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पहली कविता: सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

मैं जब सन् 1983 में कक्षा ग्यारहवीं स्कूल लाल बहादुर शास्त्री हायर सेकेंडरी बिलासपुर में पढ़ रहा था। तब हमारे स्कूल का छात्र संघ चुनाव होने जा रहा था। उस छात्र संघ चुनाव में हम छात्रगणों के बीच काफी उत्साह और प्रत्याशियों के बीच पैनल में चुनाव में जीतने की जोरदार तैयारी चल रही थी। छात्रनेता पूरे जोशोखरोश के साथ अपने अपने पैनल से चुनाव की तैयारी कर चुके थे। हर छात्र नेता छात्रों से संपर्क व मानमनुहार कर रहा था कि मुझे वोट देना।

छात्र संघ के चुनाव में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष ,सचिव और सह सचिव के पद पर चुनाव होने जा रहे थे, चुनाव के तारीख की घोषणा हो चुकी थी, और एक हफ्ते बाद चुनाव तिथि निर्धारित थी। लेकिन  जैसे जैसे वोटिंग का दिन पास आते जा रह था वैसे वैसे ही स्कूल में छात्र नेताओं के बीच जी जान से चुनाव जीतने का उत्साह और गहमागहमी चरम पर आते जा रहा था। चूंकि हम लोग साइंस बायो लेकर पढ़ रहे थे, जिसमें स्कूल में छात्रों की संख्या कम थी। खास करके आर्ट्स ग्रुप के छात्रों की संख्या स्कूल में ज्यादा थी, इसलिए आर्ट्स के छात्र ही चुनाव में ज्यादातर विभिन्न पदों पर उम्मीदवार के रूप में खड़े होकर अपनी अपनी किस्मत आजमा रहे थे।

हमारी क्लास में से किसी भी छात्र ने किसी भी पद के लिए उम्मीदवारी नहीं किया था। इसलिए हमारी क्लास जिसमें करीब 60 छात्र थे ,सभी व्यक्तिगत संबंधों व मित्रों को ही सपोर्ट कर रहे थे। आखिर धीरे-धीरे एक हफ्ता कब निकल गया पता ही नहीं लगा और चुनाव का दिन आ गया। चुनाव वाले दिन चुनाव भी शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। दूसरे दिन जीते हुए उम्मीदवारों की घोषणा स्कूल के चुनाव अधिकारियों ने करना था।

दूसरे दिन स्कूल में हम सब की क्लास लगी हुई थी। हम सब भी अपने बायोलॉजी के 11वीं की कक्षा में उपस्थित थे,क्लास में पढ़ाई चल रही थी। इस दौरान हाफ छुट्टी के समय सभी छात्रों के बीच चर्चा का बाजार खूब गर्म था, कि कौन उम्मीदवार अध्यक्ष बनेगा? कौन उपाध्यक्ष? स्कूल भर में अटकलबाजी का दौर चल रहा था। हमारी कक्षा का क्लास मॉनिटर प्रदीप उपाध्याय और था। प्रदीप उपाध्याय के साथ पांच लोगों की खूब मित्रता थी , जिसमें मैं भी शामिल था। मेरे साथ प्रभात गुप्ता, मोहम्मद अली, संतोष तंबोली, भी शामिल थे। हम पांचो की टोली थी हम सब एक ही डेस्क में एक साथ अगल-बगल में बैठते भी थे। उसी दिन दोपहर 1:00 जब हमारी क्लास का तीसरा पीरियड जो की हिंदी की होती थी, जिनको हमारे क्लास टीचर श्यामसुंदर सचदेव सर लेते थे।

तीसरा पीरियड शुरू होते ही हमारे क्लास टीचर सचदेव सर क्लास में पहुंचे फिर उन्होंने हम सभी स्टूडेंट्स से कहा की – जैसा की तुम लोगों को मालूम है कल स्कूल में छात्र संघ का चुनाव संपन्न हुआ है! जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, सह सचिव के पद पर आज पदाधिकारी चुने जाएंगे। फिर उन्होंने आगे बताया कि प्रिंसिपल साहब ने छात्र संघ में एक और पद सृजित किया है। लेकिन क्योंकि चुनाव संपन्न हो चुका है इसलिए इस पद को मनोनयन से चुना जाएगा। उन्होंने फिर कहा कि स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को वर्षभर संचालित व इसका नेतृत्व करने के लिए स्कूल में साहित्यिक सचिव का भी पद रखा जा रहा है। इस पद को मनोनयन से चुने जाने का स्कूल कमेटी ने निर्णय लिया है। 

अब यह पद चुनाव हो जाने के बाद किया जा रहा है, इसलिए मनोनयन की प्रक्रिया के लिए चुनाव कमेटी ने यह निर्णय लिया है कि 11वीं कक्षा के कोई भी विषय के  छात्र जो अगर कहानी /कविताएं लिखते हों तो वह इस पद नियुक्ति हेतु अपनी कविताएं अपने-अपने क्लास टीचर को पास जमा करेंगे। इसके बाद उनकी रचनाओं को चुनाव संचालन समिति और प्रिंसिपल साहब के समक्ष रखा जाएगा। फिर यही कमेटी जिनकी कविता श्रेष्ठ पाई जाएगी उनको साहित्यिक सचिव के पद के लिए मनोनीत करेगी। सर ने फिर अपनी बात आगे बताते हुए कहा कि अगर क्लास में कोई भी स्टूडेंट कविता लिखना हो तो अपनी रचना एक सादे कागज में लिख कर मेरे पास लाकर के जमा कर दें, इसके लिए आज शाम तक मुझे अपनी रचना देना होगा।

सचदेव‌ सर का इतना कहना ही था कि हम छात्रों के बीच में खुसुरफुसुर होने लगी। और जैसा की मैंने बताया कि हम पांचो मित्र एक ही देश में एक साथ बैठा करते थे। इत्तेफाकन इसी दौरान कुछ दिन पहले मैंने एक छोटी सी कविता लिखी थी, जिसको झिझकते हुए मैंने अपने दोस्तों को दिखाया था। दोस्तों ने मेरी कविता को पढ़कर खूब तारीफ किया था। और कहा था कि भाई तू तो अच्छा लिख रहा है। अच्छा है ऐसे लिखा कर और भी अच्छा लिख लेगा। आपको बता दूं कि इस कविता को मैंने अपने जीवन में पहली बार लिखा था और यही वजह थी कि मुझे अपने द्वारा लिखी हुई कविता पर थोड़ा भी विश्वास नहीं था ,कि मैं कुछ अच्छा भी लिख पाया होउंगा। मैं काफी नर्वस था कि मेरी कविता को पढ़कर कहीं हंसी ना उड़ाया जाए। सो मैंने अपनी कविता को दोस्तों को दिखा कर फिर चुपचाप कॉपी में दबा कर रख दिया था।

लेकिन जब हमारे क्लास टीचर ने घोषणा की की जो भी साहित्यिक सचिव पद के लिए उम्मीदवारी जताना चाहता है या करना चाहता है तो वह इस हेतु अपनी कविता मेरे पास जमा कर दे। सर की बातों को मैंने भी सुना था लेकिन मेरी कतई हिम्मत नहीं हुई कि मैं अपनी लिखी हुई कविता को सर को दे दूं। पर मेरे अगल-बगल के बैठे हुए दोस्तों ने तुरंत मुझे कहा के सुरेश अपनी कविता को सर को दे दे। लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई। तब मेरे एक सहपाठी मित्र ने ही खड़े होकर सर से कहा कि सर सुरेश एक कविता लिख करके रखा है, और अच्छी कविता लिखा है। वह आप देख लें। तब सर ने मुझसे पूछा कि अगर तुम कविता लिखे हो तो मुझे दो। मैं जब संकोच करने लगा तो मेरे ही मित्र ने मेरी कॉपी में छुपाकर रखी हुई मेरी लिखी हुई कविता के पन्ने को निकाल दिया और को सर की ओर बढ़ा दिया।    

सर ने मेरी लिखी हुई कविता को  ध्यान से पढ़ने लगे। इन क्षणों में मैं काफी संकोच और डर महसूस कर रहा था कि कर उसे कहीं वापस ना दें। पर आशा के विपरीत सर ने मेरे लिखे हुए कविता को पढ़कर कहा कि – “ठीक है” और अपने रजिस्टर में रख लिया! फिर कहा कि मैं इसे चुनाव कमेटी के सामने रख दूंगा, इसके बाद  छात्र संघ चुनाव में वोटो की गिनती वाला समय भी आ गया जिसमें सभी विजित पदाधिकारियों की घोषणा की जानी थी इसी दिन 2:30 बजे की सेकेंड हाफ छुट्टी के बाद चुनाव कमेटी ने वोटो की गिनती कर ली, और फिर बारी-बारी से चारों पद के विजयी पदाधिकारियों के नाम की घोषणा की। 

अंत में पांचवें नंबर पर साहित्यिक सचिव के नाम की घोषणा  की जानी थी तब हमारे क्लास के छात्रों के बीच काफी हलचल मच गई कि सुरेश सिंह की भी इसके लिए प्रविष्टि गई है, देखो क्या होता है…? इस बीच छात्रों के समूह के बीच बैठा हुआ मैं भी काफी घबरा रहा था। मन में विचार चल रहा था कि पता नहीं किसका नाम साहित्यिक सचिव पद के लिए घोषित होगा? चुनाव कमेटी की यह घोषणा स्कूल के परिसर में बने देवकीनंदन दीक्षित हाल में की जा रही थी। जहां स्कूल के सारे स्टाफ मंच पर थे। और सामने की ओर स्कूल के पूरे छात्रगणों का समूह था। हमारी कक्षा के सभी छात्र इस भीड में शामिल थे। 

विजयी प्रत्याशियों की घोषणा करने वाले हमारे प्रिंसिपल साहब ने अन्य चार विजयी प्रत्याशियों के विजय होने की घोषणा के बाद अंत में यह कहना शुरू किया कि अब साहित्यिक सचिव के पद के लिए नाम घोषित की जा रही है।  फिर उन्होंने बताना शुरू किया इसके लिए कई छात्रों की कहानी और कविताएं चुनाव कमेटी के समक्ष लाई गई थी जिसमें से सर्वश्रेष्ठ कविता का चुनाव कर लिया गया है और इसके आधार पर साहित्यिक सचिव पद का मनोरंजन किए जाने का निर्णय ले लिया गया है। आप सभी को बताते हुए यह हर्ष हो रहा है कि साहित्यिक सचिव पद के लिए सुरेश सिंह बैस का नाम चयनित किया गया है। 

यह सुनते ही मैं काफी आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी से उछल पड़ा। मुझे यह कतई विश्वास नहीं था कि मेरी लिखी हुई कविता भी श्रेष्ठतम होगी या चुनाव कमेटी को पसंद आएगी। घोषणा के बाद उस दिन आधी छुट्टी में ही विजयी पदाधिकारियों के उत्सव और जीतने की खुशी में स्कूल की छुट्टी कर दी गई। दूसरे दिन क्लास लगने पर हमारे क्लास टीचर सचदेव सर ने बताया कि सुरेश सिंह बैस की कविता को कमेटी ने अन्य प्रविष्टियों में ज्यादा पसंद किया। इसके लिए कई स्टूडेंट्स की भी कविताएं जमा की गई थी लेकिन सुरेश सिंह बैस की कविता को सबसे उत्तम पाया गया। इसलिए सुरेश सिंह को ही साहित्यिक सचिव पद के लिए फाइनलिस्ट कर लिया गया। 

आपको बता दूं यह पूरा अध्याय मेरे जीवन के लिए बहुत प्रेरणादाई रहा। क्योंकि मैंने कविता लिखने का पहला ही प्रयास किया था, और काफी संकोच एवं भय के साथ लिखा था। हो सकता है शायद इसके बाद मेरी रुचि  कविता कहानियां लिखने की ओर नहीं बढती। पर चूंकि जब जीवन के इस महत्वपूर्ण अवसर पर मेरी कविता को पसंद किया गया और मुझे साहित्यिक सचिव पद पर मनोनीत किए जाने से यह कह सकते हैं कि मेरे साहित्यिक जीवन का जन्म और टर्निंग पॉइंट रहा। बस यही से मैंने लिखने पढ़ने की जो प्रेरणा पाई…वह आज भी जारी है।

अंत में:- यह कैसे हो सकता है कि मेरी वही पहली कविता जिस पर पूरी कहानी आधारित है! उस कविता को आपके समक्ष न पेश करूं। सो वही मेरी पहली लिखी हुई कविता आपके समक्ष प्रस्तुत है – “आकाश का वह एक तारा”

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आकाश का वह एक तारा,
अपनी पहचान बनाने की,
कोशिश कर रहा था।

झिलमिल झिलमिल
अपनी काया को सुंदर,
बनाने की कोशिश कर रहा था।

अंधेरामय था उसका जगत,
उजालामय बनाने की,
कोशिश कर रहा था।

आकाश का वह एक तारा,
अपनी पहचान बनाने की,
कोशिश कर रहा था।

अनगिनत तारों के बीच 
अपने वजूद को जताने 
की कोशिश कर रहा था
हो रहा रहा था प्रभातकाल,
अपने अस्तित्व की रक्षा,
करने की कोशिश कर रहा था।

हो रहा था दिवावसान 
अंधेरे से उजाले में आने की ,
कोशिश कर रहा था।

आकाश का वह एक तारा,
अपनी पहचान बनाने की,
कोशिश कर रहा था। 

आकाश का वह एक तारा, 
अपनी पहचान बनाने की….!! 

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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