-11 अक्टूबर: शारदीय नवरात्र एवं घट स्थापना दिवस पर विशेष-
भारत की सनातन संस्कृति में पर्व-त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने वाली परंपराएं हैं। इन्हीं में शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व है। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाले नवरात्र में नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्र का प्रथम दिन घट स्थापना अथवा कलश स्थापना के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह शक्ति, समृद्धि, शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा के आवाहन का प्रतीक है। घट स्थापना के साथ ही घरों, मंदिरों और देवी पंडालों में मां जगदंबा की विधिवत पूजा-अर्चना प्रारंभ हो जाती है। कलश को भगवान विष्णु का स्वरूप तथा उसके ऊपर स्थापित नारियल को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कलश में भरा जल जीवन का प्रतीक है, जबकि उसके चारों ओर बोए जाने वाले जौ को समृद्धि और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार घट स्थापना प्रकृति, जीवन और शक्ति के बीच सामंजस्य का सुंदर संदेश देती है।

नवरात्र केवल देवी की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि नारी शक्ति के सम्मान और उसकी गरिमा को स्वीकार करने का अवसर भी है। भारतीय संस्कृति में शक्ति को मातृस्वरूप में प्रतिष्ठित किया गया है। मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूप हमें यह संदेश देते हैं कि नारी केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की शक्ति भी है। आज जब महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, सेना, राजनीति, खेल, साहित्य और उद्योग सहित प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं, तब नवरात्र की शक्ति आराधना का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। देवी की पूजा तभी सार्थक होगी, जब हम अपने जीवन में महिलाओं के प्रति सम्मान, समानता और सुरक्षा की भावना को भी स्थान दें।
नवरात्र के नौ दिन मनुष्य को बाहरी आडंबर से अधिक आंतरिक शुद्धि की प्रेरणा देते हैं। व्रत, उपवास, संयम, सात्विक आहार, ध्यान और पूजा के माध्यम से व्यक्ति अपनी इंद्रियों तथा विचारों पर नियंत्रण का प्रयास करता है। वास्तव में नवरात्र हमारे भीतर व्याप्त क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करने का अवसर है। मां दुर्गा के हाथों में अस्त्र-शस्त्र केवल युद्ध के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य को अपने भीतर की बुराइयों से संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। महिषासुर का वध इस बात का प्रतीक है कि अंततः सत्य और सदाचार की विजय होती है तथा असत्य और अहंकार का पतन निश्चित है।
नवरात्र की परंपराओं में प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान भी दिखाई देता है। कलश, जल, नारियल, पत्तियां, जौ और मिट्टी, ये सभी प्रकृति के महत्वपूर्ण तत्व हैं। इसलिए नवरात्र हमें यह भी स्मरण कराता है कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति से अलग नहीं है।आज पर्यावरण संकट, जल संकट और प्रदूषण जैसी चुनौतियां हमारे सामने हैं। ऐसे समय में धार्मिक आस्था को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना आवश्यक है। पूजा-पंडालों में प्लास्टिक के स्थान पर प्राकृतिक सामग्री का उपयोग, जल स्रोतों को प्रदूषित न करना तथा विसर्जन की पर्यावरण अनुकूल व्यवस्था करना हमारी आस्था को अधिक सार्थक बना सकता है।
शारदीय नवरात्र के दौरान गांवों से लेकर महानगरों तक देवी मंदिरों और पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। गरबा, डांडिया, जगराता, भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में उत्साह और सामूहिकता का वातावरण बनता है। जाति, वर्ग और आर्थिक भेदभाव से ऊपर उठकर लोग मां के दरबार में एक साथ सिर झुकाते हैं।
यही नवरात्र का सबसे सुंदर सामाजिक संदेश है—शक्ति तभी सार्थक है, जब वह समाज के कमजोर और जरूरतमंद व्यक्ति के काम आए। हमें इस पर्व पर गरीबों, बुजुर्गों, असहायों और जरूरतमंद परिवारों की सहायता का संकल्प भी लेना चाहिए। घट स्थापना के साथ घर में दीप प्रज्वलित करते समय हमें अपने अंतर्मन में भी ज्ञान और विवेक का दीप जलाना चाहिए। मां दुर्गा से केवल व्यक्तिगत सुख-समृद्धि मांगने के बजाय समाज, राष्ट्र और मानवता के कल्याण की प्रार्थना करना ही इस पावन पर्व की वास्तविक भावना है।
शारदीय नवरात्र हमें सिखाता है कि शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि उस सामर्थ्य का सदुपयोग है। जिस दिन हमारे भीतर की नकारात्मक शक्तियों पर सद्विचारों की विजय होगी, उसी दिन वास्तविक नवरात्र हमारे जीवन में प्रारंभ होगा।
मन में श्रद्धा, कर्म में शक्ति,
जीवन में उजियारा हो,
मां के चरणों में झुके शीश,
हर मन में सद्भाव हमारा हो।
मिटे अहंकार, मिटे अंधेरा,
सत्य का दीप जले हर द्वार,
मां दुर्गा की कृपा से जग में,
हो मानवता की जय-जयकार।।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस