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खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर भारत अन्न सुरक्षा से समृद्धि तक का भारतीय सफर

7 जून : वैश्विक खाद्य सुरक्षा दिवस पर विशेष

भारत को प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा है। यहाँ की सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि ही रही है। भारतीय किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवनरेखा हैं। किंतु एक समय ऐसा भी था जब यही भारत खाद्यान्नों के लिए दूसरे देशों की सहायता और दया पर निर्भर था। देश में अकाल, सूखा, सीमित उत्पादन, पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ तथा बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न संकट गंभीर रूप धारण कर चुका था।

स्वतंत्रता के बाद भारत को सबसे बड़ी चुनौती यदि किसी क्षेत्र में मिली, तो वह थी—“हर पेट तक भोजन पहुँचाना।” उस समय देश में न पर्याप्त सिंचाई व्यवस्था थी, न उन्नत बीज, न वैज्ञानिक तकनीक और न ही कृषि के आधुनिक संसाधन। परिणामस्वरूप किसानों की मेहनत के बावजूद उत्पादन सीमित था और देश को विदेशी सहायता के रूप में गेहूँ तक आयात करना पड़ता था।

आज का भारत उस दौर से बहुत आगे निकल चुका है। कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक उपकरणों, सिंचाई परियोजनाओं तथा किसानों की अथक मेहनत ने देश को खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में विश्व की अग्रणी शक्तियों में ला खड़ा किया है। आज भारत न केवल अपनी विशाल जनसंख्या का पेट भरने में सक्षम है, बल्कि अनेक खाद्यान्नों का निर्यात भी कर रहा है। यही आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक तस्वीर है।

इस विषय पर समाजशास्त्रियों एवं अर्थशास्त्रियों के भिन्न-भिन्न मत रहे हैं। कुछ लोगों का मत है कि उत्पादन तो बढ़ा है, किंतु जनसंख्या भी उसी अनुपात में बढ़ गई है, इसलिए वास्तविक उपलब्धि उतनी प्रभावशाली नहीं कही जा सकती। जबकि दूसरा मत यह कहता है कि बढ़ती जनसंख्या के साथ श्रमशक्ति भी बढ़ी है। अधिक हाथों ने अधिक उत्पादन की संभावनाएँ पैदा की हैं। सीमित क्षेत्र और सीमित उत्पादन वाला भारत अब विशाल कृषि क्षमता वाला राष्ट्र बन चुका है। 

वस्तुतः दूसरा मत वास्तविकता के अधिक निकट प्रतीत होता है। यदि हम अतीत पर दृष्टि डालें तो स्थिति की गंभीरता का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। सन् 1973 में प्रकाशित एक पुरानी पत्रिका में सरकार का विज्ञापन प्रकाशित हुआ था—

“कम अनाज खाइए, सप्ताह में कम से कम एक दिन बिना अनाज का भोजन कीजिए।”

यह विज्ञापन उस दौर की खाद्यान्न कमी और राष्ट्रीय चिंता का प्रमाण था। आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। अब सरकार को ऐसे विज्ञापन जारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह परिवर्तन भारतीय कृषि, किसान और वैज्ञानिक प्रगति की ऐतिहासिक सफलता का प्रमाण है।

आज भारत विश्व में चाय उत्पादन में प्रथम, चावल उत्पादन में द्वितीय, गेहूँ उत्पादन में अग्रणी देशों में तथा चीनी एवं कपास उत्पादन में शीर्ष स्थानों पर है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मध्यप्रदेश आज देश में सोयाबीन उत्पादन का सबसे बड़ा राज्य बन चुका है। गेहूँ, चना, ज्वार और दालों के उत्पादन में भी उसने उल्लेखनीय प्रगति की है। वहीं पंजाब और हरियाणा ने प्रति हेक्टेयर उत्पादन में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। यदि छत्तीसगढ़ की बात करें तो यह प्रदेश धान उत्पादन के लिए पूरे देश में अपनी विशेष पहचान रखता है। “धान का कटोरा” कहलाने वाला छत्तीसगढ़ कृषि और खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रदेश है। यहाँ खरीफ एवं रबी दोनों प्रकार की फसलों का व्यापक उत्पादन होता है। धान, गेहूँ, दलहन, तिलहन, मक्का और अन्य फसलें प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाती हैं।

खाद्यान्न सुरक्षा केवल खेती तक सीमित नहीं है। इसमें पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन तथा कुक्कुट पालन की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। पशुधन किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के साथ-साथ पोषण सुरक्षा भी प्रदान करता है। दूध, अंडा, मछली और अन्य प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ आज खाद्य सुरक्षा के प्रमुख आधार बन चुके हैं। भारत में डेयरी क्रांति ने जिस प्रकार दूध उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्रदान की, उसी प्रकार मत्स्य उत्पादन और पशुपालन ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। आज भारत विश्व के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल है।

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पर केवल उत्पादन बढ़ा लेना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती खाद्यान्नों के सुरक्षित भंडारण, उचित वितरण और संरक्षण की है। आज भी देश में लाखों टन अनाज गोदामों के अभाव में खराब हो जाता है। कई बार खुले आसमान के नीचे रखा गया अनाज वर्षा और नमी के कारण नष्ट हो जाता है। यह स्थिति चिंता का विषय है।

आवश्यकता इस बात की है कि देशभर में आधुनिक शीतगृह, वैज्ञानिक गोदाम तथा सुरक्षित भंडारण केंद्र स्थापित किए जाएँ। खाद्यान्न उत्पादन जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका संरक्षण भी है। यदि उत्पादित अन्न सुरक्षित नहीं रहेगा तो आत्मनिर्भरता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

इसके साथ ही कृषि में नई तकनीकों, जैविक खेती, जल संरक्षण, ड्रिप सिंचाई, प्राकृतिक खेती और मृदा स्वास्थ्य सुधार जैसे उपायों को व्यापक रूप से अपनाना होगा। जलवायु परिवर्तन आज कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। असमय वर्षा, सूखा, बाढ़ और तापमान वृद्धि उत्पादन को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियाँ भविष्य की आवश्यकता हैं।

भारत सरकार द्वारा किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाएँ—जैसे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, ई-नाम, सिंचाई योजनाएँ तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य—कृषि क्षेत्र को मजबूत आधार प्रदान कर रही हैं। डिजिटल तकनीक और कृषि अनुसंधान भी किसानों की नई ताकत बनते जा रहे हैं।विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि खाद्य सुरक्षा केवल अन्न उत्पादन का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक स्थिरता का आधार है। जब तक देश का प्रत्येक नागरिक पौष्टिक भोजन प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक विकास अधूरा रहेगा।

आज भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कर ली हैं, किंतु आत्मसंतुष्टि का समय अभी नहीं आया है। बढ़ती जनसंख्या, बदलती जलवायु, सीमित कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए हमें और अधिक सजग होना होगा। आवश्यकता इस बात की है कि किसान समृद्ध हों, कृषि लाभकारी बने, अन्न सुरक्षित रहे और देश का कोई भी नागरिक भूखा न सोए। यही सच्चे अर्थों में खाद्य सुरक्षा होगी और यही “आत्मनिर्भर भारत” की सबसे बड़ी पहचान बनेगी।

अंततः यही कहा जा सकता है कि- “अन्न केवल भोजन नहीं, राष्ट्र की शक्ति, समृद्धि और अस्तित्व का आधार है।”भारत ने आत्मनिर्भरता की दिशा में लंबी यात्रा तय की है, अब आवश्यकता इस उपलब्धि को स्थायी, सुरक्षित और सर्वसमावेशी बनाने की है।

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