिन केवल 30-45 मिनट शारीरिक गतिविधि के लिए निकालने का संकल्प करे तो स्वास्थ्य की तस्वीर बदलने की शुरुआत हो सकती है।

आंकड़े डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए हैं

NFHS-6 के आंकड़े छत्तीसगढ़ को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि समय रहते सचेत करने के लिए हैं। पुरुषों में बढ़ा हुआ रक्त शर्करा स्तर, उच्च रक्तचाप, महिलाओं में बढ़ता मोटापा और नशे की मौजूदगी यह बताती है कि प्रदेश की स्वास्थ्य चुनौती अब केवल संक्रामक बीमारियों तक सीमित नहीं है। गैर-संचारी रोगों के विरुद्ध भी उतनी ही गंभीर लड़ाई जरूरी है। बिलासपुर सहित प्रदेश के शहरों को यह तय करना होगा कि वे ऐसे शहर बनेंगे जहां लोगों को स्वस्थ रहने के लिए अस्पताल ढूंढना पड़े, या ऐसे शहर जहां स्वस्थ जीवन जीना ही सबसे आसान विकल्प हो। क्योंकि स्वास्थ्य अस्पताल में नहीं बनता। स्वास्थ्य बनता है हमारी रसोई में, हमारी चाल में, हमारी नींद में, हमारी आदतों में और उन छोटे-छोटे निर्णयों में जिन्हें हम हर दिन लेते हैं।आज सवाल यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ में कितने लोग हाई ब्लड प्रेशर या बढ़ी हुई शुगर से प्रभावित हैं। असली सवाल यह है कि आज हम कितने लोगों को कल बीमार होने से बचा सकते हैं।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
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