एशियाई खेलों में भारत का चौथे स्थान पर रहना निश्चित रूप से उपलब्धि है, लेकिन विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखने वाले भारत के लिए यह उपलब्धि आत्मसंतोष का कारण नहीं, बल्कि आत्ममंथन और नए संकल्प का अवसर होनी चाहिए। आइची-नागोया एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने 85 पदक-21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य-जीतकर अपनी क्षमता का परिचय दिया है। एशिया जैसे खेल महाशक्ति वाले महाद्वीप में शीर्ष चार देशों में स्थान बनाना सामान्य उपलब्धि नहीं है। फिर भी प्रश्न यह है कि जब चीन और जापान जैसे देश हमसे आगे हैं, तब भारत प्रथम और द्वितीय स्थान तक कब पहुंचेगा? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिस भारत को हम आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सामरिक शक्ति के रूप में विश्व की अग्रिम पंक्ति में देखना चाहते हैं, उसकी खेल शक्ति अभी भी अपेक्षित ऊंचाइयों तक क्यों नहीं पहुंच पाई है? एशियाड के पदक हमें दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाते हैं। पहली तस्वीर उत्साह जगाती है। तीरंदाजी में नौ पदक, जिनमें पांच स्वर्ण शामिल हैं, भारतीय प्रतिभा की मजबूत उपस्थिति का प्रमाण हैं। कुमकुम मोहोद का रिकर्व वर्ग में व्यक्तिगत उपलब्धि हासिल करना, प्रणवी उर्स का व्यक्तिगत गोल्फ स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनना तथा बॉक्सिंग और कुश्ती में स्वर्णिम प्रदर्शन हमारी खेल प्रतिभा की व्यापकता को दर्शाता है। क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी में भारतीय खिलाड़ियों का दबदबा भी कायम रहा।
महिला हॉकी टीम की सफलता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मौजूदा चौंपियन चीन को हराकर स्वर्ण पदक हासिल करना केवल एक पदक नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय से चले आ रहे इंतजार का अंत है। यह जीत बताती है कि जब प्रतिभा, अनुशासन, सामूहिक भावना और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता एक साथ आती है तो भारतीय खिलाड़ी किसी भी प्रतिद्वंद्वी को चुनौती दे सकते हैं। लेकिन दूसरी तस्वीर आत्ममंथन की मांग करती है। एथलेटिक्स में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ। निशानेबाजी, जिसे भारत की पदक संभावनाओं का मजबूत आधार माना जाता है, भी उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरी। पिछली बार के मुकाबले कुल पदकों और स्वर्ण पदकों में कमी भी गंभीर संकेत है। इसलिए चौथा स्थान हमारी मंजिल नहीं, अगली छलांग का पड़ाव होना चाहिए।भारत और चीन-जापान के बीच अंतर को केवल पदक तालिका से नहीं समझा जा सकता। खेलों में शीर्ष स्थान हासिल करने के लिए वर्षों तक चलने वाली वैज्ञानिक योजना, जमीनी स्तर से प्रतिभा खोज, आधुनिक प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, पोषण, मानसिक मजबूती, चिकित्सा सहायता और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का निरंतर अनुभव जरूरी होता है। चीन ने खेलों को राष्ट्रीय शक्ति के एक महत्वपूर्ण आयाम के रूप में विकसित किया है। जापान ने खेल संस्कृति को शिक्षा, अनुशासन और जीवनशैली से जोड़ा है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी विशाल युवा आबादी को केवल संभावित खिलाड़ियों की संख्या के रूप में न देखे, बल्कि उसे विश्वस्तरीय खेल प्रतिभा में बदलने का तंत्र विकसित करे। भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी है तो प्रतिभा को पहचानने, तराशने और लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाए रखने वाली सुव्यवस्थित व्यवस्था की। गांव, छोटे शहर और साधारण परिवारों से आने वाली असंख्य प्रतिभाएं आज भी उचित प्रशिक्षण, संसाधन और अवसर के अभाव में आगे नहीं बढ़ पातीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में खेलों के प्रति भारत का दृष्टिकोण बदला है। खेल अब केवल मनोरंजन या कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों का क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि इसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, युवा शक्ति और स्वस्थ समाज के निर्माण से जोड़ा जा रहा है। खेलो इंडिया जैसे अभियानों ने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को पहचानने की दिशा में महत्वपूर्ण वातावरण बनाया है। ओलंपिक और एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ियों की बढ़ती उपस्थिति भी इस परिवर्तन का संकेत है। लेकिन अब अगला चरण और अधिक महत्वाकांक्षी होना चाहिए। हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि भारत कितने पदक जीत सकता है, बल्कि यह पूछना चाहिए कि भारत किन खेलों में विश्व की शीर्ष शक्ति बन सकता है। हमें पदक-केन्द्रित सोच से आगे बढ़कर खेल-परिस्थितिकी तंत्र यानी ऐसी पूरी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें प्रतिभा की खोज से लेकर उसके अंतरराष्ट्रीय करियर तक हर चरण की जिम्मेदारी स्पष्ट हो। भारत में खेल और शिक्षा को लंबे समय तक एक-दूसरे का विकल्प समझा गया। यह सोच बदलनी होगी। खेल किसी विद्यार्थी की पढ़ाई में बाधा नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम हैं। विद्यालयों में खेल के घंटे, प्रशिक्षित कोच, आधुनिक मैदान और फिटनेस कार्यक्रम अनिवार्य होने चाहिए। यदि किसी बच्चे में असाधारण प्रतिभा दिखाई देती है तो उसकी आर्थिक स्थिति उसके भविष्य की बाधा नहीं बननी चाहिए। सरकार, निजी क्षेत्र, खेल संस्थाओं और कॉरपोरेट जगत को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें प्रतिभाशाली खिलाड़ी को प्रशिक्षण, उपकरण, पोषण, यात्रा और प्रतियोगिताओं के लिए आर्थिक सुरक्षा मिल सके।
भारत की अगली चुनौती केवल पदक जीतना नहीं, बल्कि लगातार चैंपियन तैयार करना है। एक खिलाड़ी की सफलता के बाद उसी खेल में अगली पीढ़ी तैयार होनी चाहिए। इसके लिए खेल विज्ञान को प्रशिक्षण का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। आधुनिक फिटनेस, डेटा विश्लेषण, बायोमैकेनिक्स, स्पोर्ट्स मेडिसिन, मनोविज्ञान और पोषण विज्ञान को भारतीय खेल व्यवस्था में व्यापक रूप से शामिल करना होगा। मानसिक मजबूती भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिभा के साथ दबाव संभालने की क्षमता निर्णायक बनती है। इसलिए खिलाड़ियों के लिए खेल मनोवैज्ञानिकों और मानसिक प्रशिक्षकों की नियमित व्यवस्था आवश्यक है। किसी खिलाड़ी की एक प्रतियोगिता में असफलता को उसकी क्षमता का अंतिम प्रमाण मानने के बजाय उसे सीखने और वापसी का अवसर दिया जाना चाहिए। भारतीय महिला खिलाड़ियों ने हाल के वर्षों में जिस प्रकार अपनी क्षमता सिद्ध की है, वह भारत के खेल भविष्य की सबसे सकारात्मक तस्वीरों में से एक है। महिला हॉकी की स्वर्णिम सफलता इसका ताजा उदाहरण है। तीरंदाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, एथलेटिक्स, गोल्फ और अन्य खेलों में भी बेटियों ने अपनी प्रतिभा दिखाई है। अब जरूरत है कि ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों की बेटियों को खेलों से जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं। सुरक्षित खेल परिसर, महिला प्रशिक्षक, छात्रवृत्ति और परिवारों में खेल के प्रति सकारात्मक वातावरण इस दिशा में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। भारत की आधी आबादी को खेल शक्ति में पूरी तरह शामिल किए बिना विश्व की खेल महाशक्ति बनने का सपना अधूरा रहेगा।
लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 दूर नहीं है। इसलिए एशियाड की उपलब्धियों और कमियों का विश्लेषण केवल समाचारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक खेल के लिए अभी से पदक की वास्तविक संभावना, संभावित खिलाड़ियों की सूची, प्रशिक्षण योजना और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का कैलेंडर तैयार होना चाहिए। हमें उन खेलों की पहचान करनी होगी जिनमें भारत अगले ओलंपिक में बड़ी छलांग लगा सकता है। साथ ही जिन खेलों में हम लगातार पिछड़ रहे हैं, वहां रणनीतिक निवेश करना होगा। लक्ष्य यह होना चाहिए कि भारत केवल कुछ पारंपरिक खेलों में नहीं, बल्कि एथलेटिक्स, तैराकी, निशानेबाजी, जिम्नास्टिक, साइकिलिंग, कुश्ती, मुक्केबाजी और अन्य ओलंपिक खेलों में व्यापक पदक क्षमता विकसित करे। भारत का चौथा स्थान यह संदेश देता है कि हम पीछे नहीं हैं, लेकिन अभी बहुत आगे जाना बाकी है। हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, विज्ञान और तकनीक में नई उपलब्धियां हासिल हो रही हैं, शिक्षा और आधारभूत ढांचे का विस्तार हो रहा है और भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका लगातार मजबूत कर रहा है। ऐसे समय में खेलों में भी विश्वस्तरीय उत्कृष्टता हमारी राष्ट्रीय पहचान का अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए। खेल केवल पदक नहीं देतेय वे अनुशासन, धैर्य, नेतृत्व, टीम भावना, आत्मविश्वास और स्वस्थ जीवन की संस्कृति देते हैं। इसलिए खेलों में निवेश वास्तव में राष्ट्र के भविष्य में निवेश है। आइची-नागोया हमें गर्व करने का अवसर देता है, लेकिन उससे भी अधिक आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। चौथा स्थान मंजिल नहीं, चेतावनी और चुनौती दोनों है। अब भारत को यह संकल्प लेना होगा कि अगली एशियाई प्रतियोगिताओं में हम केवल शीर्ष चार में रहने के लिए नहीं, बल्कि प्रथम और द्वितीय स्थान के लिए मैदान में उतरेंगे। और ओलंपिक में केवल पदकों की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि विश्व खेल शक्ति बनने के लिए तैयारी करेंगे। जिस भारत को विश्वगुरु बनना है, उसे विश्व खेलगुरु बनने की दिशा में भी उतनी ही गंभीरता से कदम बढ़ाने होंगे।

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार