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चंद्रशेखर आजाद : जिनके नाम से थरथर कांपते थे अंग्रेज 

-23 जुलाई चंद्र शेखर आजाद जयंती पर विशेष-

“आजाद” नाम एक ऐसा नाम हैं, जो भारत की वीरता एवं बलिदान का प्रतीक बन गया है। हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना का अजेय सेनानी अमर शहीद चन्द्रशेखर का ही उपनाम है “आज़ाद” !

देश की गुलामी के बेड़ियों तोड़ने का संकल्प लेते हुये ही उन्होंने प्रतिकात्मक नाम “आजाद ” अपने साथ जोड़ लिया था। आजाद’ का जन्म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भांवरा ग्राम में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। उस समय भांवरा अलीराजपर रियासत की एक तहसील थी।

आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी संवत् 1956 के आकाल के समय अपने निवास  उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका ग्राम को छोड़कर पहले अलीराजपुर राज्य में रहे और फिर भावरा में बस गये। भावरा में उन्होनें भैंसे पालकर दूध का व्यापार किया पर बीमारी से भैंसे मर जाने के कारण उन्हें सरकारी दूध का व्यापार करना पड़ा।

एवं उन्हें सरकारी बगीचे में चौकीदार का काम भी करना पड़ा। पहले पांच रूपए मासिक पर नियुक्त हुई थी, फिर वृद्धि होते होते वेतन की अंतिम सीमा आठ रुपए मासिक तक जा पहुंची थी।

नौकरी आदि जम जाने के बाद पंडित जी को अपने परिवार की याद आई. फिर उन्होनें अपनी पत्नी श्रीमति जगरानी देवी को बदरका से भावरा ले आये। उस समय उनका ज्येष्ठ पुत्र सुखदेव भी साथ,था जिसका जन्म बदरका में ही हुआ था। भावरा बस जाने के पश्चात् तिवारी जी को एक कन्या रत्न प्राप्त हुई पर वह जीवित न रह सकी। पांचवी और अंतिम संतान के रुप मे भावरा मे ही चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ। इसके कुछ समय बाद ही बड़े लड़के सुखदेव का भावरा में देहावसान हो गया। मृत्यु के पूर्व सुखदेव को जीवन यापन के लिए पोस्टमैन का कार्य करना पड़ा था।

सुखदेव की मृत्यु के पश्चात चंद्रशेखर आजाद ही पंडित सीताराम तिवारी की एक मात्र संतान के रुप में रह गये। सीतारामजी ने तीन विवाह किये थे। उनकी पहली पत्नी जिला उन्नाव के मोरावां ग्राम की थी। इनसे तिवारीजी को एक पुत्ररत्न भी प्राप्त हुआ, पर उसकी मृत्यु हो गई। सीताराम जी ने प्रथम पत्नी के रहते हुये भी दूसरा विवाह किया, और वह भी जिद पर । तिवारी की पत्नी अपने मायके गई थी । तिवारी जी उन्हें लेने पहुंच गये साले साहब ने बहन को भेजने से इंकार कर दिया।

तिवारी जी ने अपनी पत्नी को चलने को कहा पर वे भाई की इच्छा के विरुद्ध लोक लज्जा के भय से जाने के लिए सहमत नहीं हुई। तिवारी जी कुछ क्रोधी और हठी स्वभाव के थे, वे अपनी पत्नी को लेने फिर नहीं गये और उन्होंने अपना दूसरा विवाह किया। परंतु जब थोड़े दिनों पश्चात् उनकी दूसरी पत्नी का स्वर्गवास हो गया तब उन्होने अपन तीसरा विवाह उन्नाव जिले के ही चंद्रभनखेश ग्राम में श्री पाण्डे भट्टाचार्य जी के यहां किया। पंडित जी की तीसरी पत्नी का नाम जगरानी देवी था। चंद्रशेखर आज इन्हीं के पुत्र थे।

बिन पद चलै सुने बिन काना कर बिन करे विधिनाना।।

उक्त पंक्ति के चंद्रशेखर आजाद ने अक्षरशः सत्य (चरितार्थ) कर दिखाया था। आजाद सचमुच बिना पैरों के घण्टों चला करते थे, अपने गांव का घर देख आते थे। जब आजाद को पैर मिले तो वे चलते नहीं थे, वरन दोड़ते थे और जब दौड़ते योग्य हुये तो दोडते नहीं थे, वरन उड़ते थे। बचपन में चंद्रशेखर आज़ाद भांवरा गांव के बालकों के कमांडर इन चीफ थे। अदिवासी भीलों के बालकों के साथ वे दिन दिन भर घर से गायब रहते और भीलों के बालकों के साथ वे बगीचों वनों में उपद्रव किया करते थे।

गांव में या आसपास के गांवों में कहीं भी कोई उजाड़ बिगाड़ हो तो वह बिना पूछे आजाद के नाम लिख लिया जाता था। कभी कभी पिता पुत्र में ही ठन जाती थी। आजाद के पिताजी सरकारी बगीचे का फल भी किसी को नहीं तोड़ने देते थे। आजाद बिना फल खाये कैसे मानते।

अपने उपट्टवी लेफ्टिनेट साथ मे लिये वह कभी कभी अंधेरे उजाले बगीचे में सेंध लगाते और पके पके अमरूद खाते और साथियों को खिलाते। पकड़े तो कभी जाते ही नहीं थे, एक बार एक बड़ा अमरूद खाते हुये पिताजी ने देख बड़ी मार भी इसलिए लगाई थी कि उतने बड़े अमरुद सरकारी बगीचे के अतिरिक्त कहीं होते ही नहीं थे। 

आजाद को शिकार का शौक बचपन से ही था। आजाद क्रांतिकारी जीवन में अपने साथियों से कहा करते थे कि बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था। आजाद झूठ बोलना या गप्प लड़ाना जानते ही नहीं थे। भीतर और बाहर जो था, एक सा था। आरेका के जंगल में एक बार अज्ञातवास के समय साधु वेश मे उन्हें पुलिस वालों ने पकड़ कर पूछा था कि तुम्हीं आजाद हो तो आज़ाद ने बिना झूठ बोले कह दिया था”हां भइया, हम आजाद नहीं तो क्या हैं?

सभी साधु आज़ाद होते हैं, हम भी आजाद हैं। हम किसी के हाथ के गुलाम थोड़े ही हैं। हनुमान जी की चाकरी करते हैं और आजाद रहते हैं।” पुलिस वाले साधू महाराज को छोड़कर चले गये । 

आजाद का निशाना एकदम अचूक था. लौग को भी वो गोली से उड़ा देते थे एक ओरछा, ठिमपुर और खनियाधाने के ठाकुरों के साथ कई बार उनकी नोंक झोंक हो जाती थी, पर निशाने बाज़ी में उन्हें कभी लज्जित नहीं होना पड़ा। एक बार वन विभाग के कुछ अधिकारी गण औरका के जंगलो में सुअरों(जंगली) के शिकार के लिए जा रहे थे कि लंगोटी बांधे हुये हस्ट पुस्ट एक साधु आया और कहने लगा कि.. हमको भी शिकार में साथ लेते चलिये। तब उस टोली ने कहा कि आप जाकर क्या करेगें। तब साधु ने कहा कि “अगर आप एक बंदूक दे दें तो हम भी अपने भाग्य को अजमा देखें।

यह सुनकर टोली ने मजाक में ही उन्हें बंदूक दे दी और साथ ले लिया। शिकार के समय सभी अलग अलग जगहों पर जाकर बैठे गये और दिल्लगी के लिए साधुजी को सबसे दूर बैठा दिया। तभी एक मजबूत जंगली सुअर उधर से निकला। उस पर सभी ने पच्चीस गोलियां चलाई थी, पर वो सभी को छकाते हुए भाग निकला, इतने में साधुजी ने अपने एक ही गोली से उस भागते हुये सुअर को ढेरकर दिया।

यह और कोई नहीं चंद्रशेखर आजाद ही थे, जो छद्रमवेश में अंग्रेजों से बचने के लिए अपनी गतिविधियां चला रहे थे। आजाद गाना नहीं जानते थे, पर गाना सुनने का उन्हें बहुत शौक था, इश्किया गजल या शायरी से उन्हें चिढ थी, देशभक्ति के गीत सुनना पसंद करते थे उनका प्रिय गीत था:

मां.. हमें विदा दो,

जाते हैं हम,

विजय केतु फहराने आज 

तेरी बलि वेदी पर चढ़कर

मां निज शीश कटाने आज।।

काकोरी में ट्रेन डकैती के पश्चात एक दिन आजाद को अपनी माताजी से मिल आने की इच्छा प्रवल हुई, साथी मुलका पुरका को साथ लिया और भावरा जा पहुंचे। माता पिता के साथ रहे। एकाएक उन्हें संदेह हुआ कि पुलिस की हलचल बढ़ रही है। आजाद एक पहाड़ी पर बने मंदिर के एक खंडहर में जा छिपे।वे काफी जागे हुये थे, इसलिए सो गये।

बेफिक इसलिए थे ‘कि मलकापुर पहरा दे रहे थे। तभी वे उछलकर “एक ओर हो गये और आजाद को सांप होने के खतरे की चेतावनी दी, पर आजाद “है तो होने दो” का भाव व्यक्त करते करवट बदल कर सो गये। इतने बड़े खतरे के समय भी इतनी बेफिक्री यह उन्हीं की ‘ विशेषता थी। आजाद उन मसीहाओं में से एक थे जो बार बार इस धरती पर नहीं आते हैं और जब आते हैं तो संसार को कुछ. अनोखी देन देकर जाते हैं। शायद निम्न पंक्ति भी ऐसी शक्सियत की शहादत पर अपने आपको गौरान्वित महसूस करती होगी। 

शहीदों की चिताओं पर,

जुड़ेगे हर बरस मेले, 

वतन पर मिटने वालों का,

 यही बाकी निशां होगा…..।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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