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कोडाइकनाल वेधशाला के 100 वर्षों के आंकड़ों से सौर चक्र पर नई वैज्ञानिक समझ

सूर्य केवल पृथ्वी को प्रकाश और ऊर्जा देने वाला खगोलीय पिंड भर नहीं है, बल्कि वह एक अत्यंत जटिल, गतिशील और निरंतर परिवर्तित होने वाली प्रयोगशाला भी है। उसकी सतह पर होने वाली गतिविधियां पृथ्वी के वातावरण, संचार प्रणालियों, उपग्रहों और अंतरिक्ष मौसम तक को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक दशकों से सूर्य की गतिविधियों को समझने के प्रयास में लगे हुए हैं। अब भारत के वैज्ञानिकों ने सूर्य के 11-वर्षीय गतिविधि चक्र को लेकर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, जिसने सौर भौतिकी के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए नवीनतम अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि सूर्य की सतह पर मौजूद विशाल संवहन संरचनाएं, जिन्हें सुपरग्रेन्युलर नेटवर्क कहा जाता है, सौर गतिविधि चक्र से गहरे रूप में जुड़ी हुई हैं। यह शोध भारत की ऐतिहासिक कोडाइकनाल सौर वेधशाला से प्राप्त 100 वर्षों से अधिक पुराने आंकड़ों पर आधारित है। यह विश्व के सबसे लंबे समय तक निरंतर संकलित किए गए सौर आंकड़ों में से एक है।

सूर्य के भीतर ऊर्जा का निर्माण उसके केंद्र में होने वाली नाभिकीय संलयन प्रक्रियाओं से होता है। यह ऊर्जा सूर्य की बाहरी परतों तक संवहन प्रक्रिया द्वारा पहुंचती है। इस प्रक्रिया की तुलना चूल्हे पर उबलते पानी से की जा सकती है, जिसमें गर्म पदार्थ ऊपर उठता है और ठंडा पदार्थ नीचे चला जाता है। इसी संवहन के कारण सूर्य की सतह पर छोटे-बड़े कोशिकीय ढांचे बनते हैं। बड़े पैमाने की इन्हीं संरचनाओं को सुपरग्रेन्युलेशन कहा जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इन नेटवर्क कोशिकाओं का औसत जीवनकाल लगभग 24 घंटे होता है तथा इनका आकार लगभग 30 हजार किलोमीटर तक होता है। इनके बीच मौजूद अपेक्षाकृत ठंडी सीमाओं की चौड़ाई लगभग 6000 किलोमीटर होती है। लंबे समय से वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास कर रहे थे कि इन संरचनाओं की उत्पत्ति कैसे होती है, उनका आकार किन कारणों से निर्धारित होता है तथा उनका 11-वर्षीय सौर चक्र से क्या संबंध है। भारतीय वैज्ञानिकों का यह नया अध्ययन इन्हीं प्रश्नों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।

कोडाइकनाल वेधशाला से प्राप्त ‘सीए-II के’ स्पेक्ट्रोहेलियोग्राम छवियों के माध्यम से वैज्ञानिकों ने सूर्य की सतह पर बनने वाले नेटवर्क की चौड़ाई और तीव्रता का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में वर्ष 1907 से लेकर लगभग 1990 तक की 34 हजार से अधिक सौर छवियों का उपयोग किया गया। इन आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं ने विभिन्न अक्षांशों पर सौर धब्बों की संख्या और नेटवर्क संरचनाओं के बीच संबंधों का अध्ययन किया।

अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि सूर्य के कुछ विशेष अक्षांश सौर गतिविधि चक्र का अधिक निकटता से अनुसरण करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि नेटवर्क लेन की चौड़ाई और उसकी तीव्रता, दोनों का संबंध सौर धब्बों की संख्या से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। यह संबंध विशेष रूप से लगभग ±11 से ±22 डिग्री अक्षांश के बीच सबसे अधिक मजबूत पाया गया। लेन की चौड़ाई का अधिकतम सहसंबंध उत्तरी गोलार्ध में लगभग 18 डिग्री और दक्षिणी गोलार्ध में लगभग 20 डिग्री अक्षांश पर देखा गया, जबकि तीव्रता का चरम सहसंबंध लगभग 13 से 14 डिग्री अक्षांश पर मिला।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सौर गतिविधि और इन संरचनाओं की प्रतिक्रियाओं के बीच समय का अंतर मौजूद है। नेटवर्क लेन की चौड़ाई सौर अधिकतम के समय अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचती है, जबकि उसकी तीव्रता लगभग डेढ़ वर्ष बाद चरम पर पहुंचती है। इससे संकेत मिलता है कि सूर्य की सतह पर मौजूद विभिन्न भौतिक प्रक्रियाएं अलग-अलग समय पर प्रतिक्रिया करती हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि जैसे-जैसे अक्षांश बदलते हैं, वैसे-वैसे इन प्रतिक्रियाओं में समय का अंतर भी बदलता है। ±20 डिग्री के आसपास यह अंतर लगभग शून्य रहता है, जबकि भूमध्य रेखा या उच्च अक्षांशों की ओर बढ़ने पर इसमें परिवर्तन दिखाई देता है। लेन की चौड़ाई के मामले में यह समय अंतर लगभग 0.5 से 0.8 वर्ष तक पाया गया, जबकि तीव्रता के मामले में यह अंतर 0.3 वर्ष से लेकर लगभग 2.5 वर्ष तक पहुंच गया। यह तथ्य दर्शाता है कि सूर्य की सतह पर ऊर्जा और चुंबकीय प्रवाह का परिवहन अत्यंत जटिल प्रक्रिया है।

इस शोध के प्रमुख वैज्ञानिक प्रो. के.पी. राजू के अनुसार सुपरग्रेन्युलर गुणधर्म स्थानीय चुंबकीय प्रवाह और सौर गतिविधि के स्तर से प्रभावित होते हैं। उनका कहना है कि इन सहसंबंधों को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सौर विकिरण, विशेष रूप से पराबैंगनी विकिरण में होने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। यह जानकारी भविष्य में अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी और पृथ्वी पर उसके प्रभावों को समझने में सहायक हो सकती है।

सौर गतिविधियां सीधे तौर पर पृथ्वी की तकनीकी संरचनाओं को प्रभावित करती हैं। तीव्र सौर तूफान उपग्रह संचार, जीपीएस प्रणाली, विद्युत ग्रिड और रेडियो संचार को बाधित कर सकते हैं। ऐसे में यदि वैज्ञानिक सौर चक्र की गतिविधियों और उनके समय को बेहतर ढंग से समझने में सफल होते हैं, तो भविष्य में संभावित अंतरिक्षीय खतरों के प्रति पहले से चेतावनी दी जा सकेगी।

कोडाइकनाल सौर वेधशाला की ऐतिहासिक भूमिका भी इस शोध के कारण एक बार फिर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के केंद्र में आ गई है। तमिलनाडु स्थित यह वेधशाला पिछले एक शताब्दी से अधिक समय से सूर्य का नियमित अवलोकन कर रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां एक ही प्रकार के उपकरणों के माध्यम से निरंतर आंकड़े संकलित किए गए, जिससे लंबे समय तक सौर गतिविधियों के तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके। यही कारण है कि इस वेधशाला के अभिलेख आज वैश्विक सौर अनुसंधान के लिए अत्यंत मूल्यवान माने जाते हैं।

अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया कि कोई एकल अक्षांश ऐसा नहीं है जो सभी प्रकार की सौर गतिविधियों का पूर्ण रूप से अनुसरण करता हो। विभिन्न भौतिक मात्राओं के लिए अलग-अलग अक्षांशों पर अधिकतम सहसंबंध दिखाई देता है। इससे यह संकेत मिलता है कि सूर्य की सतह पर कार्य कर रही प्रक्रियाएं बहुस्तरीय और अत्यंत जटिल हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में और अधिक उच्च-रिजॉल्यूशन अवलोकनों तथा नई पीढ़ी की सौर दूरबीनों के माध्यम से इन प्रक्रियाओं को और बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। विशेष रूप से भारत में विकसित की जा रही राष्ट्रीय बड़ी सौर दूरबीन (एनएलएसटी) सुपरग्रेन्युलर गतिकी और चुंबकीय प्रवाह परिवहन के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

यह अध्ययन केवल सौर भौतिकी तक सीमित उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि भारत दीर्घकालिक वैज्ञानिक आंकड़ों के संरक्षण और उनके आधुनिक विश्लेषण के माध्यम से विश्व स्तरीय शोध करने की क्षमता रखता है। कोडाइकनाल वेधशाला के सौ वर्षों के अभिलेखों ने यह सिद्ध कर दिया है कि वैज्ञानिक धैर्य और निरंतरता भविष्य के बड़े रहस्यों को उजागर करने की सबसे मजबूत नींव होते हैं।

सूर्य को समझना केवल खगोल विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि न केवल देश के वैज्ञानिक गौरव को बढ़ाती है, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान में भारत की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करती है।

प्रकाशन लिंक: https://ui.adsabs.harvard.edu/abs/2025ApJ…991L..26R/abstract

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