मन का अंधियारा हरें, भरें नवल उजियार।
दीप करें नहिं भिन्नता, बाटें मधुरिम प्यार।।
गांव, गली, वन, वाटिका, खुशी बांटते दीप।
महल झोपड़ी गेह को, सदा मानते मीत।
भेद-भाव करते नहीं, नहीं किसी से बैर।
दीप निभाते मित्रता, हों अपने या गैर।।
पौध रोपते ज्ञान के, राह करें आसान।
दीप गलाते हैं सदा, लोभ-मोह अभिमान।।
सघन तमस से जूझते, ज्योति जलाते दीप।
परहित जीवन जी सदा, बनते उज्ज्वल सीप।।
‘मलय’ दीप-सा हम जलें, करें जगत उजियार।
दीप सिखाते हैं हमें, मानव जीवन सार।।
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शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)