किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का आकलन केवल उसकी आर्थिक विकास दर, सकल घरेलू उत्पाद, औद्योगिक विस्तार अथवा वैश्विक आर्थिक रैंकिंग से नहीं किया जा सकता। विकास की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, निर्धनता का दायरा सिमटे, सामान्य नागरिक के जीवन में सुरक्षा, सम्मान और समृद्धि का संचार हो, गरीबी का कलंक मिटे तथा आर्थिक अवसरों पर सबका समान अधिकार स्थापित हो। इस दृष्टि से भारत में गरीबी और निर्धनता के स्तर में आई उल्लेखनीय गिरावट एक ऐतिहासिक उपलब्धि और नए भारत के निर्माण का शुभ संकेत है। विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट में भारत की इस प्रगति को वैश्विक स्तर पर गरीबी में आई सबसे तेज गिरावटों में से एक माना जाना इस उपलब्धि को और महत्वपूर्ण बनाता है। यह केवल आर्थिक आंकड़ों का परिवर्तन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव की कहानी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन की दिशा में किए गए प्रयासों का यह एक महत्वपूर्ण परिणाम है, एक शुभ एवं श्रेयस्कर भविष्य की आहट है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011 से 2023 के बीच भारत में अत्यधिक निर्धनता की दर 27.1 प्रतिशत से घटकर 2.6 प्रतिशत रह गई। इसी अवधि में 4.20 डॉलर प्रतिदिन की अंतरराष्ट्रीय निर्धनता सीमा के अंतर्गत आने वाली आबादी का अनुपात 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत हो गया। इसका अर्थ है कि लगभग 49.6 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए। वर्ष 2028 तक इस अनुपात के 12.1 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान भी व्यक्त किया गया है। ये आंकड़े भारत की आर्थिक और सामाजिक यात्रा में एक बड़े परिवर्तन के प्रमाण हैं। विशेष बात यह है कि भारत ने इतनी बड़ी आबादी, व्यापक सामाजिक विविधता और कोविड जैसी वैश्विक महामारी की चुनौतियों के बावजूद निर्धनता कम करने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, यह मोदी सरकार की युगान्तरकारी जन-कल्याण योजनाओं एवं गरीबी उन्मूलन के संकल्पों का ही परिणाम है। इस परिवर्तन के पीछे केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि विकास को जनकल्याण से जोड़ने की नीति भी महत्वपूर्ण रही है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जनधन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन, हर घर जल, आयुष्मान भारत, मुद्रा योजना और मुफ्त खाद्यान्न वितरण जैसी योजनाओं ने निर्धन परिवारों के जीवन में व्यापक बदलाव लाने का काम किया है। इन योजनाओं की विशेषता यह है कि इन्होंने गरीबी को केवल आय की कमी के रूप में नहीं देखा, बल्कि आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, भोजन और वित्तीय समावेशन जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से जोड़कर उसका समाधान करने का प्रयास किया है।

किसी निर्धन परिवार को पक्का मकान मिलना केवल आवास की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसे संपत्ति, सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करना है। घर में बिजली, शौचालय और नल से जल की सुविधा उपलब्ध होना उसके जीवन की गुणवत्ता में बुनियादी परिवर्तन लाता है। जनधन खातों और आधार जैसी व्यवस्थाओं ने नागरिकों को वित्तीय एवं वैधानिक पहचान प्रदान की है। आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य संकट के समय गरीब परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देने का आधार तैयार किया है। विश्व बैंक ने गरीबी में कमी के प्रमुख कारणों में उपभोग में वृद्धि, रोजगार के अवसरों का विस्तार, विशेषकर महिलाओं की रोजगार में बढ़ती भागीदारी और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक कल्याणकारी हस्तांतरणों की भूमिका को रेखांकित किया है। वर्ष 2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ लोगों की वृद्धि होना भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसमें ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती आर्थिक सक्रियता परिवारों की आय बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक आत्मनिर्भरता और निर्णय क्षमता को भी मजबूत करती है। ग्रामीण भारत में निर्धनता की तेज गिरावट ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच आर्थिक अंतर को भी कम करने में योगदान दिया है।
एक अन्य महत्वपूर्ण संकेतक गिनी सूचकांक है, जिसके माध्यम से आय अथवा उपभोग के वितरण में असमानता का आकलन किया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत का उपभोग आधारित गिनी सूचकांक 23 तक पहुंचा है, जो अपेक्षाकृत कम असमानता का संकेत देता है। यह अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों की तुलना में भारत की बेहतर स्थिति को दर्शाता है। हालांकि यहां यह समझना आवश्यक है कि उपभोग आधारित गिनी सूचकांक समाज में संपत्ति, आय और अवसरों की समग्र असमानता का पूरा चित्र प्रस्तुत नहीं करता। इसलिए गरीबी में कमी को आर्थिक समानता की पूर्ण उपलब्धि मान लेना उचित नहीं होगा। यही वह बिंदु है, जहां भारत की विकास यात्रा का आलोचनात्मक मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है। एक ओर करोड़ों लोग गरीबी से बाहर निकल रहे हैं, दूसरी ओर समाज में संपत्ति और आर्थिक संसाधनों का संकेंद्रण एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। उच्च आय वर्ग और सामान्य मेहनतकश नागरिक के बीच जीवन की सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अवसरों का अंतर अभी भी व्यापक है। गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी, असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की असुरक्षा, युवाओं में बेरोजगारी, कृषि पर निर्भर परिवारों की सीमित आय और महिलाओं को समान पारिश्रमिक न मिलना ऐसे प्रश्न हैं, जिनका समाधान किए बिना समतामूलक समाज की कल्पना अधूरी रहेगी। गरीबी का कम होना और अमीरी-गरीबी के बीच की खाई का कम होना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। पहली उपलब्धि उत्साह देती है, लेकिन दूसरी चुनौती पर निरंतर ध्यान देना आवश्यक है।
भारत को अब ऐसी विकास नीति की आवश्यकता है, जिसमें आर्थिक प्रगति का लाभ केवल कुछ क्षेत्रों, वर्गों अथवा उद्योगों तक सीमित न रहे। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, कौशल विकास, छोटे उद्यमों को प्रोत्साहन, कृषि का आधुनिकीकरण, श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और महिलाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार के अवसर इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। कर व्यवस्था में न्यायपूर्ण संतुलन, ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में निवेश और सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं की पारदर्शिता भी आवश्यक है। विकास का वास्तविक उद्देश्य अवसरों की समानता पैदा करना होना चाहिए, न कि केवल आर्थिक आंकड़ों में ऊंचाई हासिल करना। भारत आज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में गरीबी में कमी की यह उपलब्धि विशेष महत्व रखती है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब आर्थिक शक्ति के साथ सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और अवसरों की समानता भी सुनिश्चित हो। गरीबी-मुक्त भारत का सपना केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यमिता, शिक्षा, सामाजिक सहभागिता और न्यायपूर्ण आर्थिक व्यवस्था के समन्वय से साकार होगा। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट भारत में गरीबी से मुक्ति की ओर बढ़ते कदमों और करोड़ों जीवन में फैलती खुशहाली की ऐसी उजली तस्वीर प्रस्तुत करती है, मानो दीपावली के पर्व पर विकास के दीप जल उठे हों। यह केवल आंकड़ों की रोशनी नहीं, बल्कि उन करोड़ों परिवारों के जीवन में उम्मीद, आत्मविश्वास और सम्मान का उजाला है, जो अभावों के अंधकार से निकलकर समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं। सचमुच, इस बार दीपावली के दीपों में नए भारत की प्रगति और गरीबों के जीवन में आए उजास की चमक भी दिखाई दे रही है।
निस्संदेह, गरीबी के मोर्चे पर भारत की यह सफलता नए भारत, समृद्ध भारत और आत्मनिर्भर भारत की मजबूत आधारशिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में करोड़ों लोगों को निर्धनता के दायरे से बाहर लाना एक उल्लेखनीय स्थान रखता है। लेकिन इस उपलब्धि का अगला चरण आर्थिक असमानता की खाइयों को पाटना और विकास की रोशनी को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना होना चाहिए। विकसित भारत की पहचान केवल उसकी आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि इस बात से होगी कि वहां कोई व्यक्ति अभाव, भुखमरी, अशिक्षा और असहायता में जीवन जीने को विवश न हो। 2047 का भारत तभी वास्तविक अर्थों में विकसित और समृद्ध होगा, जब उसकी प्रगति का लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचेगा और आर्थिक समृद्धि के साथ सामाजिक समरसता एवं समानता भी उसकी पहचान बनेगी। यही नए भारत का स्वप्न है और यही उसकी विकास यात्रा की सबसे बड़ी कसौटी भी।

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार