NEW English Version

दीपावली बने विकसित एवं समृद्ध भारत की नई ज्योति

दीपावली केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व नहीं है, यह मनुष्य के भीतर सोई हुई चेतना को जगाने, जीवन की दिशाहीनता को दिशा देने और सभ्यता के वर्तमान पड़ाव पर अपने मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर है। आज भारत विकसित भारत, समृद्ध भारत, समर्थ भारत और आत्मनिर्भर भारत की संकल्पयात्रा पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। दुनिया भारत की आर्थिक शक्ति, तकनीकी सामर्थ्य, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक दृष्टि को नए विश्वास के साथ देख रही है। ऐसे समय में दीपावली का दीपक केवल घर की चौखट पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के आकाश में भी जलना चाहिए। हमारे सामने एक बड़ा प्रश्न है-जब दीपों की संख्या बढ़ रही है, तब मनुष्य के भीतर का प्रकाश क्यों मंद पड़ रहा है? घर जगमगा रहे हैं, बाजार रोशन हैं, महानगरों की इमारतें विद्युत-दीपों से नहा रही हैं, तकनीक जीवन को सुविधाओं से भर रही है, फिर भी मनुष्य के भीतर तनाव, असुरक्षा, हिंसा, स्वार्थ, असहिष्णुता और मोह का अंधकार क्यों गहराता जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने दीपक तो बहुत जला लिए, लेकिन अपने भीतर बाती लगाना भूल गए?

आतंकवाद, हिंसा, युद्ध, घृणा और वैमनस्य की जड़ें किसी मशीन या हथियार में नहीं, मनुष्य की विकृत चेतना में होती हैं। इसलिए आतंकवाद की समस्या का स्थायी समाधान केवल सुरक्षा-व्यवस्था से नहीं होगा। मनुष्य को अनावश्यक हिंसा छोड़ने का संकल्प करना होगा। जब तक मनुष्य के भीतर प्रतिशोध की आग जलती रहेगी, तब तक संसार में शांति का दीपक पूरी तरह प्रज्वलित नहीं हो सकता। अहिंसा केवल जैन दर्शन का सिद्धांत नहीं, बल्कि भविष्य की मानव सभ्यता की आवश्यकता है। एक सुंदर आध्यात्मिक दृष्टांत है। अंधकार ने ब्रह्मा से शिकायत की कि सूर्य उसका पीछा करता है और उसे मिटा देना चाहता है। सूर्य ने कहा-मैं तो अंधकार को जानता तक नहीं, मिटाने की बात तो दूर है, पहले उसे मेरे सामने उपस्थित करो। जब अंधकार को सूर्य के सामने आने के लिए कहा गया तो उसने उत्तर दिया-मैं उसके पास कैसे आऊं? उसके सामने आते ही मेरा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। यही सत्य धर्म और अज्ञान के संबंध का है। जहां ज्ञान का सूर्य उदित हो जाता है, वहां अज्ञान का अंधकार टिक नहीं सकता। जहां करुणा का दीप जलता है, वहां हिंसा की कालिमा ठहर नहीं सकती। जहां आत्मसंयम की ज्योति प्रज्वलित होती है, वहां मोह और मूर्च्छा का साम्राज्य धीरे-धीरे ढहने लगता है। इसीलिए दीपावली की वास्तविक सार्थकता केवल घर की सफाई में नहीं, अंतःकरण की सफाई में है। हम महीनों से घर के कोने-कोने की धूल हटाते हैं, पुराने सामान को व्यवस्थित करते हैं, दीवारों को सजाते हैं और घर को नया रूप देते हैं। लेकिन क्या कभी हमने अपने मन के कोनों में जमी ईर्ष्या की धूल झाड़ी? क्या क्रोध की कालिख साफ की? क्या अहंकार के जाले हटाए? क्या लोभ और मोह के पुराने सामान को बाहर निकाला? यदि इस दीपावली हम अपने भीतर की ऐसी सफाई कर पाए, तो यही पर्व हमारे जीवन का सबसे बड़ा उत्सव बन जाएगा।

महान दार्शनिक संत आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने अंतर्दर्शन को आत्मप्रकाश का मार्ग बताया। उनका संकेत स्पष्ट था कि बाहर की दुनिया को देखने की हमारी आदत बहुत गहरी है, जबकि भीतर झांकने की साधना बहुत कमजोर। आज मनुष्य के पास दुनिया देखने के लिए असंख्य माध्यम हैं, लेकिन स्वयं को देखने का समय नहीं। मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, लेकिन मन की स्क्रीन धुंधली होती जा रही है। सूचना का भंडार बढ़ रहा है, पर आत्मबोध का दीप क्षीण हो रहा है। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है-हम चाँद पर पहुँचने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन अपने भीतर के अंधेरे कोनों तक पहुँचने में संकोच कर रहे हैं। नया भारत केवल ऊँची इमारतों, तेज गति की अर्थव्यवस्था, अत्याधुनिक तकनीक और विश्वस्तरीय बुनियादी ढाँचे से नहीं बनेगा। विकसित भारत की असली पहचान उसके नागरिकों की विकसित चेतना से होगी। समृद्धि तभी सार्थक है जब संवेदना जीवित रहे, शक्ति तभी मंगलकारी है जब उसमें संयम हो, विज्ञान तभी कल्याणकारी है जब उसके साथ विवेक हो और विकास तभी पूर्ण है जब उसके केंद्र में मनुष्य तथा प्रकृति दोनों के प्रति करुणा हो। भारत की सनातन संस्कृति ने सदियों पहले जीवन का यही सूत्र दिया था-तमसो मा ज्योतिर्गमय। अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, असंयम से संयम की ओर और स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ना ही भारतीय संस्कृति की जीवनधारा है। आज जब भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है, तब उसकी सबसे बड़ी पूँजी केवल अर्थव्यवस्था या तकनीकी शक्ति नहीं, बल्कि उसकी सनातन जीवनदृष्टि है। दीपावली इस सनातन संस्कृति को नया आकाश देने का पर्व बन सकती है। हमें दुनिया को केवल यह नहीं बताना कि भारत आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा है, हमें यह भी दिखाना है कि भारत मानवीय मूल्यों के साथ विकास करना जानता है। ऐसा विकास, जिसमें प्रकृति के लिए स्थान हो, वंचित के लिए संवेदना हो, वृद्ध के लिए सम्मान हो, युवा के लिए अवसर हो, नारी के लिए गरिमा हो और प्रत्येक मनुष्य के लिए सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण जीवन हो। आज आवश्यकता है कि दीपावली के दीपक को राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बनाया जाए। एक दीप आत्मसंयम का, एक अहिंसा का, एक पर्यावरण-संरक्षण का, एक सामाजिक समरसता का, एक नारी-सम्मान का, एक ईमानदारी का और एक राष्ट्रनिष्ठा का। जब करोड़ों घरों के करोड़ों दीप इन मूल्यों के साथ जलेंगे, तब भारत की रोशनी केवल घरों और बाजारों तक सीमित नहीं रहेगी, वह विश्वमानवता का पथ आलोकित करेगी।

दीपक की एक विशेषता है-वह स्वयं जलता है और दूसरों को प्रकाश देता है। यही भारत की संस्कृति का मूल चरित्र है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना लेकर चलने वाला भारत अपने उत्थान को विश्वकल्याण से अलग नहीं देख सकता। भारत यदि विश्वगुरु बनना चाहता है तो उसे दुनिया को केवल ज्ञान नहीं, जीवन का संतुलन भी देना होगा, केवल समृद्धि का मॉडल नहीं, शांति का मार्ग भी दिखाना होगा। इस दीपावली एक प्रश्न अपने आप से जरूर पूछें-मेरे भीतर कौन-सा अंधकार अभी बाकी है? क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, भय, असंवेदनशीलता या निष्क्रियता? क्योंकि अंधकार को कोसने से प्रकाश नहीं आता। एक छोटा-सा दीप जलाना पड़ता है। दीपक हमें यह भी सिखाता है कि जीवन से पलायन नहीं, परिवर्तन चाहिए। परिस्थितियां चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों, मनुष्य को अपने भीतर की लौ को बुझने नहीं देना चाहिए। इस दीपावली घरों के साथ हृदयों को भी सजाएं, चौखट के साथ चेतना को भी संवारें और आकाश में उड़ती रोशनी के साथ अपने भीतर आत्मज्योति को भी प्रज्वलित करें। क्योंकि विकसित भारत की सबसे बड़ी पहचान चमकती सड़कों से नहीं, जाग्रत नागरिकों से होगी।

आज भारत नई करवट ले रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था नई ऊँचाइयां छू रही है, विज्ञान नई सीमाएं लांघ रहा है, युवा नई संभावनाओं के द्वार खोल रहे हैं और भारत विश्वमंच पर अपनी भूमिका को नए आत्मविश्वास के साथ स्थापित कर रहा है। इस परिवर्तन की यात्रा में दीपावली का संदेश भी नया होना चाहिए-बाहर का भारत रोशन हो और भीतर का भारत जागृत हो। तभी दीपावली केवल एक पर्व नहीं रहेगी, वह नवभारत की नवज्योति, सनातन संस्कृति की नई आभा और विश्वमानवता के लिए भारत के प्रकाश-पथ का उद्घोष बनेगी। आइए इस दीपावली एक दीप अपने घर में जलाएं और एक दीप अपने भीतर। एक दीप समृद्ध भारत के लिए और एक दीप संवेदनशील भारत के लिए। एक दीप विकास के लिए और एक दीप विवेक के लिए। क्योंकि जब भीतर का दीप जलता है, तभी बाहर की रोशनी सार्थक होती है। और जिस दिन भारत के करोड़ों अंतःकरणों में यह ज्योति प्रज्वलित हो जाएगी, उस दिन भारत केवल विकसित नहीं होगा-वह विश्व को विकास के साथ विवेक, शक्ति के साथ शांति और समृद्धि के साथ संवेदना का मार्ग दिखाने वाला विश्वगुरु बनेगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »