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मास्टर दा सूर्यसेन : चटगांव विद्रोह का महानायक

“मौत मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रही है। मेरा मन अनंत काल की ओर उड़ रहा है। ऐसे सुखद समय पर, ऐसे गंभीर क्षण में, मैं तुम सबके लिए क्या छोड़ जाऊंगा? केवल एक चीज, यह मेरा सपना है। एक सुनहरा सपना, स्वतंत्र भारत का सपना। कभी भी 18 अप्रैल, 1930 चटगांव के विद्रोह के दिन को मत भूलना। प्रिय मित्रो ! आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत खींचना। उठो और कभी निराश मत होना। सफलता अवश्य मिलेगी।”

उपर्युक्त ओजमय पंक्तियां बंगाल के चटगांव विद्रोह के महानायक मास्टर सूर्य सेन द्वारा फांसी से एक दिन पूर्व अपने क्रांतिकारी साथियों के नाम लिखे अंतिम पत्र से उद्धृत की गई हैं। आपको मास्टर सूर्य सेन के बारे में यह जानकर आश्चर्य होगा कि अंग्रेजी सत्ता द्वारा इस महान क्रांतिकारी के साथ फांसी के पूर्व क्रूरतम अमानवीय व्यवहार किया गया था। लाठी-डंडों से ने केवल पिटाई की गई बल्कि हाथ पैरों के नाखून उखाड़ दिये गये। शरीर की संधियों को तोड़ा गया और बेहोशी की हालत में सूर्यसेन को घसीटते हुए फांसी के तख्त पर ले जाया गया। फांसी पर चढ़ाने से पहले ब्रिटिश सत्ता के क्रूर जल्लादों ने हथौड़े से उनके दांत भी तोड़ दिए ताकि हुए भारत मां का यह सपूत अपनी अंतिम यात्रा पर प्रस्थान से पूर्व मां भारती का जयघोष ‘वंदेमातरम्’ भी न बोल सके। अंग्रेजी सत्ता मास्टर सूर्यसेन से इतना भयाक्रांत थी कि फांसी बाद परिजनों को शव तक न सौंपा, क्योंकि उसे डर था कि क्रांतिकारी की शवयात्रा में देश उमड़ पड़ेगा और अंग्रेजों के विरुद्ध समाज में एक नवीन राष्ट्रीय चेतना और उत्साह का संचार हो जायेगा और सूर्यसेन की धधकती चिता की अग्नि से हजारों युवक-युवतियां प्रेरणा ग्रहण कर क्रांतिपथ का अनुगमन करेंगी।‌ अतः अधिकारियों ने सूर्यसेन के शव को लोहे के संदूक में बंद कर गुपचुप तरीके से बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया। लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि मास्टर सूर्यसेन के अप्रतिम बलिदान और देशभक्ति से नवल पीढ़ी सर्वथा अपरिचित है।  

सूर्यसेन का जन्म बंगाल प्रेसीडेंसी अंतर्गत चटगांव के नोआपारा में 12 मार्च, 1894 को हुआ था जो अब बांग्लादेश में है। शिक्षक पिता और गृहिणी मां की स्नेहिल छांव से बचपन में ही वंचित हो जाना पड़ा। प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय प्राथमिक विद्यालय और नोआपारा हायर सेकेण्डरी इंग्लिश स्कूल से पूरी कर स्नातक हेतु मुर्शिदाबाद के बहरामपुर कालेज में प्रवेश लिया। 12वीं के दौरान ही एक शिक्षक के माध्यम से अरविंद घोष की संस्था अनुशीलन समिति से सूर्यसेन का सम्पर्क बन गया था और देश की तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों से परिचित हुए। स्नातक करते हुए आप युगांतर संस्था के विचारों से प्रभावित होकर उसके सदस्य बन गये और देश के अन्यान्य क्षेत्रों के क्रांतिकारियों से परिचय हुआ।

1918 में स्नातक पूरा कर आप घर वापस आ गये और एक विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य करना आरंभ किया। उसी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चटगांव जिला इकाई के अध्यक्ष के रूप में काम करना आरंभ किया। यही वह दौर था जब 1915 में महात्मा गांधी भारत आकर कांग्रेस में सक्रिय हुए थे और अहिंसा के द्वारा आजादी प्राप्त करने हेतु काम शुरू किये थे। कांग्रेस में गरम और नरम विचारधारा की दो अंतर्धारा प्रवाहित थी। मास्टर सूर्यसेन अहिंसा के समर्थक न थे। वे सशस्त्र क्रांति के उपासक थे और अपने स्पष्ट उग्र विचारों के लिए चटगांव में विख्यात थे।

1 अगस्त,1920 को महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में कांग्रेस द्वारा देश भर में असहयोग आंदोलन शुरू किय गया। चटगांव में मास्टर सूर्यसेन के तेजस्वी नेतृत्व में आंदोलन उफान पर था। आंदोलन की धार कुंद करने के लिए पुलिस ने सूर्यसेन को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। बाद में छोड़ दिये गये। इधर मास्टर सूर्यसेन के मन-मस्तिष्क में कुछ नया करने का विचार अंगड़ाई लेने लगा था, जिसका आधार था आयरलैंड द्वारा अपनी आजादी के लिए 1916 में किया गया प्रेरक सशस्त्र संघर्ष जिसे इतिहास में ‘ईस्टर राइजिंग’ नाम से जाना जाता है।

तो जेल से छूटने के बाद अस्त्र-शस्त्र संग्रह हेतु धन संचय क दृष्टि से 23 दिसम्बर, 1923 को असम एवं बंगाल रेलवे के कोषागार को लूटा पर अपेक्षित अर्थप्राप्ति न हो सकी और मास्टर सूर्यसेन पुलिस की नजर में भी आ गये। पुलिस के गुप्तचर पीछे लग गये और सूर्यसेन की प्रत्येक गतिविधि पर कड़ी नजर रखने लगे। 1926 में सूर्यसेन को अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध जनमानस को भड़काने और सरकार को उखाड़ फेंकने के आरोप में कैद कर लिया गया। 1928 में रिहा हुए। पर देश की स्वतंत्रता हेतु अब सशस्त्र क्रांति का ही एकमात्र रास्ता समझ निर्मल सेन और अम्बिका चक्रवर्ती के साथ मिलकर इंडियन  रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की। नवयुवकों को अपने दल में भर्ती कर दौड़-कूद के साथ दण्ड प्रहार करना, तैराकी, पेड़ पर चढ़ना, मुक्केबाजी, चाकू चलाना और घुड़सवारी का प्रशिक्षण देना आरंभ किया। कुछ महीनों के प्रशिक्षण से एक समर्पित एवं अनुशासित सैनिक दल तैयार हो गया।

     अंततः वह दिन आ गया। 18 अप्रैल, 1930 को चटगांव में मास्टर सूर्यसेन ने 65 क्रांतिकारियों को तीन छोटे समूहों में बांटकर शस्त्रागार पर हमला कर बंदूकें एवं गोला-बारूद लूटने की योजना साझा की। तीनों दलों को अलग-अलग काम सौंपे गये। अर्धरात्रि को हमला बोला गया, दो शस्त्रागार लूट लिए गये लेकिन दुर्भाग्यवश बंदूकें तो मिलीं पर गोलियां नहीं। दूसरे दल ने टेलीग्राफ एवं टेलीफोन की संचार व्यवस्था ध्वस्त कर दी और तीसरे दल ने रेल पटरियां उखाड़ कर चटगांव का कलकत्ता से सम्पर्क तोड़ दिया। यूरोपियन क्लब में धावा बोलकर अंग्रेज अधिकारियों को बंधक बना लिया गया। तब सभी क्रांतिकारियों ने परिसर में मार्च पास्ट किया। मास्टर सूर्यसेन ने चटगांव को स्वतंत्र घोषित कर ध्वज फहराया और परेड की सैन्य सलामी ली। अस्थाई सरकार की घोषणा भी की गई। इस अवसर पर क्रांतिकारियों ने दो पर्चे फेंके।

पहले में देशद्रोह के कानूनों को तोड़ने और चटगांव की स्वतंत्रता की घोषणा थी तथा दूसरे में आजादी के आंदोलन में युवकों के भाग लेने का आह्वान था। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में इस घटना को चटगांव विद्रोह या चटगांव शस्त्रागार लूट नाम दिया गया। अगले दिन से ही क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू हुई। मास्टर दा ने सभी क्रांतिकारियों को छोटे-छोटे समूह बना बिखर जाने का आदेश दिया और स्वयं भी वेश बदलकर छिपते रहे। मास्टर दा को पकड़वाने या सूचना देने वाले को दस हजार रुपए का ईनाम देने के इश्तहार दीवारों पर चिपका दिये गये।

एक दिन सूर्यसेन अपने मित्र नेत्रसेन के घर पर रुके थे। ईनाम के लालच में नेत्रसेन ने पुलिस को सूचना दे दी और 16 फरवरी, 1933 को उसके घर से मास्टर दा सूर्यसेन को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पर दस हजार पाने के पहले ही एक क्रांतिकारी ने नेत्रसेन का गला चाकू से अलग कर गद्दारी की सजा दे दी। इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के कुछ अन्य क्रांतिकारी भी पकड़े गये। मुकदमा चला। कुछ को काला पानी और सूर्यसेन तथा तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी की सजा सुनाई गई। 12 जनवरी, 1934 को बेहोशी की हालत में मास्टर दा सूर्यसेन को फांसी पर चढ़ा दिया और तारकेश्वर दस्तीदार को भी। अल्पकाल के लिए भारत के गगनांचल में उगा सूर्य अस्त हो गया पर अपनी ऊर्जस्वित किरणों के द्वारा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध सम्पूर्ण देश में नवल चेतना, अदम्य साहस एवं सत्साहस का संचार कर गया।

भारत सरकार ने मास्टर दा की स्मृति को श्रद्धा निवेदित कर 1978 में 25 पैसे का एक डाक टिकट जारी किया। कलकत्ता उच्च न्यायालय के सम्मुख आदमकद प्रतिमा स्थापित की।‌बांग्लादेश ने चटगांव विश्वविद्यालय के एक सभागार का नाम मास्टर दा सूर्यसेन हॉल रखा और फांसी स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया। आज आजादी के अमृत काल में मास्टर दा सूर्यसेन को स्मरण करते हुए हम भारतवासी नमन करते हैं। लेखक स्वतंत्रता आंदोलन के अध्येता हैं।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
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