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खुदकुशी का बढ़ता दायरा एवं विकृत होती संवेदनाएं

सभ्य समाज में आत्महत्या या छोटी-छोटी बातों पर हत्या कर देने की घटनाओं का बढ़ना गहन चिन्ता का विषय है। आत्महत्या एवं हत्या की खबरें तथाकथित समाज विकास की विडम्बनापूर्ण एवं त्रासद तस्वीर को बयां करती है। इस तरह आत्महत्या एवं हत्या करना जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है। इसका दंश वे झेलते हैं जिनका कोई अपना हत्या का शिकार हुआ या आत्महत्या कर चला जाता है, उनके प्रियजन, रिश्तेदार एवं मित्र तो दुःखी होते ही हैं, सम्पूर्ण मानवता भी आहत एवं शर्मसार होती है। गुजरात के सूरत से एक हैरतअंगेज एवं त्रासद मामले में एक ही परिवार के सात सदस्यों की मौत से हर कोई हैरान है। आर्थिक तंगी से जूझ रहा यह परिवार सूरत के अडाजन इलाके के सिद्धेश्वर अपार्टमेंट में रह रहा था, वहीं पर उनका बेटा मनीष उर्फ शान्तु सोलंकी पंखे से फांसी का फंदा लगाकर लटका था, जबकि कनुभाई उनकी पत्नी शोभनाबेन, मनीष की पत्नी रीटा, मनीष की 10 और 13 साल की दोनों बेटियां दिशा और काव्या साथ ही छोटा बेटा कुशल का शव बिस्तर पर पड़ा मिला। ऐसी ही त्रासद घटना 1 जुलाई 2018 दिल्ली के बुराड़ी में भी हुई, जिसने हर किसी को दहला दिया था। आत्महंता होते व्यक्ति के लिये समस्याएँ विराट हो गई है एवं सहनशक्ति क्षीण हुई है, तभी ऐसी विकराल घटनाएं संस्कृति के भाल पर बदनुमा दाग बनती जा रही है।

आत्महत्या की ये त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाएं आज के अति भौतिकवादी एवं सुविधावादी युग की देन है। तकनीकी विकास ने मनुष्य को सुविधाएँ तो दीं लेकिन उससे उसकी मानवीयता, सहिष्णुता, विवेक, संतुलन छीन लिया। आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं से यह सवाल एक बार फिर प्रखरता से सामने आया है कि महानगरों में आखिर कैसे ऐसी स्थितियां बनती गई हैं कि लोगों में संघर्ष का साहस छीजता गया है और वे जीवन से हार कर सपरिवार खुदकुशी जैसे कदम उठाने लगे हैं। महानगरों में बढ़ती आर्थिक समस्याओं, कर्ज, तंगी, सामाजिक प्रतिष्ठा, बढ़ते असुरक्षा, अवसाद, कुंठा और जीवन के प्रति पलायनवादी दृष्टिकोण को लेकर चिंताएं बहुत पहले से प्रकट की जाती रही हैं, पर अब वे स्थितियां भयावह, चिन्ताजनक एवं खौफनाक स्तर तक पहुंच गई लगती हैं। जब सुविधावादी मनोवृत्ति सिर पर सवार होती हैं और उन्हें पूरा करने के लिये साधन नहीं जुटा पाते हैं तब कुंठित एवं तनावग्रस्त व्यक्ति को अन्तिम समाधान आत्महत्या में ही दिखता है।


आत्महत्या की समस्या दिन-पर-दिन विकराल होती जा रही है। कभी कोई विद्यार्थी, कभी कोई पत्नी, व्यापारी अथवा किसान, कभी कोई सिने-स्टार, कभी कोई सरकारी कर्मी तो कभी कोई प्रेमी-जीवन में समस्याओं से इतना घिरा हुआ महसूस करता है या नाउम्मीद हो जाता है कि उसके लिये जीवन से पलायन कर जाना ही सहज प्रतीत होता है और वह आत्महत्या कर लेता है। आत्महंता होते समाज में आत्महत्या का सबसे सामान्य तरीका कीटनाशक खाना, फांसी लगाना, रेल्वे के आगे कूद जाना, पानी में डूबना, पंखें से लटक जाना, जहर खा लेना और बंदूक हैं। कारोबार में घाटा, प्रेम में मिली विफलता, पारिवारिक कलह, कैरियर एवं उच्च शिक्षा परिणाम की चिन्ता आदि के चलते खुदकुशी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। महानगर लोगों में बेहतर, सुविधावादी और खुशहाल जीवन के सपने रोपते हैं। इसी आकर्षण में बहुत सारे लोग गांव और अपने छोटे कस्बे को छोड़ कर महानगरों की तरफ भागते हैं, लेकिन महानगरों के जीवन की समस्याएं एवं भयावह सत्य का जब सामने होता है तो जीवन जटिल एवं समस्याग्रस्त प्रतीत लगता है। भारत में होने वाली आत्महत्याओं के प्रमुख कारणों में बेरोगजारी, भयानक बीमारी का होना, पारिवारिक कलह, दांपत्य जीवन में संघर्ष, गरीबी, मानसिक विकार, परीक्षा में असफलता, प्रेम में असफलता, आर्थिक विवाद, व्यापारिक घाटा, बढ़ता कर्ज एवं राजनैतिक परिस्थितियां होती हैं।


जो परिवार तलाक, अलगाव, आर्थिक कलह-तंगी एवं अभावों, रिश्तों के कलह के कारण टूटी हुयी स्थिति में होते हैं उनमें भी आत्महत्या की घटनाएं अधिक पायी जाती हैं। राजनैतिक उथल-पुथल और व्यापार में नुकसान, आर्थिक तंगी भी आत्महत्या का कारण बनती है। किसानों की फसल की तबाही और कर्ज की अदायगी की चिंता से हो रही आत्महत्या भी गंभीर समस्या बन गई है। कर्ज लेकर घी पीने की जीवनशैली ने भी सबकुछ दांव पर लगा दिया है। औद्योगीकरण तथा नगरीकरण में वृद्धि भी इसके कारण है। भौतिक मूल्यों के बढ़ते हुए प्रभाव ने सामाजिक सामंजस्य की नई समस्याओं को जन्म दिया है। लेकिन आत्महत्या किसी भी सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज के भाल  पर एक बदनुमा दाग है, कलंक हैं। टायन्बी ने सत्य कहा हैं कि कोई भी संस्कृति आत्महत्या से मरती है, हत्या से नहीं।’


हर कोई चाहता है कि वह अपने परिवार को अच्छी जिंदगी बसर करने का अवसर उपलब्ध कराए। इसलिए अनेक लोग उद्यम शुरू करते हैं। हालांकि उद्यम और व्यापार में उतार-चढाव के जोखिमों से हम वाकिफ होते हैं और इस तरह नुकसान से पार पाने के लिए पहले से तैयार भी रहते हैं। पर पिछले कुछ सालों से व्यापार में घाटे और कर्ज का बोझ बढ़ने की वजह से खुदकुशी की घटनाएं बढ़ी हैं। यह प्रवृत्ति केवल बड़े नुकसान उठाने वाले व्यापारियों मंे नहीं, छोटे और खुदरा व्यापार करने वालों में भी देखी गई है, जो अक्सर बहुत आसानी से अपना धंधा बदल लेने को तैयार रहते हैं। निश्चित रूप से इसके लिए देश की व्यापारिक स्थितियां जिम्मेदार हैं, पर इसमें सामाजिक बेपरवाही और संवेदनात्मक संकुचन भी कम जिम्मेदार नहीं है। यह ठीक है कि पिछले कुछ समय से देश में कारोबारी स्थितियां अच्छी नहीं हैं, बहुत सारे लोगों को अपने धंधे बंद करने पड़े, कई कारोबारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, बहुत सारे लोगों का रोजगार छिन गया है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि इससे पार पाने के लिए उन्होंने जीवन समाप्त करने का रास्ता ही चुना।


आत्महत्या जहां जीवन से पलायन है वहीं छोटी-छोटी बातों पर हत्या कर देने की घटनाएं संवेदनहीनता को दर्शाती है। जो लोग एक दूसरे के साथ उठते-बैठते, खाते-पीते हैं, उनमें से कोई एक बहुत छोटी रकम के लेनदेन से उपजे विवाद में अपने दोस्त की हत्या तक कर देता हैं। आए दिन इस तरह की घटनाएं दिल्ली जैसे महानगरों के लिए चिंता का कारण बन रही हैं। गौरतलब है कि दिल्ली के द्वारका में डाबरी थाना इलाके में महज पांच सौ रुपए को लेकर हुए विवाद के बाद दो दोस्तों के मारपीट हुई और एक युवक ने दूसरे की चाकू से गोदकर हत्या कर दी, इस वारदात की वजह और प्रकृति से किसी भी व्यक्ति का चिंतित होना स्वाभाविक है। यों देश की राजधानी होने के बावजूद चोरी-झपटमारी से लेकर गंभीर या जघन्य अपराधों के मामले में दिल्ली की तस्वीर परेशान करती है। पिछले कुछ समय से किसी का हाथ छू जाने पर तो कहीं बहुत छोटी रकम चुकाने जैसी बातों पर भी दो पक्ष आपस में भिड़े और उसमें किसी की जान चली गयी। सड़क पर वाहन चलाने के दौरान होने वाली हिंसक घटनाओं के दौरान यही साफ होता है कि सामान्य विवेक का इस्तेमाल कर मसले को सुलझाने की बजाय लोग पहले हिंसा का ही सहारा लेते हैं। वक्त के साथ आधुनिक होते समाज में उम्मीद की जाती है कि लोगों के बीच संवेदनशीलता, मानवीयता एवं अहिंसा के सूत्र गहरे होंगे, वे आपस में सहयोग की जड़ों को और मजबूत करेंगे। मगर ऐसा लगता है कि न केवल संवेदना, सहिष्णुता और सहयोग की जगह खत्म होती जा रही है, बल्कि हालत यह है कि बेहद मामूली बातों के लिए भी लोग जानलेवा हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ तो यही हुआ कि आज ज्यांे-ज्यांे विकास एवं सुविधावाद के नये कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं, त्यांे-त्यांे सहिष्णुता-संवेदना के आदर्श धूल-धूसरित होे रहे हैं और मनुष्य आत्महंता एवं हिंसक होता रहा है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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