( जल की महत्ता और व्यापकता पर गंभीर और गहरी कविता )
मैं जल हूं,
सृष्टि का प्रथम स्पंदन,
धरती की धड़कन,
जीवन का अनश्वर आलिंगन।
मैं तेरा आज भी हूं,
तेरा आने वाला कल भी हूं।
तेरे अस्तित्व की हर श्वास में
मौन होकर भी अविरल हूं।
पंचभूतों की विराट सभा
में एक तत्व मात्र नहीं।
मैं स्वयं सृजन का आधार हूं,
प्रकृति का अमिट संस्कार हूं।
मैं ओस की बूंद बन प्रभात
के पत्तों पर ठहरता हूं।
शबनम बनकर रात्रि की
पलकों में उतरता हूं।
मैं सावन की रिमझिम हूं,
मेघों का गूंजता संगीत हूं।
धरती की प्यासी आत्मा पर
बरसता हुआ नवजीवन गीत हूं।
तेरे अश्रुओं में मैं हूं,
दुख की नीरव भाषा बनकर।
तेरी हंसी में भी मैं हूं,
उमंगों की मधुर परिभाषा बनकर।
तेरे रक्त की हर धारा में
मैं गति बनकर बहता हूं।
तेरे श्रम से निकले पसीने में
संघर्ष का सत्य कहता हूं।
मैं हिमालय की चोटी पर
जमा हुआ हिमनद भी हूं।
मैं कल-कल बहती नदी हूं,
अथाह सागर का हृदय भी हूं।
मैं तालाब की शांति हूं,
पोखर की सरल आत्मीयता हूं।
मैं कुओं की गहराई में,
गांवों की जीवंत स्मृतियां हूं।
मैं बादल बन उड़ता हूं,
बिजली बन चमकता हूं।
कभी धारा बन उतरता हूं,
कभी प्रलय बन तड़पता हूं।
मैं खेतों की हरियाली हूं,
अन्नपूर्णा की मुस्कान हूं।
मैं प्यासे अधरों का संतोष हूं,
जीवन का सबसे बड़ा वरदान हूं।
मैं था तब भी,
जब मानव का नाम नहीं था।
मैं हूं अब भी,
जब सभ्यता अपने शिखर पर है।
और मैं रहूंगा तब भी,
जब समय स्वयं थक जाएगा।
यत्र-तत्र, सर्वत्र मैं हूं,
कण-कण में मेरा वास है।
सृष्टि के आरंभ से अंत तक,
मेरा ही विस्तार है।
पर सुन मानव….!
यदि तूने मुझे केवल साधन समझा।
मेरा अपमान किया,
मेरे स्रोतों को विष से भर दिया।
तो एक दिन तेरी सभ्यता का,
दर्प रेत की तरह बिखर जाएगा।
क्योंकि मैं जल हूं-
तो…. जीवन हूं।
पर यदि रूठ जाऊं तो,
मरुस्थल का मौन भी हूं।
मैं जल हूं……
मैं ही सृजन,मैं ही प्रवाह,
और..! मैं ही जीवन
का शाश्वत सत्य हूं।।
