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स्कूल एवं शिक्षा के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालती पुस्तक

स्कूल एवं शिक्षा

दक्षिण एशियाई क्षेत्र एवं भारतवर्ष में स्कूल एवं शिक्षा के बदलते स्वरूप पर प्रस्तर शिल्प एवं चित्रों के माध्यम से तथ्यपरक जानकारी देती एक लघु पुस्तिका ‘दक्षिण एशियाई कला में सीखना-सिखाना’ ने मेरा ध्यान खींचा। सीएन सुब्रह्मण्यम लिखित तीन लेखों की यह 68 पृष्ठों की पुस्तक एकलव्य प्रकाशन, भोपाल से जनवरी 2023 में छपी और शिक्षकों एवं शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं के बीच न केवल पढ़ी जा रही है बल्कि लगातार संवाद का माध्यम भी बनी है।

पुस्तक में तीन अध्याय हैं – भरहुत, मथुरा और अजंता : शिक्षण की कुछ छवियां, दूसरा – आचार्य से गुरु, उस्ताद से पीर : भारत में पूर्व-आधुनिकता और शिक्षण का बदलता स्वरूप और तीसरा लेख है- देशज शिक्षा : नई छवियां। अब इन लेखों के माध्यम से भारत की शिक्षा व्यवस्था में हुए बदलाव को समझने की कोशिश करते हैं। पहला लेख स्कूलनुमा संस्थाओं के बारे में चर्चा करते हुए कहता है कि 4000 साल पुराने सुमेरिया के शहरों से गीली मिट्टी की छोटी तख्तियों पर पढ़ना-लिखना सिखाने की सामग्री पुरातात्विक उत्खनन से लोक सम्मुख आई है।

कहा जाता है कि यहां खासतौर से लिपिक तैयार किये जाते थे। शिक्षा सभी के लिए नहीं थी अपितु सामर्थ्यवान और लिपिक बनने की साधना में लीन रहने वालों के लिए ही थी। मध्यप्रदेश के भरहुत से प्राप्त शिला पटल पर उच्चासन विराजित गुरु अपने चार शिष्यों को कुछ समझाने की मुद्रा में हैं पर शिष्य सुनने की बजाय लिखने की मुद्रा में हैं। यह प्रतीत होता है कि यहां आचार्य की प्रधानता है, शिष्य केवल अनुकरण कर रहे हैं।कुषाणकालीन प्राप्त अन्य मूर्ति में छत्रधारी गुरु खड़े होकर दस शिष्यों को आशीर्वाद देते हुए कुछ कंठस्थ करा रहे हैं।

शिष्यों को झपकी न आये इसलिए एक योग पट्ट नामक पट्टी से बैठे हुए शिष्य के पैरों को पीठ से घुमाकर बांध दिया गया है। इस शिल्प के अवलोकन से पता चलता है कि पगड़ीधारी छात्र उच्च कुल या वर्ग से सम्बंधित हैं। अंजता की गुफाओं में भी भगवान बुद्ध को केंद्र मानकर उनके बालपन की शिक्षा के विविध भाव उत्कीर्ण किये गये हैं। अजंता के एक शिल्पांकन में बेहद खूबसूरत शिल्प मिलता है। दस बच्चों वाला यह शिल्प कुछ सवाल उभारता है जो वर्तमान संदर्भों में भी प्रासंगिक हैं। गुरुजी ऊंचे आसन पर बैठे हैं, हाथ में लम्बी छड़ी है।

अब वर्तमान कक्षा का अवलोकन करें तो यह शिल्पांकन हूबहू फिट दिखाई देता है जहां आगे की पंक्ति के बच्चों को छोड़कर शेष आपसी बातचीत में मशगूल होते हैं।

आगे के दो बच्चे पढ़ रहे हैं, तीसरा अन्यमनस्क हो बाहर देख रहा है। दो बच्चे गुरु की नजर बचाकर बाहर खिसकने की ताक में हैं तो एक बच्चा खड़ा होकर कुछ कर रहा है। दो बकरे भी हैं जिनमें दो बच्चे सवारी करने के प्रयास में हैं जिन्हें दो बच्चे खुश होकर देख रहे हैं जिनमें एक अन्य बच्चा बकरे की सवारी करने की अपने बारी की प्रतीक्षा में है। अब वर्तमान कक्षा का अवलोकन करें तो यह शिल्पांकन हूबहू फिट दिखाई देता है जहां आगे की पंक्ति के बच्चों को छोड़कर शेष आपसी बातचीत में मशगूल होते हैं।

कुछ खिड़की से बाहर का नजारा देख रहे होते हैं तो कुछ बच्चे पानी पीने या लघुशंका के बहाने बाहर खिसकने की फिराक में होते हैं। यह चित्र कक्षा की नीरसता, दंड व्यवस्था एवं कक्षा का बाहरी दुनिया के वातावरण से अलगाव की कहानी बयां करता है। कक्षा और बाहरी दुनिया दो विपरीत ध्रुवों पर स्थित हैं और बच्चे दोनों के बीच झूल रहे हैं। यह चित्र बच्चों के ड्राप आउट होने का संकेतक भी है।

लेखक भारतीय शिल्पों एवं चित्रों के साथ ही समकालीन यूनान, मिस्र एवं चीन की शिक्षण छवियों पर भी दृष्टिपात करते हुए कहता है कि यूनान में लगभग 5वीं सदी ईपू तक व्यवस्थित विद्यालयों की स्थापना होती दिखती है लेकिन उनमें केवल संगीत और खेल को प्राथमिकता प्रतीत होती है। पढ़ना लिखना बाद में आया। एक खास शिल्प की चर्चा यहां करना चाहूंगा।

5वीं सदी ईपू के प्राप्त घड़े पर अंकित चित्र में शिक्षक छात्र को कोई वाद्ययंत्र बजाना सिखा रहा है। पास ही खड़ा एक व्यक्ति दास है जो बच्चे को विद्यालय तक लाने वा ले जाने हेतु नियुक्त है किंतु शिक्षण प्रक्रिया पर वह पूरी नजर रख रहा है। ऐसे दासों को वहां पेडागॉग कहा गया ।जिससे पेडागॉजी शब्द निकला है। आगे वह पेडागॉग बच्चे को कंधे पर बिठाये गले में बस्ता लटकाए घर वापस जाता दिखता है।

दूसरे लेख का आरम्भ उत्तर प्रदेश से प्राप्त पालकालीन अग्नि देवता के मूर्ति शिल्प से होता है, जिसके सम्बद्ध फलक पर अन्य छवियां गढ़ी गई हैं। जिसमें करबद्ध प्रणाम की मुद्रा में फलथी मारे बैठे शिष्य को गुरु आशीर्वाद देते हुए सम्बोधित कर रहे हैं। यहां गुरु शिष्य में परस्पर आत्मीयता एवं मधुरता दिखाई देती है। आंध्रप्रदेश के लेपाक्षी मंदिर की प्रस्तर दीवार पर उत्कीर्ण शिल्प शिक्षा के नवल संदर्भ के द्वार खोलता है। आसन पर बैठे आशीष देते गुरु को एक शिष्य बैठ कर दोनों हाथों से चरण स्पर्श कर रहा है।

-शिक्षक एक अलौकिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति के रूप में स्तुत्य है।-

दो छात्र प्रणाम करने की स्थिति में खड़े हैं। एक छात्र प्रणाम करता हुआ अपने पिता के साथ जाने की तेयारी में है। आगे वह छात्र पिता के कंधे पर बैठा दिखाया गया है। इससे पता चलता है कि छात्र को विद्यालय छोड़ने-लाने की जिम्मेदारी परिवार की होती थी। शिक्षक एक अलौकिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति के रूप में स्तुत्य है। कागज पर बने15वीं शताब्दी के एक चित्र में श्रीकृष्ण और बलराम को गुरु सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण करते दिखाया गया है। इसी चित्र में दो छात्र गुरु से दूर स्वाध्याय में रत पाटियों पर कुछ लिख रहे हैं। यह मध्यकाल इतिहास का दौर है।

मस्जिद और मकतब से जुड़े कुछ चित्रों में पढ़ाने के दृश्य अंकित किये गये हैं। इन चित्रों में बालिकाएं भी दिख रही हैं जो बालिका शिक्षा का उस दौर में एक संकेत तो देता ही है। इस लेख की इतनी बात करके मैं आपको अंतिम लेख की ओर लिए चलता हूं जिसमें शिक्षा में दंड एक अनिवार्य घटक के रूप में दिखाई पड़ रहा है। मैसूर के एक चित्र में झोंपड़ी में लग रही कक्षा में दो छात्रों को दंड दिया गया है जो एक पैर से खड़े हो आधा झुककर अध्ययन को विवश हैं। एक अपनी पाटी में कुछ लिख रहा है तो दूसरा जमीन पर अंगुली से। एक अन्य चित्र में शिक्षक छात्रों का काम देख रहे हैं।

एक छात्र जमीन में रेत पर लिख रहा है। एक छात्र पीछे खड़ा होकर सर झुकाये लिख रहा है, शायद उसे पीछे खड़े होने का दंड दिया गया हो या वह स्वयं खड़ा हो। दंड देता एक अन्य चित्रांकन तो क्रूरता की हद पार करता दिखता है जिसमें छात्र के दोनों हाथ को रस्सी से बांध कर छत से बांध लटका दिया गया है और शिक्षक छड़ी से पैरों पर प्रहार कर रहा है। इस तरह से दंडित करना शारीरिक हिंसा तो है ही बल्कि बच्चों को स्कूल से जोड़ने की राह पर एक बड़ी बाधा भी नजर आते हैं।

फलत: बच्चों का विद्यालय से ड्राप आउट होना है। यह दंड बच्चों के अधिगम दक्षता को तो प्रभावित करता ही है साथ ही शिक्षा के प्रति अलगाव भी पैदा करता है। ऐसा ही एक चित्र यूरोप के स्कूल मास्टर का भी है जिसमें शिक्षक एक लम्बी छड़ी से छात्रों के सिरों पर मार रहा है। बंगाल के पटचित्र में एक शानदार शाला का अंकन है। कुछ चित्र मुस्लिम पाठशाला, हिंदू महाजन पाठशाला, ईसाई मिशनरी पाठशाला के भी हैं जो तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा के बदलाव को व्यक्त करते हैं। कुछ पाठशालाओं में कबड्डी, कुश्ती, तलवारबाजी और दैहिक लचकता के व्यायाम कराये जा रहे हैं।


निश्चित रूप से कहा जा सकता है प्रस्तुत लघु पुस्तक शिक्षकों, शिक्षाकर्मियों, शैक्षिक शोध अध्येताओं और शिक्षा पर रुचि रखने वाले आमजन के लिए देश में हुए शिक्षा के बदलाव की एक झांकी दिखाती है। कमोबेश, उक्त शिल्प और चित्र वर्तमान शिक्षा के वितान को समझने का एक आधार देते हैं। कागज मोटा है और आवरण पर एक मकतब का आकर्षक चित्र दिया गया है।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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